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ब्लिंकिट 10-मिनट डिलीवरी टैग हटा, क्विक कॉमर्स की ब्रांडिंग में बड़ा बदलाव

ब्लिंकिट 10-मिनट डिलीवरी टैग हटने से ग्राहकों की उम्मीदें और गिग वर्कर्स की सुरक्षा पर गहरा असर पड़ने की संभावना है।

क्विक कॉमर्स की दुनिया में एक बड़ा फेरबदल हुआ है। ब्लिंकिट ने अपनी चर्चित ब्लिंकिट 10-मिनट डिलीवरी ब्रांडिंग को पूरी तरह से हटा दिया है। हम सबने सुना है कि ब्लिंकिट अब 10 मिनट के वादे से पीछे हट रहा है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह कदम किसी की जिंदगी में, विशेषकर गिग वर्कर्स की जिंदगी में, क्या बदलाव लाएगा। हालांकि यह कस्टमर्स की उम्मीदों को कम करने में काम आ सकता है, लेकिन यह क्विक कॉमर्स के बुनियादी कामकाज को नहीं बदलेगा। दूध से लेकर आईफोन तक सब कुछ तुरंत पहुंचाने की आदत हमें पड़ चुकी है, लेकिन अक्सर यह डिलीवरी 10 मिनट में नहीं होती। ब्लिंकिट का कहना है कि वह ब्रांडिंग हटा रहा है, लेकिन डिलीवरी हिस्ट्री बताती है कि डार्क स्टोर की दूरी ही समय तय करती है।

सरकार का दखल और श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया की सक्रियता

यह महत्वपूर्ण बदलाव केंद्र सरकार के अधिकारियों के सीधे दखल के बाद हुआ है। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया ने ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी और ज़ोमैटो के अधिकारियों के साथ बातचीत की और डिलीवरी कर्मचारियों की सुरक्षा के हित में डिलीवरी के पक्के समय के वादों को खत्म करने का आग्रह किया। मंत्री ने जोर दिया कि तेज़ समय-सीमा राइडर्स पर बेवजह दबाव डालती है। इसके बाद, कंपनियों ने आश्वासन दिया कि वे विज्ञापनों और ब्रांडिंग सामग्री से ‘टाइम-बाउंड’ प्रतिबद्धताओं को हटा लेंगी। ब्लिंकिट 10-मिनट डिलीवरी का वादा हटने के बाद अब कंपनी ने अपनी टैगलाइन को “10 मिनट में 10,000+ प्रोडक्ट” से बदलकर “आपके दरवाज़े पर 30,000+ प्रोडक्ट” कर दिया है।

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डार्क स्टोर का मॉडल: 10 मिनट की डिलीवरी का असली सच

ज़ोमैटो के फाउंडर दीपेंद्र गोयल के अनुसार, बिजनेस मॉडल डिलीवरी पार्टनर्स के तेज़ गाड़ी चलाने पर नहीं, बल्कि डार्क स्टोर की लोकेशन पर निर्भर है। गोयल ने X पर स्पष्ट किया कि उनके स्टोर घरों के करीब हैं, इसलिए डिलीवरी तेज़ होती है। डार्क स्टोर हाइपरलोकल वेयरहाउस होते हैं जो रिहायशी इलाकों में होते हैं। जब आप ऑर्डर देते हैं, तो 2.5 मिनट में पैकिंग होती है और राइडर औसतन 15 किमी/घंटा की रफ्तार से 2 किमी की दूरी 8 मिनट में तय करता है। सच यह है कि ब्लिंकिट 10-मिनट डिलीवरी सिर्फ उन्हीं के लिए काम करती है जो स्टोर के 600-700 मीटर के दायरे में हैं। दूर रहने वालों के लिए समय हमेशा 15 से 19 मिनट ही रहता है।

