महाराष्ट्र स्टाम्प ड्यूटी चोरी: पुणे जमीन लूट पर पार्थ पवार विवाद।
महाराष्ट्र स्टाम्प ड्यूटी चोरी और जमीन की लूट का यह मामला सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता के बीच भूचाल ला चुका है। यह खुलासा होने के बाद कि पार्थ पवार की कंपनी अमेडिया एंटरप्राइजेज एलएलपी ने पुणे के मुंधवा में 40 एकड़ महार वतन सरकारी जमीन को मात्र 300 करोड़ रुपये में खरीदा, जबकि इसकी बाजार कीमत 1800 से 2000 करोड़ रुपये से भी अधिक बताई जा रही है, सौदा अंततः रद्द कर दिया गया।
यह सौदा 20 मई 2025 को हुआ था, जिसमें सबसे बड़ी अनियमितता स्टाम्प ड्यूटी में दिखी। 21 करोड़ रुपये की स्टाम्प ड्यूटी को डेटा सेंटर नीति का हवाला देते हुए महज़ 500 रुपये में निपटा दिया गया।
अब जब नवंबर 2025 तक यह डील रद्द हो चुकी है, तब भी रजिस्ट्रेशन विभाग ने कैंसिलेशन के लिए दोगुनी ड्यूटी यानी 42 करोड़ रुपये थोप दिए हैं।
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ड्यूटी में छूट: सत्ता की ताकत या दोहरा न्याय?
सवाल यह है कि आम आदमी को एक छोटे फ्लैट पर लाखों रुपये की ड्यूटी देनी पड़ती है, लेकिन डिप्टी सीएम के बेटे को भारी भरकम छूट मिल जाती है और बाद में भी उन्हें बचाने के प्रयास किए जाते हैं?
क्या यह दोहरा न्याय नहीं है? यह महाराष्ट्र में सत्ता की ताकत से की गई लूट का सिर्फ ट्रेलर लगता है। कंपनी की पूंजी केवल 1 लाख रुपये है, फिर 300 करोड़ रुपये का फंड कहां से आया, इसकी जांच आवश्यक है।
फर्जीवाड़ा और दस्तावेजों में हेराफेरी: एफआईआर से नाम गायब
आरोप बेहद गंभीर हैं। शीतल तेजवानी ने 272 मूल मालिकों से फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी लेकर यह सौदा किया, जबकि महार वतन जमीन बेचना ही अवैध और गैरकानूनी है।
दस्तावेजों में भारी हेराफेरी की गई और जमीन के सरकारी होने की जानकारी जानबूझ कर छिपाई गई। आश्चर्य की बात यह है कि प्रोजेक्ट रद्द होने के बाद भी महाराष्ट्र स्टाम्प ड्यूटी चोरी की कोशिश के बावजूद, ड्यूटी माफ रही। मामले की जांच में ईओडब्ल्यू भी शामिल है, लेकिन पार्थ का नाम एफआईआर से गायब है— यह शायद पवार सरनेम की ताकत है!
कौन बलि का बकरा? छोटे अधिकारियों पर गाज
फिलहाल, शीतल तेजवानी फरार है। पार्थ के चचेरे भाई और कंपनी में 1% पार्टनर दिग्विजय पाटिल पर एफआईआर दर्ज की गई है, लेकिन 99% के मालिक पार्थ पर कोई केस नहीं है। सब-रजिस्ट्रार रवींद्र तारू और तहसीलदार सुर्यकांत येवले को भी सस्पेंड कर दिया गया है। इसके अलावा, बोपोडी में एक और सौदे पर 9 लोगों पर केस दर्ज किया गया है।
यह सवाल बना हुआ है कि क्या सिर्फ छोटे अधिकारी ही बलि का बकरा बनेंगे, जबकि बड़े खिलाड़ी सुरक्षित निकल जाएंगे? फर्जीवाड़े की यह कारस्तानी रॉकेट स्पीड से केवल 27 दिनों में पूरी की गई थी, जिससे सत्ता के इशारे पर अफसरों की दौड़भाग साफ झलकती है।
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अजित पवार का हास्यास्पद बचाव और परिवारवाद
राज्य सरकार में फाइनेंस और प्लानिंग मिनिस्टर और पुणे के गार्जियन मिनिस्टर खुद अजित पवार हैं। उनका बचाव कि ‘मेरा कोई रोल नहीं, न एक रुपया बदला, पार्थ को पता नहीं था जमीन सरकारी है’ हास्यास्पद लगता है। कंपनी का पता पार्थ का घर है, उनकी 99% हिस्सेदारी है, भले ही दिग्विजय पाटील ने साइन किए हों।
