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भारत की पहली डिजिटल जनगणना: 2027 के लिए 11,718 करोड़ रुपये मंजूर

पहली डिजिटल जनगणना 

भारत की पहली डिजिटल जनगणना 2027 में होने जा रही है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। कैबिनेट ने दुनिया की इस सबसे बड़ी एडमिनिस्ट्रेटिव और स्टैटिस्टिकल एक्सरसाइज (प्रशासनिक और सांख्यिकीय कवायद) के लिए कुल ₹11,718.24 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट के फैसलों की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि यह जनगणना पूरी तरह से आधुनिक तकनीक पर आधारित होगी और इसमें सटीकता व पारदर्शिता का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

लंबे समय से प्रतीक्षित यह दशकीय अभ्यास, जो मूल रूप से 2021 में प्रस्तावित था लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित हो गया था, अब नए स्वरूप में सामने आएगा। सरकार का यह कदम न केवल डेटा कलेक्शन की प्रक्रिया को तेज करेगा, बल्कि नीति निर्माण के लिए एक ठोस आधार भी तैयार करेगा।

दो चरणों में संपन्न होगी पूरी प्रक्रिया

जनगणना 2027 की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित रूप से पूरा करने के लिए इसे दो मुख्य चरणों में विभाजित किया गया है। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि पहला चरण, जिसमें हाउसलिस्टिंग (मकान सूचीकरण) और हाउसिंग सेंसस (आवास जनगणना) शामिल है, अप्रैल 2026 से शुरू होकर सितंबर 2026 तक चलेगा। इसके बाद, दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण ‘पॉपुलेशन एन्यूमरेशन’ (PE) यानी जनसंख्या की गिनती का काम फरवरी 2027 में किया जाएगा।

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भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने विशेष व्यवस्था भी की है। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फ से ढके और दुर्गम इलाकों में पॉपुलेशन एन्यूमरेशन का कार्य बाकी देश से पहले, यानी सितंबर 2026 में ही पूरा कर लिया जाएगा। आंकड़ों को इकट्ठा करने का काम 1 मार्च 2027 तक पूरी तरह समाप्त होने की उम्मीद है, हालांकि डेटा को संकलित और प्रकाशित करने में दो से तीन साल का समय लग सकता है।

अत्याधुनिक तकनीक और मोबाइल ऐप का उपयोग

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रिपोर्टर्स को बताया कि यह पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें पारंपरिक कागजी कार्रवाई की जगह डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। डेटा कलेक्शन के लिए गणना करने वाले कर्मचारी (एन्यूमरेटर) विशेष रूप से तैयार किए गए मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करेंगे, जो एंड्रॉयड (Android) और आईओएस (iOS) दोनों प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे। इसके अलावा, आम नागरिकों को ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन’ यानी अपनी गिनती खुद करने का विकल्प भी दिया जाएगा, जो इस प्रक्रिया को मॉडर्न बनाने और जन-भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा।

बेहतर डेटा क्वालिटी सुनिश्चित करने और पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक ‘सेंट्रल पोर्टल’ का इस्तेमाल किया जाएगा। वैष्णव ने जोर देकर कहा कि मोबाइल ऐप और सेंट्रल पोर्टल के माध्यम से रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी, जिससे डेटा की गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार आएगा। साथ ही, एक डेडिकेटेड ‘सेंसस मैनेजमेंट एंड मॉनिटरिंग सिस्टम’ (CMMS) और एक नया ‘हाउसलिस्टिंग ब्लॉक’ (HLB) क्रिएटर वेब मैप टूल भी ऑन-ग्राउंड ऑपरेशन में मदद करेंगे, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी घर या क्षेत्र छूट न जाए।

जातिगत जनगणना का ऐतिहासिक समावेश

इस बार की जनगणना में एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। कैबिनेट कमिटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स ने 30 अप्रैल 2025 को ही इस बात को मंजूरी दे दी थी कि सेंसस 2027 के पॉपुलेशन एन्यूमरेशन फेज़ (दूसरे चरण) में जातिगत डेटा को भी शामिल किया जाएगा। अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की कि जनगणना 2027 में जाति डेटा इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इकट्ठा किया जाएगा।

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यह निर्णय राजनीतिक और सामाजिक रूप से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। हमारे देश में मौजूद भारी सामाजिक और डेमोग्राफिक विविधताओं को देखते हुए यह डेटा भविष्य की नीतियों के लिए आधार का काम करेगा। गौरतलब है कि पिछली व्यापक जाति-आधारित गिनती ब्रिटिश शासनकाल में 1881 से 1931 के बीच की गई थी। आजादी के बाद से अब तक की सभी जनगणनाओं में जाति को बाहर रखा गया था, हालांकि 2011 में एक अलग सोशियो-इकोनॉमिक और जाति जनगणना (SECC) की गई थी। अब पहली बार मुख्य जनगणना प्रक्रिया के भीतर जाति का डेटा इलेक्ट्रॉनिक रूप से रिकॉर्ड किया जाएगा।

