द वायर के सम्पादकों के खिलाफ एक और एफआईआर असम पुलिस के समन पर सवाल!
असम पुलिस ने द वायर के संपादकों के खिलाफ एक नया एफआईआर दर्ज किया है। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले के ठीक उसी दिन हुई। जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय ने पहले से चल रहे एक मामले में पत्रकारों को जमानत दी थी। इसके अलावा अदालत ने नए राजद्रोह कानून की संवैधानिकता पर सुनवाई भी शुरू की थी।
इस नए एफआईआर में संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को नामित किया गया है। हैरानी की बात यह है कि इस शिकायत की कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। पुलिस ने समन जारी कर दिया है लेकिन एफआईआर की कोई प्रति उपलब्ध नहीं कराई है।
यह प्रक्रिया कानून के खिलाफ मानी जा रही है। इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या पुलिस अपनी ही जांच प्रक्रिया का उल्लंघन कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दिन ही क्यों जारी हुआ समन?
गुवाहाटी क्राइम ब्रांच ने यह समन 12 अगस्त, 2025 को जारी किया। इसी तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने मोरीगांव में दर्ज पहले मामले में पत्रकारों को राहत दी थी। न्यायालय ने किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
साथ ही नए राजद्रोह कानून धारा 152 बीएनएस को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस भी जारी किया। इस पृष्ठभूमि में दूसरे एफआईआर की timing बहुत ही संदेहास्पद लगती है। इससे लगता है कि यह कार्रवाई न्यायालय के समक्ष एक चुनौती की तरह है। पुलिस का यह कदम पूरी तरह से विवादों में घिर गया है।
नए मामले में कौन सी धाराएं हैं शामिल?
पुलिस इंस्पेक्टर सौमर्ज्योति रे ने यह समन जारी किया। इस समन में एफआईआर नंबर 03/2025 का जिक्र किया गया है। यह शिकायत गुवाहाटी के पणबाजार थाने में दर्ज की गई है। इसके तहत भारतीय न्याय संहिता की कई धाराएं लगाई गई हैं। इनमें धारा 152 प्रमुख है जो राजद्रोह से संबंधित है।
इसके अलावा धारा 196, 197 और 353 भी शामिल हैं। फिर भी समन में एफआईआर दर्ज करने की तारीख का उल्लेख नहीं है। न ही आरोपियों को यह पता है कि उन पर क्या आरोप हैं। कानूनी प्रक्रिया की दृष्टि से यह एक गंभीर चूक है।
पुलिस की चेतावनी और पत्रकारों का जवाब
सिद्धार्थ वरदराजन को यह समन 14 अगस्त को प्राप्त हुआ। करण थापर को भी ठीक इसी तरह का एक समन 18 अगस्त को मिला। दोनों पत्रकारों को 22 अगस्त को गुवाहाटी में पेश होने का आदेश दिया गया। पुलिस का कहना है कि उनसे पूछताछ करना जरूरी है।
समन में यह भी चेतावनी दी गई है कि अनुपस्थित रहने पर गिरफ्तारी हो सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में एफआईआर की एक प्रति की अनुपलब्धता सबसे बड़ा मुद्दा है। बिना जानकारी के पत्रकार अपना पक्ष कैसे रखेंगे। यह कार्रवाई उनके मौलिक अधिकारों का हनन प्रतीत होता है।
पहले मामले में भी थी ऐसी ही गोपनीयता
पहला मामला जुलाई में मोरीगांव में दर्ज किया गया था। उसकी भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। उस एफआईआर को भी आरोपित किये गए व्यक्तियों से गुप्त रखा गया था। द वायर के वकीलों को थाने से कोई जानकारी नहीं मिली। अंततः सूत्रों के माध्यम से ही मामले का पता चल पाया।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। अदालत ने इसकी सुनवाई स्वीकार कर ली। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ इस पर विचार कर रही है। नया कानून भी पुराने राजद्रोह कानून का ही रूपांतर है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में ही पुराने प्रावधान पर रोक लगा दी थी।
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कानूनी प्रक्रिया का सवाल और पत्रकारों का रुख
वरदराजन और थापर ने पुलिस को जवाब दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एफआईआर की प्रति आरोपी को देना अनिवार्य है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। उसने कहा था कि बिना एफआईआर की प्रति के समन अवैध है।
पुलिस की इस कार्रवाई से कानून का शासन कमजोर होता है। इससे नागरिकों के अधिकारों को खतरा पैदा हो गया है। पत्रकारों ने अपनी ओर से पूरा सहयोग देने का भरोसा दिलाया है।
अदालत में भी नहीं है एफआईआर का रिकॉर्ड
द वायर के स्थानीय वकीलों ने भी कोशिश की। उन्होंने मजिस्ट्रेट की अदालत में इस एफआईआर की तलाश की। लेकिन वहां भी इस नए case का कोई records नहीं मिला। असम के स्थानीय पत्रकार भी पुलिस से जानकारी लेने में विफल रहे। पुलिस अधिकारियों ने कोई भी ब्यौरा देने से इनकार कर दिया।
इस तरह की गोपनीयता लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। पारदर्शिता की कमी से लोगों का कानून से विश्वास उठ जाता है। यह मामला नागरिक स्वतंत्रता बनाम राज्य की शक्ति का प्रतीक बन गया है।
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मीडिया की आजादी पर इसके क्या होंगे परिणाम?
इस पूरे प्रकरण का मीडिया की आजादी पर गहरा असर पड़ेगा। पत्रकारिता एक महत्वपूर्ण पेशा है जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। उस पर लगातार दबाव बनाना चिंताजनक है। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भविष्य के लिए एक मिसाल कायम करेगा।
सुप्रीम कोर्ट का अगला फैसला इस संबंध में बहुत महत्वपूर्ण होगा। उम्मीद की जाती है कि न्यायालय नागरिक अधिकारों की रक्षा करेगा। साथ ही पुलिस को कानून का पालन करने के लिए भी निर्देशित करेगा।



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