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सत्ता बनाम न्यायपालिका: सीजेआई गवई पर जूता हमला क्यों?

सत्ता बनाम न्यायपालिका

सत्ता बनाम न्यायपालिका 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के भीतर हुई घटना ने भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद को हिला कर रख दिया है। संविधान के कस्टोडियन और देश के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई बी आर गवई पर जूता फेंककर हमला करने की कोशिश की गई। यह घटना कोई अचानक हुआ कृत्य नहीं, बल्कि वर्षों से सत्ताधारी दल के नेता और उसके सहयोगी द्वारा न्यायपालिका पर लगातार हमले बोलने का अपरिहार्य परिणाम थी।

न्यायपालिका पर उच्च पदों से लगातार हमले

दरअसल, न्यायिक संस्थाओं को कमजोर करने का माहौल सुनियोजित तरीके से बनाया जा रहा है। पूर्व कानून मंत्री किरण रिजिजू ने खुले तौर पर कोलेजियम सिस्टम को “असंवैधानिक” और अपारदर्शी बताते हुए जजों की जवाबदेही पर सवाल उठाए थे।

इतना ही नहीं, उन्होंने रिटायर्ड जजों को “एंटी-इंडिया गैंग” का हिस्सा ठहराया, जो न्यायपालिका को विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए उकसा रहे हैं। रिजिजू का यह रवैया साफ तौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला था, जिसने सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने जैसे कृत्यों को हवा दी।

वहीं, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तो सीधे सुप्रीम कोर्ट को “सुपर पार्लियामेंट” बनने का आरोप लगाया, और यहाँ तक कि आर्टिकल 142 को “लोकतंत्र के खिलाफ न्यूक्लियर मिसाइल” कहा जो जजों को 24×7 उपलब्ध है। उन्होंने राष्ट्रपति को निर्देश देने वाले फैसलों पर सवाल उठाते हुए जजों को विधायिका और कार्यपालिका के दायरे में घुसने का दोषी ठहराया।

संवैधानिक पद पर रहते हुए धनखड़ के ये बयान गरिमा के विपरीत थे, जो ज्यूडिशियरी को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास लगते हैं और निचले स्तर के गुंडों को प्रोत्साहित करते हैं। इस पूरे प्रकरण में मुख्य मुद्दा सत्ता बनाम न्यायपालिका के बीच बढ़ता टकराव ही रहा है।

“धार्मिक युद्ध भड़काने” के आरोप और अवमानना पर चुप्पी

मामला यहीं नहीं रुका। बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने तो सीधे सीजेआई संजीव खन्ना को “सभी सिविल वॉर के जिम्मेदार” ठहराया और सुप्रीम कोर्ट को “धार्मिक युद्ध भड़काने” का दोषी बताया। दूबे के ये अनर्गल प्रलाप वक्फ एक्ट जैसे मामलों में कोर्ट के हस्तक्षेप पर थे, जहाँ उन्होंने कहा कि “अगर कोर्ट कानून बनाएगा तो संसद बंद हो जानी चाहिए”।

सुप्रीम कोर्ट ने खुद इन बयानों को “हाईली इर्रिस्पॉन्सिबल” और “अब्सर्ड” कहा, लेकिन दूबे जैसे लोग बिना कार्रवाई और सजा के ऐसे बकवास करते रहते हैं। यह माहौल बनाने का कार्य है जो संघी कार्यकर्ताओं को कोर्ट में हिंसा करने की हिम्मत देता है। सत्ता बनाम न्यायपालिका की इस खींचतान में न्याय का पक्ष कहीं दब गया है।

कोर्टरूम में हिंसा: सनातन के नाम पर कट्टरता

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने सीजेआई बी आर गवई पर जूता फेंककर हमला करने की कोशिश की, चिल्लाते हुए कि “सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान”। इस घटना को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

यदि हमलावर को सिक्योरिटी से न गुजरना होता तो वह कोर्ट रूम में बम या पिस्तौल लेकर भी जा सकता था। यह कृत्य गवई के भगवान विष्णु की मूर्ति वाले केस पर टिप्पणी से प्रेरित था, लेकिन असल में यह धार्मिक कट्टरता का प्रतीक है।

हमलावर को RSS कार्यकर्ता बताया जा रहा है, जो सनातन के नाम पर हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश करता है। सुप्रीम कोर्ट जैसी पवित्र जगह पर यह हमला न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा प्रहार है, जो सत्ताधारी विचारधारा की असहिष्णुता को उजागर करता है।

जज लोया कांड और चुप्पी की कीमत

यह हादसा जज लोया कांड की याद दिलाता है, जहाँ 2014 में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस सुन रहे जज बी.एच. लोया की रहस्यमय मौत हुई, जिसमें अमित शाह आरोपी थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्राकृतिक मौत कहा, लेकिन परिवार के संदेह और रिपोर्ट्स ने सवाल उठाए। यह तर्क दिया जाता है कि अगर उसकी सुनवाई पूरी हुई होती, तो शायद आज के जैसे हमले न होते। लोया कांड ने दिखाया कि संवेदनशील मामलों में जजों पर दबाव कितना होता है, और अब गवई पर जूता फेंकना उसी चक्र का हिस्सा लगता है।

यह विडंबना ही है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने निशिकांत दूबे जैसे लोगों के प्रलाप पर मोदी-शाह से बिना डरे अवमानना का स्वत: संज्ञान लिया होता, तो शायद य़ह हिम्मत न दिखाई जाती। कोर्ट ने दूबे के बयानों को नकारा लेकिन कार्रवाई से कतरा गया, जो कमजोरी का संकेत है।

राजनीतिक दबाव में न्यायपालिका की चुप्पी ने संघी तत्वों को यह संदेश दिया कि वे बेधड़क हमला कर सकते हैं। यह न केवल कोर्ट की नाकामी थी, बल्कि लोकतंत्र के लिए खतरा भी। सत्ता बनाम न्यायपालिका के इस टकराव में, न्यायपालिका को अपनी रीढ़ दिखानी होगी।

लोकतंत्र खतरे में

संघी विचारधारा के समर्थक का यह जूता फेंकना सनातन की आड़ में हिंसा को बढ़ावा दे रहा है, जो गरीब दलितों और अल्पसंख्यकों पर रोज हमले करता है। अगर सीजेआई सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी क्या करेगा? यह माहौल बदलना होगा, वरना न्यायपालिका को निश्चित ही ये खत्म कर देंगे।

अदालतों को अब सत्ताधारी दल को जवाबदेह बनाओ, ताकि ऐसे कृत्य रुक सकें और न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके।

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