पवार कहते हैं कि कोई पेमेंट नहीं हुआ, पजेशन नहीं लिया, लेकिन सवाल है कि डील ही क्यों की गई? अब वे कहते हैं कि ‘शक से बचने के लिए डील रद्द कर दी गयी है।
‘ यह फडणवीस से मिलकर जांच का ढोंग है, जिसका एकमात्र मकसद गठबंधन साथी को बचाना है। शरद पवार जहां जांच की बात करते हैं, वहीं सुप्रिया सुले बचाव करती हैं, जो दिखाता है कि पूरा पवार खानदान लूट पर एकजुट है। यह परिवारवाद की पराकाष्ठा है।
विपक्ष का आक्रोश और महायुति का सन्नाटा
विवाद बढ़ा और डील कैंसिल हो गयी, लेकिन 42 करोड़ ड्यूटी का नोटिस दर्शाता है कि ‘तेल भी गया तूप भी!’ एफआईआर में पार्थ का नाम नहीं है, सिर्फ पार्टनर और अधिकारी नप गए हैं। राहुल गांधी ने इसे ‘दलितों की जमीन चोरी’ कहा, और उद्धव ठाकरे पहले ही बोल चुके हैं: ‘क्लीन चिट मिल जाएगी’।
विपक्ष चिल्ला रहा है कि अजीत पवार इस्तीफा दें, लेकिन महायुति में घोर सन्नाटा है। यह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है कि मोदी के साथ खड़े हो जाओ तो 11 खून माफ हो जाते हैं।
महाराष्ट्र स्टाम्प ड्यूटी चोरी के इस मामले में, यह नेपोटिज्म का मॉडल स्पष्ट है, जहां राजनीतिक परिवारों के बच्चे सत्ता का दुरुपयोग करके रातोंरात अमीर बनते हैं।
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‘विकसित महाराष्ट्र’ का असली चेहरा और नेपोटिज्म की बदबू
43 करोड़ का स्टैंप ड्यूटी डिपार्टमेंट का नोटिस निकला तो है, लेकिन सवाल है कि वह जाएगा कहां? पार्थ पवार के बंगले पर! हिम्मत है रिवेन्यू विभाग की कि वह डील कैंसिलेशन की पेनाल्टी वसूल ले? पार्थ का बयान आया है कि उन्हें ‘जमीन के सरकारी होने की जानकारी नहीं थी, कानूनी थी डील’। 1 लाख की कंपनी से 300 करोड़ का सौदा, बिना जांच, और डील कानूनी?
फर्जी दस्तावेज, अवैध वतन जमीन, यह निर्दोषता का ढोंग जनता को बेवकूफ बनाने जैसा है। अब 42 करोड़ भरकर भी इज्जत गई, हालांकि आगे चलकर 42 करोड़ भरे जाने के बजाय माफ भी किया जा सकता है।
यह नेपोटिज्म की बदबू है, जहां अफसर दबाव में झुकते हैं और कानून अमीरों के लिए छुट्टी पर होता है। यह ‘विकसित महाराष्ट्र’ का असली चेहरा है: अमीरों की लूट और गरीबों का अपमान।
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सच दबेगा या जनता जवाब मांगेगी?
उच्चस्तरीय कमिटी की रिपोर्ट 14 नवंबर तक आ जाएगी, लेकिन आशंका है कि सच दब जाएगा। बोपोडी में दूसरा सौदा भी सामने आ गया है, जिसमें हेमंत गवांडे जैसे पुराने घोटालेबाज जुड़े हैं, जो एक सिस्टमैटिक लूट का नेटवर्क होने का संकेत देता है। महाराष्ट्र में कानून भी सरनेम देखकर अपना काम करता है?
दलितों की जमीन की लूट की यह कोशिश लोकतंत्र पर कलंक है। अजित पवार के बयान सत्ता का अहंकार दिखाते हैं। विपक्ष मांग पर अड़ा है: अजित पवार इस्तीफा दें, पार्थ पर केस हो, पूरी संपत्ति जब्त हो, ईओडब्ल्यू निष्पक्ष जांच करे। पवार खानदान को याद रखना चाहिए कि जनता की ताकत से बड़ा कोई नहीं!



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