NCRB मध्य प्रदेश रिपोर्ट: लापता बेटियों के डरावने आंकड़े
NCRB मध्य प्रदेश रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की ‘बेटी बचाओ’ की गूंजती नारेबाजी के बीच लाखों बेटियां और महिलाएं गुमनामी के अंधेरे में खो रही हैं, और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ये आंकड़े इस घोर विफलता की चीख हैं।
2020 से 2022 तक राज्य ने मिसिंग महिलाओं और लड़कियों के मामलों में देशभर में शीर्ष स्थान हासिल किया, जहां कुल 1.98 लाख से अधिक महिलाएं और लड़कियां लापता हो गईं। यह सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि जीवित जिंदगियों का अपहरण है, जो सरकार की महिला सुरक्षा की पोल खोलता है।
जबकि ‘लाड़ली बहना’ योजना के नाम पर वोट बटोरे जा रहे हैं, असलियत में हर रोज 28 महिलाएं और 3 लड़कियां गायब हो रही हैं, और यह सिलसिला 2025 तक भी जारी है।
शर्मनाक रिकॉर्ड: देश में नंबर वन बना मध्य प्रदेश
2020 में NCRB मध्य प्रदेश रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 52,357 महिलाएं लापता हुईं, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा था। अगले साल 2021 में यह संख्या बढ़कर 55,704 हो गई, और 2022 में तो हद पार हो गई जब 1.60 लाख महिलाओं के अलावा 38,000 से अधिक लड़कियां गुम हो गईं।
ये आंकड़े सरकारी दस्तावेजों से निकले हैं, लेकिन सरकार इन्हें ‘सामान्य’ बताकर छिपाने की कोशिश करती है, क्योंकि सच्चाई वोट बैंक को चोट पहुंचाएगी। क्या यह संयोग है कि भाजपा शासित राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है, जबकि पुलिस और प्रशासन की सुस्ती जगजाहिर है?
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2025 तक का भयावह मंजर और सरकारी बेरुखी
2023 से 2025 तक की स्थिति और भी भयावह है, जहां जनवरी 2024 से जून 2025 तक 23,000 से अधिक महिलाएं और लड़कियां एक साल से ज्यादा समय से लापता हैं। सरकारी डेटा खुद यह कबूल करता है कि 31,000 महिलाएं पिछले तीन सालों में गायब हुईं, और औसतन हर दिन 28 लड़कियां गुम हो रही हैं।
बीबीसी की रिपोर्ट ने इस कड़वी हकीकत को उजागर किया है, लेकिन मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार इवेंट्स और प्रचार में व्यस्त है, जैसे कि इन गुमशुदा बेटियों का कोई अस्तित्व ही न हो। यह सुरक्षा की बात नहीं, बल्कि संगठित लापरवाही का प्रमाण है।
पुलिस की सुस्ती और गिरता रिकवरी रेट
NCRB मध्य प्रदेश रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि रिकवरी रेट महज 70% के आसपास है, मतलब हजारों परिवार आज भी अपनी बेटियों के लिए इंसाफ की आस में तरस रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2019-2023 तक कुल मिसिंग पर्सन्स में से आधे अभी भी अनट्रेस्ड हैं, और मध्य प्रदेश इस लिस्ट में टॉप पर है।
पुलिस FIR दर्ज करने में देरी करती है, जांच में सुस्ती बरतती है, और कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना होती है। क्या यह महिला सशक्तिकरण है या महिलाओं के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश, जहां ट्रैफिकिंग और सेक्स रैकेट को अप्रत्यक्ष संरक्षण मिल रहा है?
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दलित और आदिवासी महिलाओं पर बढ़ता प्रहार
ट्रैफिकिंग, अपहरण और सेक्स रैकेट के मामले मध्य प्रदेश में बढ़ते जा रहे हैं, जहां SC/ST महिलाओं के खिलाफ रोज 7 रेप केस रिपोर्ट होते हैं, लेकिन आरोपी फरार रहते हैं। सरकारी आंकड़ों में 575 रेप आरोपी अभी भी आजाद घूम रहे हैं, और मिसिंग लड़कियों का बड़ा हिस्सा इन अपराधों से जुड़ा है।
भाजपा सरकार ‘नारी शक्ति’ का ढोल पीटती है, लेकिन जमीनी हकीकत में दलित-आदिवासी महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय की जड़ें हैं, जो राजनीतिक संरक्षण से पनप रही हैं।
चुनावी रेवड़ी और सुरक्षा की बलि
‘लाड़ली बहना’ योजना का ढोंग जारी है, जबकि असल में यह ‘लाड़ली लापता’ योजना बन चुकी है। सरकार वोट बटोरने के लिए स्कीम्स लाती है, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा पर चुप्पी साध लेती है।
सोशल मीडिया X प्लेटफॉर्म पर कई यूजर्स और विपक्षी नेता इस मुद्दे को उठा रहे हैं, लेकिन मुख्यधारा मीडिया इसे दबाने में लगा है। क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री इन गुमशुदा बेटियों के लिए कभी मीटिंग बुलाएंगे, या चुनावी रैलियों में ही खोए रहेंगे? यह हिपोक्रिसी की हद है।
जवाबदेही से भागती डबल इंजन सरकार
अंत में, मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को जवाबदेह बनाना जरूरी है, क्योंकि ये गुमशुदा महिलाएं और लड़कियां सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि परिवारों की टूटती उम्मीदें हैं।
अगर सच वोट बैंक को नुकसान पहुंचाता है, तो NCRB मध्य प्रदेश रिपोर्ट के आंकड़ों को घालमेल करना बंद करें और ठोस कार्रवाई करें। अन्यथा, ‘बेटी बचाओ‘ का नारा सिर्फ एक खोखला मजाक बनकर रह जाएगा, और हजारों परिवार इंसाफ के लिए तरसते रहेंगे।
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सुरक्षा को प्राथमिकता देने का वक्त
समय आ गया है कि सरकार अपनी नाकामी स्वीकार करे और महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दे, वरना इतिहास डबल इंजन की भाजपा सरकार को माफ नहीं करेगा।
यह संगठित अपराध और प्रशासनिक ढिलाई का वो संगम है जिसने मध्य प्रदेश की शांति को लील लिया है। अब जनता को तय करना है कि उन्हें विज्ञापनों वाली सुरक्षा चाहिए या अपनी बेटियों की वास्तविक सलामती।
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