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इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार:यूपी में भीड़तंत्र का राज

इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार ने उत्तर प्रदेश में कानून के शासन की स्थिति पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह टिप्पणी किसी एक घटना की आलोचना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोलने वाली है, जो 20 अक्टूबर 2025 को एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई।

कोर्ट ने तल्ख़ लहज़े में कहा कि भीड़ की हिंसा अब ‘आम बात’ हो गई है। यह वाक्य सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, क्योंकि एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में लिंचिंग से जुड़े मामलों में 25% की वृद्धि हुई है, जबकि सजा दर मात्र 12% रही है।

सुप्रीम कोर्ट के 2018 के दिशानिर्देशों के बावजूद, जहाँ गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा को रोकने के लिए केंद्रीय कानून बनाने की बात कही गई थी, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सतर्कता की संस्कृति फल-फूल रही है। हालिया मामले में, जहाँ एक व्यक्ति की कार को सतर्कतावादी रोक लेते हैं और फिर वह गायब हो जाती है, हाईकोर्ट ने ठीक ही कहा कि ‘हिंसा, लिंचिंग और सतर्कता आज का क्रम’ बन गया है।

यह विफलता सिर्फ पुलिस की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मशीनरी की है जो वोटबैंक के लिए आग लगाती है और पीछे हट जाती है।

सोशल मीडिया पर #AllahabadHighCourt और #MobLynching जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहाँ हजारों यूजर्स कोर्ट की बात को शेयर कर रहे हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह बहस बदलाव लाएगी या सिर्फ वायरल होकर भूल जाएगी?

पुलिस की भूमिका पर कोर्ट का कड़ा रुख और फर्जी केसों का जाल

कानून के राज को कुचलने में पुलिस के रोल पर भी सवाल उठे हैं। पीड़ितों की रक्षा करने के बजाय, वे उल्टा झूठे केस में फंसा रही है, जिसे हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से ‘कानून का दुरुपयोग’ करार दिया है।

गौ-वध कानून का दुरुपयोग करके फर्जी एफआईआर दर्ज करना अब रूटीन हो गया है; 2024 के आंकड़ों से पता चलता है कि यूपी में ऐसे 40% केसों में कोई ठोस सबूत नहीं मिला, फिर भी निर्दोष लोग बरसों जेल में सड़ते रहे।

इस गंभीर स्थिति पर संज्ञान लेते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार के बाद कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी और होम सेक्रेटरी से हलफनामा मांगा है कि ऐसी घटनाओं पर क्या कार्रवाई हुई? जवाब आना चाहिए, लेकिन इतिहास गवाह है कि 2023 के मुरादाबाद लिंचिंग मामले में भी कोर्ट ने तीन सप्ताह में जवाब मांगा था, जो आखिरकार कागजी औपचारिकता बनकर रह गया।

पुलिस विभाग में ट्रेनिंग की कमी नहीं, इच्छाशक्ति की कमी है; वे भीड़ के आगे झुक जाती हैं क्योंकि सत्ता का संरक्षण उन्हें ढाल बनाता है। एक हालिया घटना में, फर्रुखाबाद की एसपी जब हाजिर नहीं हुईं तो उन्हें कोर्ट ने डिटेन करके लाने का आदेश दिया, जो दर्शाता है कि पुलिस की मनमानी कितनी गहरी है।

यह न सिर्फ कानून की हत्या है, बल्कि निर्दोषों की जिंदगियां चूर करने का अपराध है, जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, एनएचआरसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में यूपी में 70% लिंचिंग पीड़ित मुस्लिम थे

गौ-रक्षा कानूनों की आड़ में बढ़ती हिंसा की जड़ें और न्यायिक चेतावनी

इस अन्याय की जड़ें गहरी हैं, जो 2017 के बाद से गौ-रक्षा कानूनों से पनपीं, जब यूपी में सख्त कानून लागू हुए और सतर्कतावादियों को खुला मैदान मिल गया।

