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उन्नाव पीड़िता बनाम सिस्टम: न्याय और रसूखदारों की जंग

उन्नाव पीड़िता बनाम सिस्टम

उन्नाव पीड़िता बनाम सिस्टम के बीच चल रही यह लंबी लड़ाई आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ती दिख रही है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट का हालिया आदेश, जिसमें पीड़िता के आवाज़ के नमूनों के फोरेंसिक परीक्षण की अनुमति दी गई है, पहली नजर में कानून की सामान्य प्रक्रिया लग सकती है।

लेकिन इसकी गहराई में उतरें तो यह उस पीड़िता की विश्वसनीयता को कमजोर करने का एक हताश प्रयास नजर आता है, जिसने पहले ही ताकतवर शिकारियों के हाथों नारकिय प्रताड़ना झेली है।

आरोपी शुभम सिंह—जो दोषी ठहराए गए बलात्कारी और पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के करीबी सहयोगी शशि सिंह का पुत्र है—उसने यह आवेदन विवादित ऑडियो क्लिप्स के सत्यापन के नाम पर दायर किया है।

यह वास्तव में एक सोची-समझने रणनीति है जिसका एकमात्र उद्देश्य उस महिला की मानसिक और कानूनी पीड़ा को अनंत काल तक खींचना है, जिसके परिवार ने 2017 से अब तक सुनियोजित दुर्घटनाओं, जानलेवा धमकियों और व्यवस्थित दमन का सामना किया है।

फोरेंसिक की आड़ में छिपी कानूनी साजिश

भारत जैसे देश में जहाँ महिलाओं के लिए न्याय की डगर पहले ही कांटों भरी है, वहां यह कदम एक खतरनाक मिसाल पेश करता है। उन्नाव पीड़िता बनाम सिस्टम के इस अध्याय में देखा जा सकता है कि कैसे रसूखदार आरोपी, अदालती प्रक्रियाओं को ही हथियार बनाकर आरोप लगाने वालों के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं।

फोरेंसिक जांच के धुएँ के पीछे छिपकर चरित्र हनन और देरी करने की यह तकनीक नई नहीं है, लेकिन जिस तरह से इसे अंजाम दिया जा रहा है, वह भयावह है।

एक तरफ जहां मुख्य अपराधी कुलदीप सेंगर को भारी जन-आक्रोश के बाद पार्टी से निकाला गया, वहीं उसका रसूखदार नेटवर्क आज भी पर्दे के पीछे से शुभम जैसे मोहरों के जरिए तार खींच रहा है ताकि न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाया जा सके।

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अंकिता भंडारी हत्याकांड: राजनीतिक संरक्षण का सन्न करने वाला पैटर्न

जब हम उत्तराखंड के अंकिता भंडारी हत्याकांड की ओर रुख करते हैं, तो वहां भी निर्दोषता का चोगा पहने राजनीतिक संरक्षणवाद का एक वही पैटर्न दिखाई देता है जो हमने उन्नाव में देखा था। 19 वर्षीय रिसेप्शनिस्ट अंकिता, जिसने रसूखदारों की ‘वीआईपी’ मांगों का विरोध किया था, उसे 2022 में बेरहमी से एक नहर में धकेल दिया गया।

जिस रिसॉर्ट में यह घिनौना खेल हुआ, उसका मालिक भाजपा नेता का पुत्र पुलकित आर्य है। यहाँ भी सत्ता और अपराध का गठजोड़ इतना गहरा है कि जांच की निष्पक्षता पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं।

उन्नाव पीड़िता बनाम सिस्टम की तरह ही अंकिता का मामला भी इस बात का गवाह है कि जब अपराधी सत्ता के गलियारों से जुड़े होते हैं, तो न्याय का रास्ता कितना पथरीला हो जाता है।

वीआईपी एंगल और सत्ता की अलिबाई

अंकिता हत्याकांड में “वीआईपी कोण” की गूँज अब भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम की ओर इशारा कर रही है। एक पूर्व भाजपा विधायक की पत्नी के इन सनसनीखेज आरोपों ने आग में घी डालने का काम किया है कि गौतम वहां मौजूद थे और अंकिता पर अनैतिक संबंधों के लिए दबाव बना रहे थे।

हालांकि, गौतम इन आरोपों को विपक्ष की “साजिश” बताकर खारिज कर रहे हैं। यह कितनी सुविधाजनक बात है कि सत्ताधारी दल के दिग्गजों पर लगने वाला हर आरोप फौरन राजनीतिक साजिश करार दे दिया जाता है।

