अरुणाचल पर चीनी आक्रामकता और पूर्वोत्तर सुरक्षा का बड़ा संकट
अरुणाचल पर चीनी आक्रामकता चीन का अरुणाचल प्रदेश पर दावा अब केवल प्रतीकात्मक बयानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक खतरनाक मोड़ ले चुका है। दिसंबर 2025 में जारी पेंटागन की वार्षिक रिपोर्ट ‘मिलिट्री एंड सिक्योरिटी डेवलपमेंट्स इनवॉल्विंग द पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना 2025’ ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग ने अब आधिकारिक तौर पर अरुणाचल प्रदेश (जिसे वे “ज़ंगनान” या दक्षिणी तिब्बत कहते हैं) को अपने “कोर इंटरेस्ट्स” (प्रमुख हितों) की सूची में शामिल कर लिया है। अब इसे चीन उसी प्राथमिकता पर रख रहा है जैसे ताइवान, दक्षिण चीन सागर और सेनकाकू द्वीप समूह को रखा जाता है।
यह कदम चीन की 2049 तक की “ग्रेट रिजुवेनेशन ऑफ द चाइनीज नेशन” नामक राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता के विस्तार के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
शांति की आड़ में पाकिस्तान के साथ सैन्य गठजोड़ और रणनीतिक साजिश
पेंटागन की रिपोर्ट एक तरफ चीन के दोहरे चरित्र को उजागर करती है, जहाँ वह LAC पर तनाव कम करके भारत के साथ संबंध स्थिर करने का दिखावा कर रहा है, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे भारत को घेरने की बड़ी तैयारी कर रहा है। बीजिंग का असली मकसद अमेरिका और भारत के बीच बढ़ती नजदीकियों को रोकना है। इसके लिए वह पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग को अभूतपूर्व स्तर पर ले जा रहा है।
हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि चीन की अरुणाचल पर चीनी आक्रामकता अब कूटनीतिक गलियारों से निकलकर आम नागरिकों के उत्पीड़न तक पहुँच गई है।
नवंबर 2025 में शंघाई एयरपोर्ट पर अरुणाचल की मूल निवासी भारतीय महिला प्रेमा थोंगडोक को 18 घंटे तक हिरासत में रखना और उनके पासपोर्ट को “अमान्य” घोषित करना इसी आक्रामक नीति का नवीनतम और चिंताजनक उदाहरण है।
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मानचित्र युद्ध: नामों का ‘मानकीकरण’ और पांचवीं सूची का वार
चीन ने वर्ष 2025 में भी अरुणाचल प्रदेश में भौगोलिक स्थानों के नाम बदलने का अपना विवादित सिलसिला जारी रखा। मई 2025 में चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय (Civil Affairs Ministry) ने अरुणाचल की 27 महत्वपूर्ण जगहों, जिनमें पहाड़, दर्रे, नदियाँ और झीलें शामिल हैं, के “स्टैंडर्डाइज्ड” नाम जारी किए।
2017 के बाद से यह पांचवीं बार है जब चीन ने ऐसी हिमाकत की है, जिससे अब तक कुल 89 स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं। ये नाम चीनी, तिब्बती और पिनयिन लिपियों में कोऑर्डिनेट्स और मैप्स के साथ जारी किए गए हैं।
भारत ने इस कदम को “निरर्थक और हास्यास्पद” (Vain and Preposterous) करार देते हुए स्पष्ट किया है कि अरुणाचल भारत का “अभिन्न और अटूट” हिस्सा है।
शियाओकांग बॉर्डर विलेज: कब्जे की नीयत और ड्यूल-यूज़ इंफ्रास्ट्रक्चर
चीन की रणनीति केवल कागजों पर नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जमीन पर लंबे समय तक कब्जे की तैयारी कर रहा है। तिब्बत की तर्ज पर अरुणाचल सीमा के पास चीन “शियाओकांग” बॉर्डर विलेजेस का निर्माण कर रहा है।
ये गांव ‘ड्यूल-यूज़’ प्रकृति के हैं, जिन्हें नागरिक आवास के साथ-साथ सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। विशेष रूप से तवांग सेक्टर में ये गांव LAC के बिल्कुल करीब बसाए गए हैं। गौरतलब है कि चीन, जो पहले केवल तवांग पर अपना हक जताता था, अब वह पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोक रहा है।
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मणिपर हिंसा में ड्रोन तकनीक और हथियारों का म्यांमार कनेक्शन
