Loading Now

बिना PUC नो फ्यूल: दिल्ली में प्रदूषण पर पाबंदी और सियासी घमासान

बिना PUC नो फ्यूल

उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड की दस्तक के साथ ही प्रदूषण का कहर भी चरम पर पहुंच गया है। दिल्ली-NCR समेत उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कई शहर स्मॉग की मोटी चादर में लिपटे हुए हैं। इस संकट के बीच दिल्ली सरकार ने प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं, जिसके तहत अब राजधानी में बिना PUC नो फ्यूल का नियम पूरी सख्ती से लागू कर दिया गया है।

18 दिसंबर से प्रभावी हुए इस आदेश के बाद, पेट्रोल पंपों पर उन वाहनों को ईंधन नहीं दिया जा रहा है जिनके पास वैध पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल (PUC) सर्टिफिकेट नहीं है। इस प्रशासनिक सख्ती के साथ-साथ अब प्रदूषण के मुद्दे पर एक नया सियासी विवाद भी खड़ा हो गया है।

समाजवादी पार्टी के नेता आरके चौधरी के एक हालिया बयान ने इस संकट में धार्मिक और राजनीतिक रंग भर दिया है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा पलटवार किया है।

इसे भी पढ़े :-GRAP-4 प्रतिबंध लागू: दिल्ली AQI गंभीर, स्कूल हाइब्रिड मोड में

प्रदूषण पर SP नेता आरके चौधरी का विवादित बयान और BJP का पलटवार

दिल्ली और उत्तर भारत के शहरों में जारी इस हेल्थ इमरजेंसी के बीच समाजवादी पार्टी के नेता आरके चौधरी ने दावा किया कि लाशें जलाने से भी प्रदूषण बढ़ रहा है। चौधरी ने समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए कहा, “जब लाशें जलाई जाती हैं, तो उनसे कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है, और यह हवा में ऑक्सीजन जलाती है।

यह धर्म के बारे में नहीं, बल्कि पर्यावरण के बारे में है।” उन्होंने आगे होलिका दहन का भी जिक्र करते हुए कहा कि त्योहार के दौरान लकड़ी जलाने से प्रदूषण होता है। उनके इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने पलटवार करते हुए कहा, “मुझे नहीं पता कि वह हिंदू हैं या मुसलमान, उन्हें अपना धर्म बदल लेना चाहिए।”

वहीं BJP सांसद मनन कुमार मिश्रा ने भी इसकी आलोचना करते हुए कहा कि चौधरी को गाड़ियों और पराली का प्रदूषण नहीं दिखता, वे सिर्फ हिंदू धर्म पर हमला करने के लिए गुमराह करने वाले बयान दे रहे हैं।

गैस चैंबर बनी दिल्ली: आनंद विहार में AQI 441 के पार

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति वर्तमान में ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ जैसी बनी हुई है। गुरुवार को दिल्ली का 24 घंटे का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 373 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। सबसे खतरनाक स्थिति आनंद विहार में रही, जहां AQI 441 रिकॉर्ड किया गया, जो ‘गंभीर-प्लस’ श्रेणी में आता है।

शहर के 40 मॉनिटरिंग स्टेशनों में से 15 ने ‘गंभीर’ वायु गुणवत्ता दर्ज की है। विशेषज्ञों का कहना है कि लोग सामान्य सुरक्षा मानकों से कई गुना ज्यादा जहरीली हवा सांस के जरिए शरीर में ले रहे हैं। पर्यावरणविद् विमलेंदु झा के अनुसार, निजी मॉनिटर्स में दिल्ली के कई इलाकों में AQI 800 से 900 के बीच देखा जा रहा है।

उन्होंने चेतावनी दी है कि यह स्थिति बेहद खतरनाक है और इसमें सुधार के लिए सिर्फ लॉकडाउन जैसे अस्थायी समाधान काफी नहीं हैं।

परिवहन और बाहरी राज्यों का योगदान: प्रदूषण के मुख्य कारण

वायु गुणवत्ता प्रबंधन के निर्णय समर्थन प्रणाली (DSS) के आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि दिल्ली के प्रदूषण भार में सबसे बड़ा हिस्सा परिवहन क्षेत्र का है, जो कुल प्रदूषण में 18.3% का योगदान दे रहा है। यही कारण है कि सरकार ने बिना PUC नो फ्यूल जैसे सख्त नियमों को लागू किया है।