एनसीआरबी के आंकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि 2014 से 2023 तक लिंचिंग के मामले राष्ट्रीय स्तर पर 28% बढ़े, लेकिन सजा के प्रतिशत घटकर 8% रह गए; यूपी में यह आंकड़ा और भी खराब है, जहाँ 2024 के पहले छह महीनों में 15 से ज्यादा मामले दर्ज हुए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार इसी सिलसिले का हिस्सा है, जहाँ कोर्ट बार-बार चेतावनी दे रहा है कि कानून का शासन खतरे में है, जुलाई 2025 में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका को खारिज करते हुए भी कोर्ट ने कहा था कि मॉब लिंचिंग व्यक्तिगत मामले हैं, लेकिन रोकथाम के लिए राज्य जिम्मेदार है।

लेकिन सरकारें क्यों सुस्त हैं? क्योंकि ये हिंसाएँ राजनीतिक लाभ का स्रोत बन गई हैं—वोटरों को उकसाना आसान, जिम्मेदारी लेना मुश्किल। उदाहरण लें तो अलीगढ़ की 2025 की घटना, जहाँ एक मुस्लिम युवक की लिंचिंग पर कोर्ट ने एसआईटी गठन की मांग को नकारा, लेकिन पीड़ितों को मुआवजे का आदेश दिया।

यह लोकतंत्र का अपमान है, जहाँ ‘संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार’ भीड़ के आगे लाचार हो जाती है, और सुप्रीम कोर्ट के 2017 के टेकचंद हत्याकांड मामले के फैसले की अनदेखी हो रही है।

फर्जी मुकदमों की रणनीति और सिस्टम की विफलता

पीड़ितों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने का यह पैटर्न नया नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति के तहत है जो सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देता है।

पुराने केसों में देखें तो संपत्ति विवाद या व्यक्तिगत दुश्मनी में बलात्कार या एससी-एसटी एक्ट के नाम पर फर्जी एफआईआर आम हैं, लेकिन गौ-हत्या कानून के तहत यह और भी घातक हो गया। 2024 में यूपी में 200 से ज्यादा ऐसे फर्जी केस सामने आए, जहाँ पीड़ितों को आरोपी बना दिया गया।

हाईकोर्ट ने खुद कई बार कहा है कि महिलाएँ या अन्य पीड़ित POCSO या एससी-एसटी कानूनों को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन यहाँ उल्टा हो रहा है—पीड़ितों को आरोपी बना दिया जा रहा है, जैसा कि हाल के एक पत्रकार मामले में हुआ, जहाँ कोर्ट ने पुलिस की पक्षपातपूर्ण कार्रवाई पर फटकार लगाई।

पुलिस की यह मिलीभगत न्याय को मज़ाक बना देती है; निर्दोष बरसों जेल काटते हैं, परिवार बर्बाद हो जाते हैं, और अपराधी खुले घूमते हैं। मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2025 रिपोर्ट बताती है कि ऐसे फर्जी केसों से प्रभावित 60% परिवार आर्थिक रूप से टूट चुके हैं।

यह सिस्टम की नाकामी नहीं, साजिश है जो कमजोरों को कुचलती है, और कोर्ट को बार-बार हलफनामे मांगने पड़ते हैं जो व्यावहारिक बदलाव नहीं लाते।

राजनीतिक संरक्षण और विपक्ष की चुप्पी: लोकतंत्र की मौत का ऐलान

राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका सबसे घातक है, जो हिंसा को राजनीतिक हथियार बना देता है। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के दौर में गौ-रक्षा को बढ़ावा मिला, साथ ही हिंसा पर अंकुश लगाने की बजाय, पुलिस को ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ बनाया गया—2024 में 150 से ज्यादा एनकाउंटर हुए, जिनमें 40% पर सवालिया निशान उठ खड़े हुए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार के बावजूद, सरकारें हलफनामों से बच निकलने की कोशिश करती हैं; उदाहरणस्वरूप, दमोह पैर-धुलाई कांड पर न्यायप्रिय जज को ट्रांसफर कर दिया गया, जो बहुजन समाज पर अत्याचारों पर बोलने वालों को दबाने की कोशिश दिखाता है।

