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योगी आदित्यनाथ शासन  : यूपी पुलिस का एनकाउंटर तांडव

योगी आदित्यनाथ शासन  

योगी आदित्यनाथ शासन के अंतर्गत उत्तर प्रदेश पुलिस का तथाकथित ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ और ‘खल्लास’ एक खुला तांडव बन गया है। कानून का लबादा ओढ़े हुए पुलिस अपराधियों को निशाना बनाने के बजाय, न्याय की हत्या कर रही है। पिछले 48 घंटों में 20 से अधिक एनकाउंटर हुए, जिनमें कई बदमाशों को पैरों में गोली मारकर ‘लंगड़ा’ बनाने या सीधे ‘खल्लास’ करने का दावा किया गया। यह स्थिति साबित करती है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पुलिस को एक व्यक्तिगत सेना में बदल दिया है।

सरकारी आंकड़े बनाम जमीनी हकीकत: हिंसा का रिकॉर्ड

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2017 से अब तक 252 अपराधी एनकाउंटर में मारे गए और 10,254 घायल हुए, लेकिन ये आंकड़े केवल सरकारी प्रचार मात्र हैं। सच्चाई यह है कि कई मामलों में निर्दोषों को भी फर्जी एनकाउंटर का शिकार बनाया गया है।

यह केवल अपराध नियंत्रण का दिखावा नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है जिसका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों और विपक्षी समर्थकों को दबाने के लिए हो रहा है।

योगी आदित्यनाथ के सात साल के शासन में एनकाउंटरों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुकी है—10,000 से अधिक घटनाएँ, जिनमें 222 कथित ‘खूंखार’ अपराधी मारे गए। सरकार भले ही दावा करे कि अपराध दर घटी है, लेकिन यह ‘रिकॉर्ड’ न्याय का नहीं, बल्कि हिंसा का रिकॉर्ड है। सच्चाई यह है कि इन एनकाउंटरों ने अपराध को कम करने के बजाय, पुलिस की मनमानी को बढ़ावा दिया है।

बरेली दंगे के बाद लॉन्च हुए इन ऑपरेशनों में सहारनपुर, मेरठ, कानपुर जैसे जिलों में बदमाशों को घेरा गया। हालांकि, कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये ‘मुठभेड़ें’ पहले से स्क्रिप्टेड होती हैं; पुलिस पहले आरोपी को उठाती है, फिर ‘एनकाउंटर’ का नाटक रचती है।

संवैधानिक हनन और कानूनी धज्जियाँ: ‘जीरो टॉलरेंस’ का काला चेहरा

यह कार्रवाई योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस‘ नीति का काला चेहरा है, जहाँ अपराधी नहीं, बल्कि नागरिकों के बुनियादी अधिकार खतरे में हैं। कानूनी दृष्टि से देखें तो ये एनकाउंटर पूर्णतः असंवैधानिक हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार अक्षुण्ण है, और सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में स्पष्ट दिशानिर्देश दिए थे: हर एनकाउंटर मौत पर मजिस्ट्रेट जांच, स्वतंत्र FIR, और NHRC की निगरानी अनिवार्य है।

लेकिन यूपी पुलिस इन दिशानिर्देशों का खुला उल्लंघन कर रही है; जांचें आंतरिक होती हैं, FIR दबाई जाती हैं, और गवाहों को धमकाया जाता है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने बार-बार यूपी को फर्जी एनकाउंटरों के लिए फटकार लगाई है, लेकिन सरकार की अनदेखी से यह साफ है कि पुलिस अब ‘ट्रिगर-हैपी’ बन चुकी है।

मानवाधिकारों पर खतरा और न्यायपालिका की भूमिका

यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को काटने जैसा है। मानवाधिकारों का हाल और भी दयनीय है। एनकाउंटरों में मारे गए या घायल ‘अपराधियों’ में से कई निर्दोष साबित हुए हैं, जैसे कानपुर, अलीगढ़ और मथुरा के मामलों में, जहाँ पुलिस ने लोगों को गुप्त रूप से उठाया और फिर ‘हाफ एनकाउंटर’ का स्टेज किया।

संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएँ भारत की पुलिस हिंसा पर चिंता जता चुकी हैं, लेकिन यूपी में यह एक महामारी बन चुका है।

अल्पसंख्यक समुदायों पर लक्षित ये कार्रवाइयाँ नस्लीय पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं; बरेली दंगों के बाद मुस्लिम-प्रधान इलाकों में एनकाउंटरों की बाढ़ आ गई। क्या यह ‘सुरक्षित यूपी’ का मतलब है कि निर्दोषों को बिना मुकदमे के सजा दी जाए?