इसके अलावा, औद्योगिक गतिविधियां 9.2%, रिहायशी इलाकों का धुआं 4.5% और निर्माण कार्य 2.5% प्रदूषण फैला रहे हैं। दिल्ली के पड़ोसी जिले भी इस संकट को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, झज्जर 12.3%, सोनीपत 8.8% और रोहतक 4.8% के साथ बाहरी योगदानकर्ताओं में प्रमुख हैं। जींद, भिवानी और गुरुग्राम जैसे क्षेत्र भी दिल्ली की हवा को जहरीला बना रहे हैं।


इसे भी पढ़े :-लैंसेट बनाम सरकार: प्रदूषण से मौतें और  “दिल्ली वायु संकट “

जमीन पर सख्ती: सीमाओं पर चेकिंग और भारी भरकम जुर्माना

प्रदूषण कम करने के लिए लागू ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP-4) के तहत दिल्ली की सीमाओं पर अब तक का सबसे कड़ा अभियान चलाया जा रहा है। दिल्ली-नोएडा और गुरुग्राम बॉर्डर पर ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की टीमें तैनात हैं। गैर-दिल्ली निजी वाहनों, जो BS-VI मानकों को पूरा नहीं करते, उन्हें वापस भेजा जा रहा है।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि बिना PUC नो फ्यूल का नियम न केवल प्रदूषण कम करने में सहायक होगा, बल्कि इससे वाहन मालिकों में जिम्मेदारी की भावना भी आएगी। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 15 दिसंबर तक 8,22,000 वाहनों के चालान किए गए हैं, जबकि पिछले साल यह संख्या 2,32,000 थी।

अकेले इस GRAP अवधि में 1,57,000 वाहनों पर 10,000-10,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। पुराने और कंडम वाहनों को जब्त करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है।

दिल्ली सरकार की नई पाबंदियां: वर्क फ्रॉम होम और ईंधन पर रोक

बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए दिल्ली सरकार ने कई नए प्रतिबंधों की घोषणा की है। 17 दिसंबर से प्राइवेट कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे केवल 50% स्टाफ के साथ दफ्तर चलाएं और बाकी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) की सुविधा दें।

इसके अलावा, बिना PUC नो फ्यूल के तहत पेट्रोल पंप मालिकों को सख्त आदेश हैं कि वे बिना सर्टिफिकेट वाले किसी भी वाहन को पेट्रोल या डीजल न दें। साथ ही, दिल्ली के बाहर से केवल BS-VI इंजन वाले वाहनों को ही शहर में प्रवेश की अनुमति दी जा रही है।

पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने स्वयं पेट्रोल पंपों का निरीक्षण किया और लोगों से अपील की कि वे अपने वाहनों का प्रदूषण स्तर तुरंत जांच करवाएं ताकि कड़े दंड से बचा जा सके।

इसे भी पढ़े :-दिल्ली NCR वायु गुणवत्ता: ‘खराब’ स्तर पर प्रदूषण, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

उत्तर भारत के शहरों में वायु प्रदूषण का वर्तमान हाल

प्रदूषण का यह संकट केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। CPCB के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों में हवा की गुणवत्ता चिंताजनक बनी हुई है। ग्रेटर नोएडा में AQI 344, गाजियाबाद में 339 और गुरुग्राम में 276 दर्ज किया गया। वहीं राजस्थान की राजधानी जयपुर में 198, लखनऊ में 195, चंडीगढ़ में 266, देहरादून में 243 और भुवनेश्वर में 298 AQI रिकॉर्ड किया गया।

घने कोहरे और स्मॉग की वजह से विजिबिलिटी कम हो गई है, जिससे यातायात पर भी बुरा असर पड़ रहा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अर्ली वार्निंग सिस्टम के मुताबिक, अगले हफ्ते भी राहत के आसार नहीं हैं और 21 दिसंबर तक AQI फिर से ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच सकता है, जिससे सांस लेना और भी दूषित हो जाएगा।

इसे भी पढ़े :-दिल्ली HC: श्रम कोड पर चिंता, बिना रिपील नोटिफिकेशन लागू

स्वास्थ्य जोखिम: फेफड़ों पर जहरीली हवा का सीधा वार

एक हालिया पांच वर्षीय अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। दिल्ली के लोग भारत के सुरक्षित मानकों से 10 गुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की गाइडलाइंस से लगभग 40 गुना ज्यादा पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5) सांस के जरिए अंदर ले रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, दिल्ली में पुरुषों के फेफड़े महिलाओं की तुलना में अधिक प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि वे सड़क पर ज्यादा समय बिताते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक दलों को ‘ब्लेम गेम’ छोड़कर ठोस दीर्घकालिक नीति बनानी चाहिए, क्योंकि बच्चों के फेफड़े इस राजनीति में नहीं, बल्कि साफ हवा में सांस लेने में रुचि रखते हैं। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए आने वाले कुछ दिनों में दिल्लीवासियों के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed