क्रिसमस 2025: भारत में अल्पसंख्यकों पर हमला और बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा
क्रिसमस 2025 के पावन मौके पर भारत के विभिन्न हिस्सों में अल्पसंख्यकों पर हमला होने की खबरें न केवल चौंकाने वाली हैं, बल्कि यह देश की संवैधानिक आत्मा पर सीधा प्रहार भी हैं। जिस समय देश त्योहार की खुशियां मना रहा था, उस वक्त पलक्कड़ (केरल) में बच्चों के कैरोल ग्रुप पर आरएसएस (RSS) कार्यकर्ता द्वारा हमला किया गया।
इसके साथ ही रायपुर (छत्तीसगढ़) में एक मॉल की क्रिसमस सजावट में तोड़फोड़ और उत्तर प्रदेश के चर्चों में व्यवधान की घटनाएं सामने आईं। ये घटनाएं महज कोई संयोग नहीं हैं, बल्कि एक संगठित नफरत के एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होती हैं। ‘ओपन डोर्स’ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की हालिया रिपोर्ट्स इस भयावह स्थिति की पुष्टि करती हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से नवंबर 2025 तक ईसाइयों के खिलाफ 2,900 से ज्यादा हमलों की घटनाएं दर्ज की गईं, जो पिछले सालों की तुलना में कहीं अधिक हैं। यह नफरत की एक ऐसी महामारी है, जो हमारे पारंपरिक त्योहारों को डर के साये में धकेल रही है।
केरल के पलक्कड़ में मासूमों पर प्रहार और जहरीली विचारधारा
केरल जैसे राज्य, जो अपनी साझी संस्कृति के लिए जाने जाते हैं और जहां सदियों से हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व के साथ रहते आए हैं, वहां पलक्कड़ की घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया है। इस घटना ने साबित कर दिया है कि समाज में विषाक्त विचारधारा की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
पलक्कड़ में एक आरएसएस कार्यकर्ता ने न केवल कैरोल गा रहे बच्चों को पीटा, बल्कि उनके संगीत वाद्ययंत्र भी तोड़ दिए। यह कृत्य जाहिलियत की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए सांसद शशि थरूर ने अपने ‘X’ पोस्ट में इसे “अभूतपूर्व चिंता” का विषय बताया है।
उन्होंने पलक्कड़ की हिंसा के साथ-साथ रायपुर में सांता की मूर्ति जलाने और जबलपुर में एक दृष्टिबाधित (अंधी) ईसाई लड़की पर हुए बर्बर हमले का भी जिक्र किया। ये महज छिटपुट हमले नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से अल्पसंख्यकों को डराने की एक गहरी साजिश है, जो सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का खुला उल्लंघन है।
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छत्तीसगढ़ में तोड़फोड़ और ‘बहुमत की तानाशाही’ का उदय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जो हुआ, वह कानून व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी चुनौती है। वहां एक मॉल में हिंदुत्ववादी गुंडों द्वारा क्रिसमस डेकोरेशन को तहस-नहस करना एक स्पष्ट और क्रूर संदेश है कि भारत में अब अल्पसंख्यकों को अपने त्योहार मनाने का भी हक नहीं रह गया है।
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरी तोड़फोड़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर की गई, जहां धार्मिक रूपांतरण (कन्वर्जन) का आधारहीन बहाना बनाया गया। हकीकत यह है कि ये हमले राजनीतिक संरक्षण के साये में फल-फूल रहे हैं, जहां पुलिस अक्सर मूकदर्शक बनी रहती है।
यह स्थिति “सबका साथ, सबका विकास” के नारे के विपरीत “बहुमत की तानाशाही” का प्रमाण देती नजर आती है। संघ परिवार की यह आक्रामक रणनीति देश को विकास की जगह धार्मिक युद्ध की विनाशकारी राह पर धकेल रही है।
उत्तर प्रदेश में चर्चों की घेराबंदी और नफरत की परछाई
उत्तर प्रदेश समेत कई अन्य हिंदी भाषी राज्यों में इन दिनों चर्चों पर हमलों की एक बाढ़ सी आई हुई है। कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) ने 23 दिसंबर को एक आधिकारिक पत्र जारी कर गहरी चिंता व्यक्त की है। इस पत्र में कहा गया है कि कैरोल सिंगर्स और प्रार्थना सभाओं (कांग्रेगेशन) पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं, जो भारतीय समाज पर “घृणा की छाया” के समान हैं।
शशि थरूर और चर्च के शीर्ष नेताओं, जिनमें आर्कबिशप नेट्टो और कार्डिनल क्लीमिस शामिल हैं, ने “भय और चिंता” के माहौल को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने इस पूरे मामले पर सरकार की “रहस्यमयी चुप्पी” पर कड़े सवाल किए हैं। यह चुप्पी दरअसल अपराधियों के हौसले बुलंद कर रही है।
स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि चर्चों के सामने हनुमान चालीसा का पाठ कर उन्माद फैलाया जा रहा है और क्रिसमस मंडप तोड़े जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या भारत में कानून की सुरक्षा सिर्फ बहुमत के लिए ही बची है?