उत्तर-पूर्वी भारत, विशेषकर मणिपुर में 2023 से जारी जातीय हिंसा ने अब एक नया और घातक रूप ले लिया है। 258 से अधिक मौतों और 60,000 से अधिक लोगों के विस्थापन के बाद, 2024-2025 में कुकी-ज़ो और मीती समुदायों के बीच संघर्ष में अब ड्रोन हमलों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
कौट्रुक और कदंगबंद जैसे इलाकों में ड्रोन से बम गिराए जाने की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया है। NIA की जांच में खुलासा हुआ है कि ये ड्रोन दिल्ली और हरियाणा से सप्लाई किए गए थे, लेकिन इनमें इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक हथियारों का बड़ा स्रोत म्यांमार है।
म्यांमार के गृहयुद्ध में चीन का प्रभाव गहरा है; वह एक तरफ जुंटा सरकार को 2024-2025 में बड़े हथियार ऑर्डर सप्लाई कर रहा है, तो दूसरी तरफ सीमा पर सक्रिय एथनिक आर्म्ड ऑर्गनाइजेशंस (EAOs) को भी नियंत्रित करता है।
PLA मणिपुर और विदेशी शक्तियों की मिलीभगत का खतरा
हालांकि कुकी विद्रोहियों को सीधे चीन से हथियार मिलने के ठोस सबूत फिलहाल नहीं मिले हैं, लेकिन म्यांमार-चीन सीमा पर स्थित ब्लैक मार्केट और पुरानी रिपोर्ट्स (ULFA और PLA जैसे समूहों का इतिहास) हथियारों के अवैध प्रवाह की पुष्टि करती हैं। दिसंबर 2025 में PLA मणिपुर द्वारा असम राइफल्स पर किए गए ड्रोन हमले की जिम्मेदारी लेना इस खतरे को और गंभीर बनाता है, जो सीधे तौर पर म्यांमार से प्रेरित लगता है।
चीन और पाकिस्तान की यह जुगलबंदी भारत के उत्तर-पूर्व को अस्थिर करने का एक बड़ा माध्यम बन सकती है। पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन पाकिस्तान को J-10C फाइटर जेट्स जैसे घातक हथियार दे रहा है, जबकि पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से उत्तर-पूर्वी उग्रवादियों का समर्थक रहा है।
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बीजिंग-इस्लामाबाद-ढाका त्रिकोणीय बैठक और हाइब्रिड वारफेयर
साल 2025 में बीजिंग द्वारा इस्लामाबाद और ढाका के साथ बुलाई गई त्रिकोणीय बैठक को भारतीय रणनीतिकार भारत के “एक्ट ईस्ट” पॉलिसी को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। CPEC की सुरक्षा और उत्तर-पूर्व में अस्थिरता पैदा करना चीन और पाकिस्तान का साझा लक्ष्य प्रतीत होता है।
अरुणाचल पर चीनी आक्रामकता अब “हाइब्रिड वारफेयर” के रूप में सामने आ रही है। इसमें सीधा युद्ध करने के बजाय दावे करना, नाम बदलना, ब्रह्मपुत्र नदी पर विशाल बांध बनाना, सीमा पर गांव बसाना और म्यांमार-पाकिस्तान जैसे प्रॉक्सी के जरिए आंतरिक कमजोरियां पैदा करना शामिल है।
हालांकि भारत ने जवाब में 1,840 किमी लंबा अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे और सेला टनल जैसे प्रोजेक्ट्स तेज किए हैं, लेकिन पांगोंग त्सो के पास चीन की नई बिल्डिंग्स और बुनियादी ढांचा विश्वास की कमी को और बढ़ा रहा है।
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भविष्य की चुनौतियां: निर्णायक कूटनीति और सैन्य तैयारी की आवश्यकता
जनवरी 2026 तक के हालात बताते हैं कि पूर्वी लद्दाख में कुछ प्रगति के बावजूद अरुणाचल में तनाव चरम पर है। उत्तर-पूर्व में ड्रोन और सोफिस्टिकेटेड हथियारों का प्रवेश अब केवल एक जातीय संघर्ष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका है। यदि इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो मणिपुर, नागालैंड और असम एक बार फिर 1990 के दशक जैसी अस्थिरता की आग में झुलस सकते हैं।
अरुणाचल पर चीनी आक्रामकता को देखते हुए भारत को अब डिप्लोमैटिक, इंटेलिजेंस और सैन्य स्तर पर निर्णायक कदम उठाने होंगे। म्यांमार सीमा का कड़ा प्रबंधन और चीन को उसी की “कोर इंटरेस्ट” वाली भाषा में जवाब देना समय की मांग है।
भारत को अब केवल “लाल आँखें” दिखाने की नहीं, बल्कि एक बहुआयामी रिस्पॉन्स की जरूरत है ताकि उत्तर-पूर्व का उग्रवाद और चीन का विस्तारवाद मिलकर किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप न ले लें।
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