यहाँ तक कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद गौतम के बचाव में उतर आते हैं और गारंटी देते हैं कि वे उस समय राज्य में थे ही नहीं। सत्ता द्वारा दी गई यह ‘अलिबाई’ अब न्याय के सिद्धांत से ऊपर मानी जाने लगी है।

अदालती हस्तक्षेप: रसूखदारों के लिए तत्काल राहत, पीड़ितों के लिए इंतज़ार

इस पूरे प्रकरण में दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप चुनिंदा न्याय का एक उत्कृष्ट और कड़वा नमूना पेश करता है। जहाँ अंकिता जैसी बेटियों की चीखें सालों साल खाली अदालतों की दीवारों से टकराकर दम तोड़ देती हैं, वहीं एक भाजपा नेता की मानहानि याचिका पर रातों-रात अंतरिम राहत मिल जाती है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और विपक्षी दलों को आदेश दिया जाता है कि वे गौतम से जुड़े पोस्ट तुरंत हटा दें। यह न्याय की गति नहीं, बल्कि उस किलेबंदी की ताकत है जो अभिजात वर्ग के चारों ओर खड़ी की गई है।

यहाँ सवाल उठाने वालों पर एफआईआर और पूछताछ की बौछार होती है, लेकिन ताकतवरों के खिलाफ जांच कछुआ गति से चलती है या अनिश्चित काल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।

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सबूतों को मिटाने और ध्यान भटकाने की रणनीति

अंकिता के मामले में जिस तेजी से रिसॉर्ट को ढहाया गया, वह जांच शुरू होने से पहले ही सबूतों को नष्ट करने की एक सोची-समझी कोशिश प्रतीत होती है। अब गौतम का नाम सामने आने पर जांच के बजाय ‘गैग ऑर्डर’ (चुप कराने का आदेश) जारी होना व्यवस्था की सड़न को दर्शाता है।

उन्नाव पीड़िता बनाम सिस्टम की लड़ाई हो या अंकिता के लिए न्याय की मांग, सत्ता की रणनीति स्पष्ट है: देरी करो, ध्यान भटकाओ और अंततः पीड़ित को ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर दो। यह सब उस “नए भारत” के शोर के बीच हो रहा है जहाँ ‘महिला सुरक्षा’ केवल एक चुनावी नारा बनकर रह गया है, जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट और डरावनी है।

न्यायिक विफलता और रसूखदारों का ‘अमृतकाल’

यह विडंबना अत्यंत कड़वी है कि जो अदालतें रेप किट की जांच और गवाह सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर वर्षों तक पैर घसीटती हैं, वे आरोपियों की “प्रतिष्ठा” बचाने के मामले में असाधारण तेजी दिखाने लगती हैं। पीड़िता की आवाज का फोरेंसिक टेस्ट तो तुरंत मंजूर हो जाता है, लेकिन उन राजनीतिक संबंधों का फोरेंसिक विश्लेषण कभी नहीं होता जो इन अपराधों की जड़ में हैं।

गौतम की मुकदमेबाजी में 11 प्रतिवादियों को शामिल करना असल में उठते हुए तूफान को दबाने की कोशिश है। उन्नाव और उत्तराखंड की ये बेटियां कोई प्रेतात्माएं नहीं हैं, बल्कि वे पक्षपातपूर्ण राजनीति द्वारा भारतीय भूमि पर उतारे गए इस कथित ‘अमृतकाल’ के जीवित और लहूलुहान स्मारक हैं।

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न्याय का प्रहसन और जवाबदेही का अंत

अंततः, इस विकृत नाटक में “आरोपी के लिए न्याय” की मांग ने पूरी पटकथा को ही पलट कर रख दिया है। ऐसा लगता है मानो हत्यारे और बलात्कारी वीआईपी व्यवहार के हकदार हैं, जबकि पीड़ित न्याय के चंद टुकड़ों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

शुभम की अर्जी और गौतम के अहंकार को अदालती मरहम तो मिल गया, लेकिन उस व्यवस्था का ऑडिट कौन करेगा जिसने इन अपराधियों को फलने-फूलने का मौका दिया? यह वास्तव में एक ऐसा तंत्र बन गया है जहाँ ताकतवरों को अलिबाई, विपक्ष को गैग ऑर्डर और महिलाओं को संदेह की परतों के नीचे दफन किया जाता है।

अब समय आ गया है कि आवाजों और नहरों के बजाय, हमारी न्यायिक डिलीवरी और राजनीतिक सड़ांध का असली फोरेंसिक ऑडिट किया जाए, वरना न्याय केवल एक प्रहसन बनकर रह जाएगा।

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