जस्टिस फॉर एंजेल चकमा: पूर्वोत्तर के छात्र की हत्या और नस्लवाद का सवाल
जस्टिस फॉर एंजेल चकमा आज सिर्फ एक सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं, बल्कि उस गहरे जख्म की आवाज है जिसने एक बार फिर देश की सामूहिक चेतना को झकझोर दिया है। एंजेल चकमा की हत्या महज एक युवा की मौत नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की उस गहरी दरार का एक खूनी निशान है, जहां किसी व्यक्ति के “दिखने” के आधार पर उसकी नागरिकता और गरिमा तय की जाती है।
24 साल का यह होनहार छात्र, जो त्रिपुरा से सुनहरे भविष्य के सपने लेकर देहरादून MBA करने पहुंचा था, उसे क्या पता था कि उसकी आंखों में पल रहे सपनों का अंत इतनी बेरहमी से होगा। 9 दिसंबर की वह शाम एक सामान्य दिन की तरह शुरू हुई थी, लेकिन वह नस्लीय घृणा के एक वीभत्स अध्याय में बदल गई।
9 दिसंबर की वो रात: बाजार से मौत के तांडव तक का सफर
घटना की शुरुआत तब हुई जब एंजेल अपने छोटे भाई के साथ बाजार से सामान लेने निकला था। इसी दौरान कुछ नशेड़ी युवकों ने उन्हें निशाना बनाया। विवाद की वजह कोई पुरानी रंजिश नहीं, बल्कि एंजेल का चेहरा और उसकी पहचान थी। उन युवकों ने उसे “ओये चाइनीज, पोर्क खरीदने आए हो?” कहकर उकसाया।
यह हमला केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक था। जब एंजेल ने बड़ी शालीनता और शांति से जवाब दिया कि “हम चाइनीज नहीं, हम भारतीय हैं, प्रमाण-पत्र क्या दिखाएं?”, तो उसके इस आत्मसम्मान भरे जवाब को हमलावरों ने अपनी हार मान लिया। इसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था।
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चाकू, कड़े और लोहे के वार: 17 दिनों का असहनीय संघर्ष
एंजेल के शांतिपूर्ण जवाब के बदले उसे चाकू, कड़े और लोहे की रॉड से किए गए जानलेवा वार मिले। हमलावरों की दरिंदगी का आलम यह था कि उन्होंने एक निहत्थे छात्र को तब तक मारा जब तक वह लहूलुहान होकर गिर नहीं गया। गंभीर हालत में एंजेल को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वह 17 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा।
अंततः 25-26 दिसंबर की रात उसकी सांसें थम गईं। यह मौत प्राकृतिक नहीं थी; यह नस्लीय घृणा द्वारा की गई एक सोची-समझी हत्या का परिणाम थी। आज पूरा देश जस्टिस फॉर एंजेल चकमा के नारे के साथ खड़ा है क्योंकि यह हमला किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि भारत की विविधता पर था।
पूर्वोत्तर के युवाओं की नियति: अपनों के बीच “विदेशी” होने का दंश
यह दुखद मामला कोई पहली घटना नहीं है। दशकों से उत्तर-पूर्व के लोग भारत के मुख्यधारा के शहरों में “विदेशी” की तरह देखे और समझे जाते हैं। उनकी आंखों की बनावट, चेहरे का आकार और रंग उन्हें “चीनी” या “नेपाली” जैसे टैग दे देता है।
दिल्ली की सड़कों पर चलते हुए “मोमो वाला चाइनीज” कहना, मेट्रो में असहज तरीके से घूरना, होस्टल में कमरे देने से मना करना या जॉब इंटरव्यू में योग्यता के बजाय “आप तो चाइनीज लगते हो” सुनना—यह वह रोजमर्रा की हिंसा है जिसे पूर्वोत्तर का हर युवा झेलता है। एंजेल का मामला उसी ज्वालामुखी का विस्फोट है, जो वर्षों से समाज के भीतर सुलग रहा था।
पुलिसिया कार्रवाई और “नस्लवाद” के एंगल पर उठते गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। शुरुआत में पुलिस ने इसे “साधारण मारपीट” की श्रेणी में रखा, लेकिन मौत के बाद हत्या की धारा जोड़ी गई। हालांकि पांच आरोपी गिरफ्तार हुए हैं और मुख्य आरोपी नेपाल भाग गया है, लेकिन पुलिस का यह बयान कि “अभी तक नस्लवाद का कोई सबूत नहीं मिला”, चौंकाने वाला है।
पीड़ित के भाई ने FIR में स्पष्ट लिखा है कि उन्हें “चिंकी, चाइनीज और मोमो” कहकर गालियां दी गईं। जस्टिस फॉर एंजेल चकमा की मुहिम के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जांच एजेंसियां संरचनात्मक पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं? क्या आरोपियों के “मुख्यधारा” से होने के कारण नस्लीय कोण को नजरअंदाज किया जा रहा है?
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राष्ट्रीय आक्रोश: बयानों से आगे बढ़कर ठोस बदलाव की जरूरत
एंजेल की मौत के बाद त्रिपुरा में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। मोमबत्ती जुलूसों से लेकर सोशल मीडिया के हर कोने तक न्याय की पुकार है। मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा, असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा और सांसद शशि थरूर जैसे नेताओं ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार दिया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाएंगे? जब तक देश में नस्लीय हिंसा के खिलाफ विशेष कठोर कानून नहीं बनता और स्कूलों के पाठ्यक्रम में पूर्वोत्तर की संस्कृति व इतिहास को अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक ऐसे अपराधों पर लगाम लगाना असंभव है।
एक फौजी पिता की विडंबना: सीमा सुरक्षित, पर बेटा नहीं
एंजेल के पिता एक BSF जवान हैं, जो सीमा पर खड़े होकर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस पिता ने अपना जीवन देश की रक्षा में लगा दिया, उसका बेटा देश के अंदर ही “विदेशी” कहकर मार दिया गया। यह केवल एक परिवार की क्षति नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय अपराध है।
पूर्वोत्तर के लाखों युवा पढ़ाई और रोजगार के लिए बड़े शहरों का रुख करते हैं, लेकिन हर मोड़ पर उन्हें अपनी भारतीयता साबित करने के लिए मजबूर किया जाता है। कभी पासपोर्ट, कभी भाषा तो कभी फेसबुक प्रोफाइल—यह भेदभाव किसी आंतरिक उपनिवेशवाद (Internal Colonialism) से कम नहीं है।
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सामूहिक अंतरात्मा का सवाल: क्या हम अब भी खामोश रहेंगे?
एंजेल के वे आखिरी शब्द—”हम भारतीय हैं, प्रमाण-पत्र क्या दिखाएं?”—आज हर भारतीय से सवाल पूछ रहे हैं। हकीकत तो यह है कि प्रमाण-पत्र की जरूरत उन लोगों को है, जो खुद को भारतीय कहते हुए भी अपने ही हमवतन की जान ले लेते हैं। एंजेल की मौत हमारे तथाकथित सभ्य समाज के चेहरे पर एक तमाचा है।
जस्टिस फॉर एंजेल चकमा केवल एक हैशटैग नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक अंतरात्मा की परीक्षा है। अगर हम आज भी चुप रहे और व्यवस्था में बदलाव की मांग नहीं की, तो कल फिर कोई दूसरा एंजेल इस नफरत की भेंट चढ़ जाएगा। न्याय सिर्फ एंजेल को नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं को चाहिए जो हर दिन अपमान का घूंट पीकर जीने को मजबूर हैं।
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