सत्ता बनाम संविधान: क्या 2026 के गणतंत्र पर भारी है तानाशाही?
26 जनवरी 2026 को जब भारत अपने संविधान की 77वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो यह सवाल हर जागरूक नागरिक के जेहन में है कि क्या आज की स्थिति सत्ता बनाम संविधान के संघर्ष में तब्दील हो चुकी है? हमें यह गहराई से समझना होगा कि यह ऐतिहासिक दिवस सिर्फ राजपथ पर होने वाली भव्य परेड और झंडारोहण का उत्सव मात्र नहीं है।
यह उस महान स्वतंत्रता संग्राम की विरासत है, जिसकी मशाल 1857 की क्रांति से जली थी और 1947 की आजादी तक अनवरत चलती रही।
महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज का पराक्रम और शहीद भगत सिंह की सर्वोच्च शहादत ने ही ब्रिटिश साम्राज्य को घुटने टेकने पर मजबूर किया था। इसी संघर्ष की कोख से निकले डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे दूरदर्शी नेताओं ने एक ऐसा संविधान गढ़ा, जो भारत की विशाल विविधता में एकता की गारंटी देता है।
संवैधानिक ढांचे पर प्रहार और खोखला होता उत्सव
आज जब हम गणतंत्र का जश्न मना रहे हैं, तब यह कड़वी सच्चाई भी सामने है कि मोदी सरकार की नीतियां इस मजबूत संवैधानिक ढांचे को लगातार कमजोर कर रही हैं। वर्तमान परिदृश्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग, विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास और अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले एक सामान्य बात बन गए हैं।
यह प्रवृत्तियां न सिर्फ गणतंत्र की मूल आत्मा को गहरी चोट पहुंचा रही हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत की लोकतांत्रिक छवि को धूमिल कर रही हैं। विभिन्न वैश्विक रिपोर्ट्स में भारत के गिरते लोकतांत्रिक स्तर को उजागर किया गया है। ऐसे में गणतंत्र दिवस का यह उत्सव तब खोखला लगने लगता है, जब सरकार खुद उन संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रख देती है, जिनकी शपथ लेकर वह सत्ता में आई है।
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संघीय ढांचे का क्षरण और राज्यों की संप्रभुता पर संकट
मोदी सरकार के शासनकाल में भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ ‘संघीय ढांचे’ का क्षरण सबसे चिंताजनक विषय बनकर उभरा है। केंद्र की शक्ति को असीमित रूप से बढ़ाने की होड़ में राज्यों की स्वायत्तता पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं इसी कड़ी का हिस्सा हैं, जो संघीय सिद्धांतों की नींव को कमजोर करती हैं।
सबसे दुखद पहलू यह है कि गवर्नर्स (राज्यपालों) को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर विपक्षी दलों की सरकारों को अस्थिर किया जा रहा है।
साल 2023 से 2026 के बीच, हमने देखा कि कैसे कई राज्यों में राज्यपालों ने न केवल विधानसभाओं द्वारा पारित बिलों को लंबे समय तक रोके रखा, बल्कि केंद्र के इशारे पर चुनी हुई सरकारें गिराने की भी कोशिश की। यह सीधे तौर पर संवैधानिक संघवाद को चुनौती है।
संस्थाओं का राजनीतिकरण और विपक्षी दलों के गंभीर आरोप
कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने पिछले 11 वर्षों के आंकड़ों के साथ आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को पूरी तरह खत्म कर दिया है। मंत्रालयों का दुरुपयोग और विपक्षी सरकारों के खिलाफ रची जा रही साजिशें अब छिपी नहीं हैं।
यह स्थिति न केवल राज्यों की संप्रभुता के लिए घातक है, बल्कि लोकतंत्र की उन जड़ों को भी खोखला कर रही है जिनसे विविधतापूर्ण भारत को पोषण मिलता है।
केंद्र की यह मनमानी भारत की अखंडता के लिए खतरा पैदा कर रही है। आज सत्ता बनाम संविधान के इस संघर्ष में विडंबना देखिए कि जिस संविधान को संघीयता की रक्षा के लिए बनाया गया था, उसी को सत्ता के संकीर्ण हितों के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है।
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केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग और चुनावी निष्पक्षता पर सवाल
लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्थाओं का राजनीतिकरण इस दौर की सबसे काली सच्चाई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED), CBI और आयकर विभाग जैसी स्वतंत्र एजेंसियां आज विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने का प्रमुख हथियार बन चुकी हैं। 2023 से 2026 के कालखंड में अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन जैसे कद्दावर विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां इसका प्रमाण हैं।
वहीं दूसरी ओर, विपक्षी आरोप लगाते हैं कि जो नेता बीजेपी में शामिल हो जाते हैं, उनके केस अचानक रफा-दफा कर दिए जाते हैं।
चुनावी शुचिता की बात करें तो इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम, जिसे 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था, उसने सत्ताधारी दल को अरबों रुपये की फंडिंग मुहैया कराई, जिसने चुनावी मैदान की निष्पक्षता को ही समाप्त कर दिया। चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव कर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सुझावों को दरकिनार किया, जिससे लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।
अल्पसंख्यक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन
मोदी सरकार की नीतियों का सबसे तीखा और विवादास्पद पहलू अल्पसंख्यकों और नागरिक अधिकारों पर होता हमला है। सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) जैसे कानूनों ने मुस्लिम समुदाय के भीतर हाशिए पर जाने का डर पैदा किया है। 2023 से अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में हेट स्पीच, मॉब लिंचिंग और ‘बुलडोजर एक्शन’ ने एक खास वर्ग को भय के साये में जीने को मजबूर किया है।
मणिपुर हिंसा जैसी त्रासदियों पर सरकार की लंबी चुप्पी और पेगासस स्पाइवेयर स्कैंडल के जरिए पत्रकारों व एक्टिविस्ट्स की जासूसी ने अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का काम किया है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, जैसे ‘जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी’ ने भारत को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ (चुनावी तानाशाही) तक कह डाला है। सत्ता बनाम संविधान की इस लड़ाई में हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर असहमति की हर आवाज को दबाया जा रहा है, जो विविधता में एकता के नारे को चिढ़ाता है।
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मीडिया पर नियंत्रण और डिजिटल इंडिया का दूसरा चेहरा
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया आज अभूतपूर्व दबाव में है। बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों पर छापे और भारतीय पत्रकारों पर यूएपीए (UAPA) जैसे कठोर कानूनों के तहत कार्रवाई ने दुनिया भर का ध्यान खींचा है। 2023 से 2026 के दौरान भारत इंटरनेट शटडाउन के मामले में विश्व में शीर्ष पर रहा, जो सीधे तौर पर जनता के सूचना के अधिकार का हनन है।
‘आर्टिकल 19’ जैसी संस्थाओं ने नागरिक स्वतंत्रताओं के दुरुपयोग की कड़ी आलोचना की है। राहुल गांधी जैसे नेताओं का यह आरोप कि मोदी सरकार आरएसएस के साथ मिलकर संविधान को ही खत्म करना चाहती है, अब सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि यह खुली बहस और असहमति की जगह देने का नाम है, जो वर्तमान में लगातार सिकुड़ती जा रही है।
आर्थिक असमानता और सामाजिक न्याय की बलि
आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार की नीतियां संवैधानिक मूल्यों के विपरीत दिखाई देती हैं। मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं के स्वरूप को बदलकर उन्हें कमजोर किया गया और नए लेबर कोड्स के जरिए श्रमिकों के अधिकारों को सीमित कर दिया गया।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया है कि सरकार सामाजिक न्याय की अवधारणा को उलट रही है, जिससे दलितों की शिक्षा और नौकरियों के अवसर प्रभावित हो रहे हैं। धार्मिक राष्ट्रवाद के शोर में आर्थिक असमानता और बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दे दबा दिए गए हैं।
सोशल मीडिया (X) पर भी यह विमर्श तेज है कि भूमि अधिग्रहण और जीएसटी जैसी नीतियों ने किसानों और श्रमिकों को नुकसान पहुंचाया है, जबकि सरकार ‘मनुस्मृति’ की भावना को लागू करने का प्रयास कर रही है। आज सत्ता बनाम संविधान के बीच संप्रभुता का अर्थ केवल अमीरों की सुरक्षा तक सीमित रह गया है।
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