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सांप्रदायिक जाहिलियत का विस्तार: सांता हैट से लेकर महिलाओं पर हमले
यह समझना भूल होगी कि नफरत की यह आग सिर्फ ईसाई समुदाय तक ही सीमित रहेगी; इतिहास गवाह है कि आज चर्च निशाना हैं, तो कल मस्जिद और परसों गुरुद्वारों की बारी आ सकती है। सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही कई वीडियो और पोस्ट्स इस जाहिलियत की गवाही दे रहे हैं।
ओडिशा में सांता हैट बेचने वाले गरीब दुकानदारों को धमकाया जा रहा है, तो वहीं देश की राजधानी दिल्ली में बजरंग दल के कार्यकर्ता सांता क्लॉज की ड्रेस पहनी महिलाओं को देखकर उन पर हमले कर रहे हैं। यह घृणा की पराकाष्ठा है, जहां व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिए फैलाई गई नफरत को सत्ता का मौन संरक्षण मिल रहा है।
संघियों की यह कट्टरता न केवल समाज को दीमक की तरह खा रही है, बल्कि पूरे राष्ट्र की नींव को कमजोर कर रही है। यह एक कड़वा सवाल है कि रामनवमी पर मस्जिदों के सामने शक्ति प्रदर्शन करने वाले लोग आखिर क्रिसमस पर चर्चों के सामने इतने उन्मादी क्यों हो जाते हैं?
सरकारी मौन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल होती भारत की छवि
इस पूरे संकट के दौरान केंद्र सरकार की भूमिका सबसे अधिक निराशाजनक और शर्मनाक रही है। एक तरफ मोदी सरकार त्योहारों का जश्न मना रही है, लेकिन दूसरी तरफ देश के भीतर अल्पसंख्यकों पर हमला होने की घटनाओं पर प्रधानमंत्री का मौन नहीं टूट रहा।
‘द क्विंट’ की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि 2025 में क्रिसमस के आसपास हेट क्राइम्स (नफरत से प्रेरित अपराध) में जबरदस्त उछाल (स्पाइक) आया है, जिसमें 700 से ज्यादा गंभीर घटनाएं दर्ज की गई हैं। यह “न्यू इंडिया” का वह चेहरा है जो असहिष्णुता से भरा हुआ है।
अल्पसंख्यक अधिकारों का यह खुलेआम उल्लंघन अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की छवि को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। इससे विदेशों में रहने वाले भारतीय डायस्पोरा के लिए भी खतरे पैदा हो सकते हैं। क्या सत्ता में बैठे लोग वाकई नफरत की इसी सप्लाई के जरिए देश चलाना चाहते हैं?
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सह-अस्तित्व के लिए एकजुटता की पुकार
अब वह समय आ गया है जब समाज के हर वर्ग को इस अन्याय के खिलाफ एकजुट होना होगा। जैसा कि शशि थरूर ने अपनी अपील में कहा है, भारत में सह-अस्तित्व केवल न्याय और समानता पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी बहुसंख्यकवादी डर पर।
क्रिसमस का मूल संदेश “शांति, प्रेम और सद्भावना” है, लेकिन जब तक इन हमलों के अपराधी कानूनी तौर पर दंडित नहीं होंगे, तब तक ये संदेश केवल किताबी और खोखले रहेंगे। अल्पसंख्यकों पर हमला लोकतंत्र की हार है।
भारतीय समाज को अब अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, क्योंकि यदि आज हम चुप रहे, तो यह घृणा का जहर अंततः सबको निगल जाएगा। भारत की विविधता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और इसे नफरत की भेंट चढ़ने से बचाना हम सभी का राष्ट्रीय कर्तव्य है।
न्याय की उम्मीद और हमारी जिम्मेदारी
2025 का यह क्रिसमस भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा, यदि शासन-प्रशासन ने तुरंत सुधारात्मक कदम नहीं उठाए। अल्पसंख्यकों पर हमला रोकने के लिए केवल निंदा काफी नहीं है, बल्कि जमीन पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है।
हमें यह समझना होगा कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में हर नागरिक को अपने विश्वास के साथ जीने का समान अधिकार है। यदि हम अपनी विविधता को सुरक्षित नहीं रख पाए, तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का हमारा दावा कमजोर पड़ जाएगा।
वक्त है कि हम नफरत के इस चक्र को तोड़ें और फिर से उस भारत का निर्माण करें जहां हर त्योहार बिना किसी डर के मनाया जा सके।
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