“अरावली का डेथ वारंट?”क्या नई परिभाषा से खत्म होंगे पहाड़?
अरावली का डेथ वारंट? यह सवाल आज हर उस नागरिक के जेहन में है जो दिल्ली-NCR की हवा और पानी की फिक्र करता है। अरावली की कहानी 1990 के दशक की एक ऐतिहासिक जीत से शुरू होती है, जब मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह (जिन्हें ‘वाटरमैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है) और उनके संगठन तरुण भारत संघ ने खनन माफिया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लंबी लड़ाई लड़ी।
1991 में दाखिल जनहित याचिका के बाद 7 मई 1992 की अधिसूचना और 2002-2009 के सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों ने अरावली में खनन पर प्रभावी रोक लगाई थी। इसका परिणाम सुखद रहा—पहाड़ियां फिर हरी-भरी हुईं, ग्राउंडवाटर रिचार्ज बढ़ा और कई जगह 1000-2000 फीट गहराई तक गिरा पानी वापस लौट आया।
इसी संघर्ष की बदौलत थार की रेत दिल्ली-NCR की तरफ नहीं बढ़ी और फरीदाबाद-गुड़गांव जैसे इलाके फिर से जीवंत हो गए।
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जब खदान मजदूर बने जल रक्षक: एक पुनर्जीवन की गाथा
राजेंद्र सिंह की अगुवाई में हुए उस आंदोलन ने न केवल प्रकृति को बचाया, बल्कि सामाजिक बदलाव भी लाया। खदान मजदूरों को जोहड़, तालाब और चेकडैम बनाने में लगाया गया, जिससे हजारों गांव पानीदार बने और क्षेत्र में हिंसा कम हुई। अरावली दिल्ली-NCR के ‘फेफड़ों’ की तरह काम करने लगी, जहां 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां और तेंदुआ, हाइना, नीलगाय जैसी जैव विविधता लौट आई। लेकिन यह खुशहाली अब खतरे में है।
2014 के बाद अवैध खनन फिर तेज हुआ और अब नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक नई परिभाषा को मंजूर कर दिया है। पर्यावरणविद् इसे अरावली का डेथ वारंट? मान रहे हैं क्योंकि अब केवल 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई वाली पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, इससे 12,081 मैप्ड पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 (लगभग 8.7%) ही संरक्षित रहेंगी।
90% पहाड़ संरक्षण से बाहर: शब्दों के जाल में फंसा पर्यावरण
नई परिभाषा के लागू होने से 90% से ज्यादा निचली पहाड़ियां, ढलान, घास के मैदान और ‘रिज’ क्षेत्र अब खनन, निर्माण और रियल एस्टेट के लिए खुल जाएंगे। यह अरावली के पुनर्जीवन की मौत का नया और सबसे खतरनाक अध्याय है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में नए खनन लीज और रिन्यूअल पर रोक लगाई थी, पर 20 नवंबर 2025 के फैसले में 100 मीटर की ऊंचाई वाली परिभाषा को अपना लिया गया, जो राजस्थान में 2006 से ही विवादित रूप से लागू थी।
कोर्ट ने कहा है कि जब तक ICFRE द्वारा नया ‘मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग’ नहीं बन जाता, तब तक नया खनन नहीं होगा। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह केवल समय की बर्बादी है और असल में यह अरावली का डेथ वारंट? साबित होने वाला है।
सरकारी दावे बनाम पर्यावरणविदों की कड़वी हकीकत
केंद्र सरकार का दावा है कि “90% क्षेत्र संरक्षित रहेगा” और केवल 0.19% क्षेत्र में ही खनन संभव है, लेकिन ‘डाउन टू अर्थ’ और वरिष्ठ पर्यावरणविद् इसे एक “कटाक्ष” मानते हैं। उनका तर्क है कि नई परिभाषा 1992 की पुरानी अधिसूचना और इको-सेंसिटिव जोन की मूल भावना को कुचल देती है, जहां 3 डिग्री से अधिक के ढलान, 100 मीटर फुटहिल बफर और पहाड़ों की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती थी।
जून 2025 में शुरू हुआ ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ (5 किमी बफर में वृक्षारोपण और 75 जलाशयों का पुनरुद्धार) एक अच्छा कदम जरूर दिखता है, लेकिन हकीकत में अवैध खनन, स्टोन क्रशर और वेस्ट डंपिंग आज भी बेखौफ जारी हैं।
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राजनीति और क्रोनी कैपिटलिज्म: कौन लिख रहा है विनाश की पटकथा?
