CJI गवई हमला, गोदी मीडिया की भूमिका और न्यायपालिका पर षड्यंत्र
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी.आर. गवई पर सुप्रीम कोर्ट के अंदर जूता फेंकने का प्रयास न केवल न्यायपालिका पर एक सीधा हमला है, बल्कि यह एक सुनियोजित षड्यंत्र का चरम प्रतीत होता है। यह षड्यंत्र हिंदुत्व के नाम पर सत्ता के गलियारों से उपजा लगता है। इस पूरी घटना में गोदी मीडिया की भूमिका सवालों के घेरे में है।
सितंबर 2025 में, गवई ने खजुराहो के जावरी मंदिर में विष्णु मूर्ति के पुनर्निर्माण की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की थी: “जाओ, अपने देवता से कहो कि वे खुद कुछ करें।” इस टिप्पणी को सोशल मीडिया पर विकृत कर हिंदू भावनाओं का अपमान बताकर एक व्यापक अभियान चलाया गया।
हालाँकि, यह टिप्पणी व्यंग्यात्मक थी, लेकिन इसे धार्मिक अपमान का रंग देकर CJI गवई को जानबूझकर निशाना बनाया गया। यह इसलिए किया गया क्योंकि वे दलित और बौद्ध पृष्ठभूमि से आते हैं। यह साफ है कि संघ परिवार और उसके सहयोगी इस घटना को जातिगत विद्वेष का हथियार बनाने में लगे हैं, जिसका अंतिम लक्ष्य न्यायपालिका को कमजोर करना है।
सोशल मीडिया से कोर्ट रूम तक: षड्यंत्र का चरणबद्ध विकास
इस षड्यंत्र का पहला चरण सोशल मीडिया पर चला, जहाँ #ImpeachTheCJI जैसे हैशटैग के साथ गवई को “हिंदू-विरोधी” करार दिया गया। आरएसएस से जुड़े अकाउंट्स और दक्षिणपंथी ट्रोल्स ने उन्हें “दोहरी न्यायपालिका” का प्रतीक बताया। विडंबना यह है कि यही वे लोग हैं जो न्यायिक फैसलों को “हिंदू-विरोधी” ठहराते हैं, जब वे उनके एजेंडे के खिलाफ होते हैं।
गवई ने स्पष्ट किया कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और सच्चे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं, लेकिन उनकी यह सफाई भी पर्याप्त नहीं मानी गई। यह अभियान केवल आक्रोश नहीं था, बल्कि हिंसा को भड़काने वाला था, एक ऐसा माहौल तैयार किया गया जहाँ न्यायाधीश को धमकी दी जा सके।
क्या यह महज़ एक संयोग है कि गवई का बयान आने के बाद ही कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जैसे लोग सार्वजनिक मंच पर उतर आए? यह सत्ता की एक सोची-समझी चाल है, जो न्याय को धर्म के चूल्हे पर भून रही है। कथावाचक अनिरुद्धाचार्य का रोल सबसे घिनौना है।
21 सितंबर 2025 को वायरल वीडियो में उन्होंने गवई को खुली धमकी दी: “अगर अपनी छाती फाड़वाना चाहते हो, तो बता दो।” यह कोई धार्मिक प्रवचन नहीं, बल्कि हिंसा का न्योता था, जो विष्णु की खंडित मूर्ति वाले बयान को बहाना बनाकर दिया गया।
कथावाचकों का गिरोह और सत्ता की चुप्पी
अनिरुद्धाचार्य जैसे लोग, तथा बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री और रामभद्राचार्य जो कि सनातन धर्म की आड़ में नफरत उगलते हैं, लेकिन असल में वे सभी सत्ता के पिट्ठू हैं। मिशन अंबेडकर के संस्थापक सूरज कुमार बौद्ध ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर इनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की मांग की है, क्योंकि यह धमकी सीधे न्यायपालिका की गरिमा पर प्रहार है। सवाल यह है: क्या अब भी सरकार चुप रहेगी? यह कथावाचकों का गिरोह है, जो मंदिर-मस्जिद विवादों को हवा देकर लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।
6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 1 में वकील राकेश किशोर ने CJI पर जूता फेंककर हमला करने का प्रयास किया, चिल्लाते हुए कि “सनातन का अपमान नहीं सहेेंगे।” यह कोई व्यक्तिगत आक्रोश नहीं था। किशोर ने बाद में कहा कि “भगवान ने उकसाया,” जो स्पष्ट रूप से अनिरुद्धाचार्य जैसे उकसावे का सीधा नतीजा था।
सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस ने कोई केस दर्ज नहीं किया; जूता लौटा दिया और उसे छोड़ दिया। बार काउंसिल ने लाइसेंस सस्पेंड किया, लेकिन असली सवाल यह है: क्या यह सुनियोजित ड्रामा था? किशोर 71 वर्ष का है, और उसका बयान, “मैं सो नहीं पा रहा था सितंबर 16 से” दिखाता है कि हफ्तों का ब्रेनवॉश काम कर गया। यह हमला न्यायाधीश पर नहीं, पूरे संवैधानिक ताने-बाने पर था, जो सत्ता के हिंदुत्व एजेंडे को चुनौती दे रहा था।
गोदी मीडिया का शर्मनाक आचरण और सत्ता का दोहरा रवैया
सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी नेता जैसे अजीत भारती ने गवई का मजाक उड़ाया और हिंसा भड़काई। हैरानी की बात यह है कि उसे पुलिस ने थाने बुलाकर केवल नफरती ट्वीट को डिलीट कराकर छोड़ दिया, जिसके लिए अवमानना की मांग हो रही है। भाजपा ने हमले की निंदा की, लेकिन यह दिखावटी लगती है।
पीएम मोदी ने फोन किया और “हर भारतीय आक्रोशित” कहा, लेकिन अजीत भारती जैसे प्रभावशाली लोगों पर चुप्पी क्यों? यह वही पार्टी है जो न्यायपालिका को “कॉलेजियम सिस्टम” खत्म करने की धमकी देती है। हमलावर को छोड़ना और कथावाचक को बख्शना साफ संकेत है कि सत्ता हिंसा को शह दे रही है, ताकि जज फैसले सोच-समझकर लें। यह खुलेआम लोकतंत्र का गला घोंटना है।
इस पूरे प्रकरण में गोदी मीडिया की भूमिका सबसे शर्मनाक रही है। हमलावर किशोर का इंटरव्यू लेना, जहाँ वह “भगवान की इच्छा” का रोना रोता है, बिना किसी सवाल के प्रसारित करना, पत्रकारिता के सिद्धांतों का हनन है। न्यूज़ चैनल्स ने गवई के बयान को “अपमान” का राग अलापा, लेकिन उनकी सफाई को दबाया।
यह मीडिया नहीं, प्रोपगैंडा मशीन है, जो सत्ता के इशारे पर चलती है। किशोर को “सनातनी योद्धा” बताकर महिमामंडन करना, जैसे कि जूता फेंकना धर्मरक्षा हो, यह समाज को विभाजित करने का हथियार है। गोदी मीडिया की भूमिका ने इस षड्यंत्र को हवा दी, और अब चुप्पी साध ली है। क्या यही है वह “नया भारत” जहाँ न्यायाधीश को धमकी मिले और हमलावर को हीरो का स्टेटस?
अंबेडकरवादी न्याय पर हमला और लोकतंत्र का भविष्य
यह षड्यंत्र गहरा है, जो जाति, धर्म और सत्ता के त्रिकोण पर टिका है। गवई पहले दलित-बौद्ध CJI हैं, जो नोटबंदी, आर्टिकल 370 जैसे फैसलों में सरकार के साथ खड़े दिखे, लेकिन विष्णु टिप्पणी पर वे निशाने पर आ गए। यह हमला अंबेडकरवादी न्याय को कुचलने की कोशिश है, जहाँ हिंदुत्व के नाम पर दलितों को “सनातनी हीरो” बनाकर विभाजित किया जाए। बिहार चुनावों के करीब यह जातिगत ध्रुवीकरण का खेल लगता है।
अगर अदालत अवमानना की कार्रवाई नहीं करेगी, तो यह लोकतंत्र का अंत होगा, जहाँ जज डरेंगे, और सत्ता जीतेगी। गवई जैसे जजों के मनोबल को बचाना ज़रूरी है, वरना संविधान मर जाएगा। गोदी मीडिया की भूमिका की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
अंत में, यह घटना एक सबक है: सनातन धर्म का अपमान नहीं, बल्कि सत्ता का अपमान हो रहा है। गवई ने शांत रहकर संविधान की ताकत दिखाई, “ये चीजें मुझे प्रभावित नहीं करतीं” कहकर अपनी दृढ़ता दर्शाई।
अनिरुद्धाचार्य, अजीत भारती, और CJI पर हमला करने वाले वकील राकेश किशोर जैसे लोगों पर तुरंत कार्रवाई हो, और हमलावरों को सजा दी जाए। अगर नहीं, तो यह षड्यंत्र और गहरा होगा, जहाँ न्याय मंदिरों की छाया में दब जाएगा।



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