यह वही सिस्टम है जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा लगाता है, लेकिन अल्पसंख्यकों या गरीबों और दलितों के लिए विकास का मतलब हिंसा का साया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों ने कोर्ट में SIT और नोडल अफसरों की मांग की, लेकिन खारिज हो गई।

विपक्ष चुप है क्योंकि वे भी वोटबैंक का खेल खेलते हैं; सपा या बसपा भी इन मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं जब राजनीतिक लाभ न हो। नतीजा? कानून का राज खत्म, भीड़ का राज शुरू। यह लोकतंत्र की मौत का ऐलान है, जहाँ 78 साल आजादी के बाद भी बहुजन समाज आज भी गुलामी के दायरे में फंसा है, और अब तो कोर्ट को भी सत्ता के दबाव का सामना करना पड़ता है।

सोशल मीडिया की बहस और आगे की राह

सोशल मीडिया पर यह मुद्दा आग की तरह फैल रहा है, लेकिन बहस सतही है, जहाँ #UP #BJP जैसे हैशटैग के साथ 20 अक्टूबर को ही 5000 से ज्यादा पोस्ट हुए। ट्विटर (अब एक्स) पर Journo Mirror जैसे अकाउंट्स ने कोर्ट की टिप्पणी को 1200 लाइक्स के साथ शेयर किया, लेकिन गहराई में उतरें तो गुस्सा नकली लगता है, कई पोस्ट राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हैं।

असली बदलाव के लिए जरूरी है कि हम झूठे नैरेटिव्स को चुनौती दें, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा को ‘राष्ट्रवाद’ न कहें। हाईकोर्ट ने सही कहा: यह कानून की विफलता है। लेकिन विफलता सिर्फ राज्य की नहीं, समाज की भी है जो चुप्पी साध लेता है; मौलाना महमूद मदनी जैसे धार्मिक नेताओं ने कोर्ट के फैसले को सच्चाई उजागर करने वाला बताया, लेकिन व्यापक जागरूकता की कमी है।

हमें सतर्क रहना होगा, वरना कल हमारी बारी आ सकती है, जैसे इलाहाबाद उपद्रव में 600 दलित परिवार बर्बाद हो गए बिना किसी ठोस कारण के। सोशल मीडिया को टूल बनाएँ, न कि बहाने।

अंत में, दुःखी मन से लिखा गया हमारा यह लेख एक चेतावनी है: अगर सुधार न हुए तो भारत का लोकतंत्र भीड़ के हवाले हो जाएगा, और एनएचआरसी जैसे संस्थान चेताते रहेंगे कि 2025 पूरा होने तक लिंचिंग के केस 30% बढ़ सकते हैं। हाईकोर्ट ने डीजीपी और होम सेक्रेटरी को जवाब मांगा है, अब कार्रवाई होनी चाहिए, न कि बहाने; जैसे 2024 के कानून व्यवस्था नामक अवैध हिरासत मामलों पर कोर्ट ने फटकार लगाई।

सरकारें, पुलिस और समाज सबको आईने में स्वयं को देखना होगा: झूठे केस रद्द करें, सतर्कतावादियों को आवश्यक रूप से सजा दें, जिलों में नोडल अधिकारी तैनात करें, और कानून को सर्वोच्च बनाएँ। विपक्ष को भी अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, क्योंकि यह सिर्फ अल्पसंख्यकों का मुद्दा नहीं, बल्कि संपूर्ण लोकतंत्र का सवाल है।

वरना, यह विफलता इतिहास में काली स्याही से लिखी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले की तरह, जो गौ-रक्षा हिंसा पर केंद्रीय कानून की मांग को नजरअंदाज कर दिया गया। समय है जागने का, वरना अंधेरा गहरा हो हो रहा है, अगर कोर्ट की टिप्पणियों को गम्भीरता से नहीं लिया गया तो हमें विफल राष्ट्र के रूप में दुनिया चिन्हित करेगी।

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