इस मुद्दे पर सियासत भी गरमा गई है। विपक्ष इसे अरावली के लिए एक “डेथ वारंट” कह रहा है। सोनिया गांधी और जयराम रमेश ने इसे “गंभीर पर्यावरणीय आपदा” बताया है, जबकि राजेंद्र सिंह ने चेतावनी दी है कि यदि यह फैसला लागू हुआ तो सिर्फ 7-8% अरावली ही बच पाएगी।
सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड कर रहा है, लेकिन सत्ता पक्ष इसे “झूठ फैलाना” करार दे रहा है। हकीकत साफ है कि यह शब्दों का एक ऐसा जाल है, जो संरक्षण के नाम पर विनाश का रास्ता खोल रहा है।
यह क्रोनी कैपिटलिज्म का नंगा नाच है, जहां खनन माफिया, रियल एस्टेट लॉबी (गुड़गांव-फरीदाबाद के बड़े प्रोजेक्ट्स) और सत्ता की मिलीभगत में अरावली को बलि चढ़ाया जा रहा है।
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थार का विस्तार और दिल्ली-NCR का दमघोंटू भविष्य
अरावली का विनाश सिर्फ भूगोल नहीं बदलेगा, बल्कि यह उत्तर भारत की जलवायु को भी तहस-नहस कर देगा। अरावली एक प्राकृतिक बैरियर है जो पश्चिम की गर्म और रेतीली हवाओं को रोकती है। यदि पहाड़ियां नंगी और टूटी हुई होंगी, तो रेत सीधे दिल्ली-NCR तक आएगी, जिससे AQI पहले से ज्यादा खराब होगा और सर्दियों की धुंध और जहरीली हो जाएगी।
ग्राउंडवाटर और तेजी से गिरेगा—महेंद्रगढ़ और भिवानी जैसे जिलों में पानी पहले से ही 1500-2000 फीट गहरे चला गया है। 200 से ज्यादा पक्षी प्रजातियों, तेंदुए और नीलगाय का कॉरिडोर पूरी तरह टूट जाएगा। सरिस्का टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में पहले ही खनन से वन्यजीव कॉरिडोर क्षतिग्रस्त हैं और नई परिभाषा टाइगर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा को भी प्रभावित करेगी।
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ग्रीन वॉल का ढोल और धरातल पर चीखती रिपोर्टें
केंद्र सरकार भले ही जून 2025 में लॉन्च ‘ग्रीन वॉल’ (29 जिलों के 5 किमी बफर में हरियाली) का ढोल पीटती रहे, लेकिन ‘डाउन टू अर्थ’ और मई 2025 की ‘सिटिजन्स रिपोर्ट’ की फील्ड रिपोर्ट्स चीखकर बता रही हैं कि चरखी दादरी, भिवानी और गुड़गांव में पहले ही खनन से 2 अरब साल पुरानी इकोलॉजी नष्ट हो चुकी है।
“सस्टेनेबल माइनिंग” और “क्रिटिकल मिनरल्स” के नाम पर दी जा रही छूट असल में न्यायपालिका के पुराने फैसलों की अनदेखी है। यह संरक्षण नहीं, बल्कि “सस्टेनेबल” के नाम पर विनाश की एक सोची-समझी नीति है। क्या हम वाकई अरावली का डेथ वारंट? खुद अपने हाथों से लिख रहे हैं?
अरावली बचाओ, भारत बचाओ: अब जनक्रांति की जरूरत
अरावली बचाओ आंदोलन 2.0 अब एक जनक्रांति का रूप लेता दिख रहा है। राजेंद्र सिंह जैसे नेताओं, युवाओं और सिविल सोसाइटी को फिर एकजुट होकर 1992 की पुरानी अधिसूचना की बहाली और ‘इको-क्रिटिकल जोन’ की घोषणा के लिए लड़ना होगा।
अगर अरावली खत्म हुई, तो भारत की पर्यावरणीय पहचान भी दफन हो जाएगी। झारखंड से लेकर गोवा तक भारत के कई राज्य पहले ही खनन जनित नुकसान झेल रहे हैं। अब समय है लौटने का, लड़ने का। अरावली बचाओ, भारत बचाओ!



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