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महाराष्ट्र चुनाव: चुनाव आयोग का लाड़की बहिन योजना की फंड रोक का आदेश

महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक तापमान अपने चरम पर है। राज्य चुनाव आयोग (SEC) ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का हवाला देते हुए राज्य सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी ‘लाड़की बहिन’ योजना के तहत लाभार्थियों के बैंक खातों में फंड रोक लगा दी है। यह फैसला 15 जनवरी को होने वाले 29 नगर निगमों के मतदान से ऐन पहले आया है। आयोग का यह कड़ा रुख कांग्रेस पार्टी की उस शिकायत के बाद देखने को मिला, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मकर संक्रांति के बहाने एडवांस फंड का वितरण मतदाताओं को प्रभावित करने और उन्हें ‘सरकारी रिश्वत’ देने का एक प्रयास है। इस फैसले ने महायुति सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, क्योंकि मतदान में अब महज कुछ ही घंटे शेष हैं।

आचार संहिता और एडवांस पेमेंट पर विवाद की पूरी कहानी

विवाद की शुरुआत तब हुई जब बीजेपी नेता और राज्य मंत्री गिरीश महाजन ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए दावा किया कि लाड़की बहिन योजना के लाभार्थियों को मकर संक्रांति के ‘खास तोहफे’ के रूप में दिसंबर और जनवरी की दो किस्तें (कुल ₹3,000) एक साथ 14 जनवरी तक मिल जाएंगी। महाजन ने इसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से एक विशेष सौगात बताया था। जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, विपक्षी कांग्रेस ने इसे चुनावी लाभ के लिए उठाया गया कदम करार दिया। आयोग ने स्पष्ट किया है कि नियमित भुगतान जारी रह सकते हैं, लेकिन चुनाव अवधि के दौरान किसी भी तरह के अग्रिम या एडवांस भुगतान पर फंड रोक जारी रहेगी, ताकि चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनी रहे।

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कांग्रेस का आरोप: ‘मतलबी भाई’ मांग रहे हैं वोटों का रिटर्न गिफ्ट

कांग्रेस पार्टी इस योजना के क्रियान्वयन को लेकर शुरू से ही आक्रामक रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल और प्रवक्ता सचिन सावंत ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता ‘मतलबी भाई’ हैं। सावंत ने आरोप लगाया कि सरकार ने जानबूझकर दो महीने की किस्तें रोक रखी थीं ताकि चुनाव प्रचार के दौरान इसे बांटकर वोटों के रूप में ‘रिटर्न गिफ्ट’ हासिल किया सके। कांग्रेस नेता और वकील संदेश कोंडविलकर ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इसे “सामूहिक सरकारी रिश्वतखोरी” बताया था। कांग्रेस का तर्क है कि टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल किसी पार्टी की निजी संपत्ति की तरह वोट खरीदने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

अनियमितताओं और 165 करोड़ के दुरुपयोग का साया

‘लाड़की बहिन’ योजना न केवल चुनावी विवादों बल्कि वित्तीय अनियमितताओं के कारण भी चर्चा में रही है। ऐसी खबरें आई हैं कि पुरुषों और कई अपात्र महिलाओं को भी इस योजना का लाभ मिला है, जिससे अनुमानित ₹164-165 करोड़ के सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है। कांग्रेस महासचिव संदेश कोंडविलकर ने आयोग को बताया कि इस योजना के तहत एक करोड़ से अधिक महिला मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में आयोग ने मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल से एक दिन के भीतर रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट मिलने के बाद आयोग ने स्पष्ट आदेश दिया कि चुनाव आचार संहिता के दौरान कोई भी नया लाभार्थी नहीं जोड़ा जाएगा।

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चुनाव आयोग की स्पष्टीकरण और मुख्य सचिव की रिपोर्ट

राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “हमने एडवांस पेमेंट की अनुमति नहीं देने का फैसला किया है। इसके अलावा, राज्य नए लाभार्थियों को नहीं जोड़ सकता।” मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल ने अपने जवाब में कहा था कि जो विकास कार्य और योजनाएं 4 नवंबर (आचार संहिता लागू होने की तिथि) से पहले शुरू हो चुकी थीं, उन्हें जारी रखा जा सकता है। हालांकि, आयोग ने मीडिया रिपोर्ट्स और शिकायतों की गहराई से जांच के बाद यह पाया कि 14 जनवरी को भुगतान करना सीधे तौर पर 15 जनवरी के मतदान को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण, आयोग ने एडवांस वितरण पर फंड रोक लगाने का सख्त निर्देश जारी किया।

बीजेपी का पलटवार: ‘कांग्रेस महिलाओं की खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकती’

दूसरी तरफ, बीजेपी और महायुति के नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी महाराष्ट्र की ‘प्यारी बहनों’ से नफरत करती है और उनकी खुशी बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि यह एक निरंतर चलने वाली कल्याणकारी योजना है और यह चुनाव आचार संहिता के प्रतिबंधों के तहत नहीं आती है। बीजेपी का दावा है कि कांग्रेस केवल तकनीकी बाधाएं उत्पन्न करके महिलाओं को उनके हक के लाभ से वंचित करना चाहती है। बीजेपी नेताओं के अनुसार, मकर संक्रांति एक महत्वपूर्ण त्योहार है और उस समय फंड देना केवल एक मानवीय कदम था।

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नागपुर नगर निगम चुनाव और पोस्टरों पर मची रार

नागपुर में भी चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में यह मुद्दा गरमाया हुआ है। वहां बीजेपी उम्मीदवारों द्वारा प्रभागीय स्तर पर बांटे गए पोस्टरों में प्रमुखता से जिक्र किया गया था कि महिला लाभार्थियों को 14 जनवरी को ₹3,000 मिलेंगे। कांग्रेस ने इसे आदर्श आचार संहिता का खुला उल्लंघन बताते हुए आयोग का दरवाजा खटखटाया। जांच के बाद आयोग ने नागपुर में भी ₹3,000 के भुगतान पर रोक लगा दी, हालांकि ₹1,500 की नियमित किस्त जारी करने की अनुमति दी गई है। अधिकारियों ने दोहराया कि मतदान की तारीखों से सीधे तौर पर नकदी लाभ को जोड़ने वाली किसी भी प्रचार सामग्री की कड़ी जांच की जाएगी।

भविष्य की अनिश्चितता और लाभार्थियों का इंतजार

इस पूरे कानूनी और राजनीतिक विवाद के बीच सबसे अधिक प्रभावित वे महिलाएं हैं जो इस सहायता राशि का इंतजार कर रही थीं। राज्य महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि चुनाव खत्म होने तक आचार संहिता लागू रहेगी, इसलिए किस्तों के वितरण में और देरी हो सकती है। आयोग द्वारा लगाई गई इस फंड रोक के बाद अब लाभार्थियों को पैसा मिलने में लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। 15 जनवरी को होने वाले मतदान में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आयोग का यह फैसला मतदाताओं के मूड को बदलता है या महायुति अपनी इस प्रमुख योजना के दम पर नगर निगमों की सत्ता पर कब्जा बरकरार रख पाती है।

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