30 लाख कर्मचारी और रोजगार के अवसर

देश भर में इस विशालकाय काम को अंजाम देने के लिए लगभग 30 लाख फील्ड कर्मचारियों को तैनात किया जाएगा। इनमें से अधिकांश राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त सरकारी स्कूल के शिक्षक होंगे, जो ‘एन्यूमरेटर’ के रूप में काम करेंगे। सब-डिस्ट्रिक्ट, डिस्ट्रिक्ट और स्टेट लेवल पर सुपरवाइज़र और अन्य सेंसस अधिकारी फील्ड ऑपरेशन में इनकी मदद करेंगे। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी सेंसस कर्मचारियों को उनके नियमित कार्यों के अतिरिक्त किए जाने वाले इस काम के लिए उचित मानदेय दिया जाएगा।

इस डिजिटल-हैवी प्रोजेक्ट के लिए लगभग 18,600 तकनीकी विशेषज्ञों (Technical Manpower) को लगभग 550 दिनों के लिए काम पर रखा जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, इससे लगभग 1.02 करोड़ ‘मैन-डे’ (Man-days) का रोजगार पैदा होगा। जिला और राज्य स्तर पर तकनीकी मैनपावर की तैनाती से कैपेसिटी-बिल्डिंग भी होगी, क्योंकि काम की प्रकृति डिजिटल डेटा हैंडलिंग, मॉनिटरिंग और कोऑर्डिनेशन से जुड़ी है। इससे इन लोगों के लिए भविष्य में नौकरी की संभावनाएं और बेहतर होंगी।

डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के कड़े इंतजाम

चूंकि यह पहली डिजिटल जनगणना है, इसलिए सरकार ने डेटा की सुरक्षा को लेकर विशेष इंतजाम किए हैं। अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि पूरा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत सिक्योरिटी फीचर्स से लैस होगा और इस पर सभी पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून लागू होंगे। अश्विनी वैष्णव ने कहा कि जनगणना हर व्यक्ति और घर का माइक्रो-लेवल डेटा इकट्ठा करेगी, लेकिन इसे मैक्रो-लेवल डेटा के रूप में पेश किया जाएगा।

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मंत्री ने स्पष्ट किया कि जब तक जनगणना का मैक्रो-लेवल डेटा पब्लिश नहीं हो जाता, तब तक हर व्यक्ति का डेटा पूरी तरह गोपनीय रखा जाएगा। डेटा का प्रसार (Dissemination) बहुत ही यूजर-फ्रेंडली तरीके से किया जाएगा ताकि नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं को जरूरी पैरामीटर पर सभी सवाल एक बटन क्लिक करते ही मिल सकें। सरकार का उद्देश्य है कि डेटा को सबसे निचली प्रशासनिक इकाई, यानी गांव और वार्ड स्तर तक आसानी से साझा किया जा सके।

जनगणना-एज़-ए-सर्विस (CaaS) और नीति निर्माण

सरकार ने इस जनगणना को ‘सेंसस-एज़-ए-सर्विस’ (CaaS) के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है। इसका अर्थ है कि यह मंत्रालयों को डेटा एक साफ, मशीन से पढ़े जा सकने वाले (Machine-readable) और एक्शन लेने लायक फॉर्मेट में उपलब्ध कराएगी। यह डेटा नेशनल पॉलिसी और प्लानिंग की रीढ़ बनेगा। जनगणना के नतीजों को ज्यादा कस्टमाइज़्ड विज़ुअलाइज़ेशन टूल्स के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की जाएगी, जिससे आंकड़ों को समझना आसान हो जाएगा।

यह जनगणना विशेष रूप से इसलिए भी अहम होगी क्योंकि इसके नतीजे ‘डिलिमिटेशन’ (परिसीमन) का आधार बनेंगे, जिसके तहत लोकसभा चुनाव क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके काफी महत्वपूर्ण और दूरगामी राजनीतिक परिणाम होंगे, विशेषकर अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों और कम फर्टिलिटी रेट वाले दक्षिणी राज्यों के संदर्भ में।

पहली डिजिटल जनगणना  जागरूकता अभियान और ऐतिहासिक महत्व

जनगणना में जन-भागीदारी को बढ़ावा देने और प्रक्रिया के बारे में भरोसेमंद जानकारी देने के लिए सरकार एक मजबूत और व्यापक जागरूकता अभियान (Awareness Campaign) चलाएगी। इसका उद्देश्य सही, असली और समय पर जानकारी शेयर करना है ताकि लोग बिना किसी भय या भ्रम के अपनी जानकारी साझा करें। यह अभियान आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने और फील्ड ऑपरेशन के लिए समर्थन जुटाने पर केंद्रित होगा।

सेंसस 2027 भारत की 16वीं और आजादी के बाद की आठवीं जनगणना होगी। यह सेंसस एक्ट, 1948 और सेंसस रूल्स, 1990 के कानूनी फ्रेमवर्क के तहत की जाएगी। यह कवायद घर, सुविधाएं, डेमोग्राफी, धर्म, भाषा, शिक्षा, माइग्रेशन, इकोनॉमिक एक्टिविटी और फर्टिलिटी जैसे विषयों पर बारीक डेटा का मुख्य स्रोत बनी हुई है। 2011 में पिछली जनगणना मात्र ₹2,200 करोड़ के बजट पर हुई थी, जबकि इस बार तकनीक और विस्तार के कारण बजट ₹11,718 करोड़ रखा गया है। सरकार की कोशिश है कि पहली डिजिटल जनगणना के माध्यम से आने वाला डेटा पूरे देश में कम से कम समय में उपलब्ध कराया जाए, ताकि भारत के विकास की रूपरेखा को और अधिक सटीक बनाया जा सके।

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