गिग वर्कर्स की हड़ताल और न्यूनतम मजदूरी की मांग

इस बदलाव के पीछे 31 दिसंबर, 2025 को गिग वर्कर्स द्वारा की गई देशव्यापी हड़ताल का बड़ा हाथ है। 22 शहरों के एक लाख से ज्यादा वर्कर्स ने इस विरोध में हिस्सा लिया। गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) ने कहा कि 10 मिनट की डिलीवरी के नाम पर गुलामों जैसा बर्ताव बंद होना चाहिए। वर्कर्स दिन में 12-14 घंटे काम करके लगभग 25,000 रुपये कमाते हैं, जबकि केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार स्किल्ड वर्कर्स के लिए यह सम्मानजनक वेतन नहीं है। यूनियनें अब 20 रुपये प्रति किलोमीटर किराया, आठ घंटे का कार्यदिवस, ओवरटाइम वेतन और मनमाने आईडी ब्लॉकिंग से सुरक्षा की मांग कर रही हैं।

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रीब्रांडिंग के पीछे की रणनीतिक मजबूरी और सुरक्षा चिंताएं

ब्लिंकिट की इस रीब्रांडिंग पर निवेशक और प्रतिस्पर्धी बारीकी से नज़र रख रहे हैं। गति पर जोर अक्सर लाभप्रदता और कल्याण की कीमत पर रहा है। दीपेंद्र गोयल का कहना है कि डिलीवरी ऐप में कोई ‘टाइमर’ नहीं होता, लेकिन हकीकत में गिग वर्कर्स ज्यादा ऑर्डर पूरे करने के चक्कर में जोखिम उठाते हैं। ब्लिंकिट 10-मिनट डिलीवरी का टैग हटाना एक मार्केटिंग एक्सरसाइज से पीछे हटने जैसा है। स्विगी इंस्टामार्ट, ज़ेप्टो और बिगबास्केट जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी अब सरकारी दबाव के बाद अपनी ब्रांडिंग बदलने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, ग्राहकों की ‘इंस्टेंट’ आदतों को बदलने में अभी कुछ साल और लगेंगे।

संसद में गूंजा मुद्दा: राघव चड्ढा ने उठाई आवाज

संसद के शीतकालीन सत्र में भी गिग वर्कर्स की सुरक्षा का मुद्दा उठा। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने गिग वर्कर्स के “दर्द और दुख” को उजागर किया। उन्होंने तर्क दिया कि 10-मिनट की अवास्तविक समय सीमा वर्कर्स को सड़क पर जोखिम उठाने पर मजबूर करती है। चड्ढा ने खुद एक डिलीवरी एजेंट के कपड़े पहनकर ऑर्डर डिलीवर किया और उसका वीडियो शेयर करते हुए मानवीय कीमत पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने इस मामले में दखल देने के लिए सरकार को धन्यवाद दिया और बेहतर काम करने की स्थितियों के लिए अपनी मांग दोहराई।

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सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और नया कानूनी ढांचा

भारत में पहली बार ‘गिग वर्कर्स’ और ‘प्लेटफॉर्म वर्कर्स’ को औपचारिक रूप से सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत परिभाषित किया गया है, जो 21 नवंबर, 2025 को लागू हुई। यह कानून जीवन और विकलांगता कवर, दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य लाभ का प्रावधान करता है। इसके अलावा, श्रम मंत्रालय ने चार लेबर कोड के ड्राफ्ट नियम प्रकाशित किए हैं, जिसमें गिग वर्कर्स को न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा देने का लक्ष्य है। ई-श्रम पोर्टल के जरिए भी असंगठित श्रमिकों का डेटाबेस बनाया जा रहा है ताकि उन्हें लक्षित कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।

क्या वास्तव में बदलेगी गिग वर्कर की जिंदगी?

निष्कर्ष के तौर पर, ब्लिंकिट का ब्रांडिंग छोड़ना ग्राहकों की उम्मीदों को कम कर सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत बदलने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। गिग इकोनॉमी ने वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई है और कई राज्यों जैसे राजस्थान, कर्नाटक और झारखंड ने इनके कल्याण के लिए कानून भी पास किए हैं। ब्रांडिंग हटने से समय का दबाव कम हो सकता है, लेकिन जब तक उचित वेतन, स्वास्थ्य बीमा और आईडी ब्लॉकिंग जैसे मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक गिग वर्कर्स के लिए यह बदलाव सिर्फ कागजी टैग बदलने जैसा ही रहेगा। 10-मिनट की डिलीवरी एक मिथक थी, और इसका अंत शायद एक सुरक्षित कार्य संस्कृति की शुरुआत हो।

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