मानवाधिकार अब यूपी में एक मजाक बन चुके हैं, जहाँ पुलिस खुद न्यायाधीश, जूरी और फाँसी देने वाला जेलर है। इस मामले में न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है, क्या अदालतें सो रही हैं? सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद के अतीक अहमद और अशरफ मामले में यूपी पुलिस को फर्जी एनकाउंटरों के लिए लताड़ा था, लेकिन उसके बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

हाई कोर्ट ने कई PIL में जांच के आदेश दिए, लेकिन ज्यादातर मामलों में रिपोर्ट्स दब गईं या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हो गई। न्यायपालिका की चुप्पी मौन सहमति जैसा है, जो पुलिस की मनमानी को वैधता दे रहा है।

विपक्षी नेता जैसे अखिलेश यादव और वारिस पठान खुलकर बोल रहे हैं कि यह ‘आपराधिक हत्या’ है, लेकिन अदालतों की चुप्पी से लगता है कि राजनीतिक दबाव काम कर रहा है।

अगर न्यायपालिका पुलिस के इन कृत्यों को नजरअंदाज करती रही, तो संविधान की रक्षा कौन करेगा? यह एक खतरनाक साजिश है, जहाँ तीनों अंग—कार्यपालिका, पुलिस और न्यायपालिका—एक-दूसरे के संरक्षक बनते जा रहे हैं।

समाज पर प्रभाव और भविष्य की चेतावनी

समाज पर इन एनकाउंटरों का असर विनाशकारी है। एक ओर जहाँ अपराधी डर सकते हैं, वहीं निर्दोष नागरिक पुलिस से भागने लगे हैं। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर #UPPolice के ट्रेंड्स में समर्थन तो दिखता है, लेकिन आलोचना भी उभर रही है, जैसे बरेली दंगों में पुलिस की बर्बरता पर तमाम पोस्ट्स, जहाँ दंगाइयों को पीटा गया लेकिन जांच क्यों नहीं?

यह गुंडा राज पैदा कर रहा है, जहाँ जाति-धर्म आधारित भेदभाव बढ़ रहा है। महिलाओं और दलितों के खिलाफ अपराधों में भी एनकाउंटरों का सहारा लिया जाता है, लेकिन सच्ची न्याय प्रक्रिया की कमी से पीड़ित न्याय से वंचित रह जाते हैं।

योगी आदित्यनाथ शासन का यह ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ और ‘खल्लास’ + ‘बुलडोजर जस्टिस’ मॉडल न केवल असफल है, बल्कि समाज को विभाजित कर रहा है—एक तरफ भय, दूसरी तरफ विद्रोह।

अंत में, यह सवाल उठता है कि अगर पुलिस ही सजा देगी, तो लोकतंत्र का क्या होगा? भारतीय संविधान के ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ और मानवाधिकार अब यूपी में किताबी पन्नों को जमीन में दफन किए जा चुके हैं। योगी आदित्यनाथ की यह ‘तानाशाही’ शैली, जो एनकाउंटरों को प्रचारित करती है, वास्तव में एक खतरा है।

जो आज अपराधियों को निशाना बना रही है, वह कल विपक्ष या असहमत आवाजों को भी खत्म करेगी। न्यायपालिका को जागना होगा, NHRC को सक्रिय होना पड़ेगा, और नागरिकों को सड़कों पर उतरना होगा।

वरना, यूपी ‘पुलिस स्टेट’ नहीं, ‘पुलिस राज’ बन जाएगा, जहाँ कानून की जगह बंदूकों का राज चलेगा। यह समय सुधार का है, न कि हिंसा का, क्योंकि सच्चा न्याय बंदूक से नहीं, संविधान से आता है।

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