“सरकार बनाम नागरिक अधिकार” डिजिटल सेंसरशिप और फ्री स्पीच की जंग
सरकार बनाम नागरिक अधिकार भारत के सरकार गृह मंत्रालय (MHA) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) के बीच टकराव अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2024 से नवंबर 2025 के बीच मंत्रालय ने X को कुल 91 टेकडाउन नोटिस भेजे हैं, जिनमें 1,100 से अधिक URLs को हटाने की सख्त मांग की गई है।
ये नोटिस आईटी एक्ट की धारा 79(3)(b) के तहत जारी किए गए हैं, जो इंटरमीडियरी को “अनलॉफुल कंटेंट” हटाने का आदेश देती है। हालांकि, X बनाम भारत सरकार की इस जंग में कंपनी ने इन आदेशों की वैधता पर सवाल उठाते हुए सहयोग करने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे यह मामला अब केवल तकनीकी नहीं बल्कि संवैधानिक बन गया है।
पब्लिक ऑर्डर की आड़ में राजनीतिक घेराबंदी का आरोप
इन नोटिसों का विश्लेषण करने पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सरकार द्वारा भेजे गए नोटिसों में सबसे ज्यादा 566 URLs को “सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने” (disturbing public order) की श्रेणी में रखा गया था। वहीं, 124 URLs ऐसे थे जो सीधे तौर पर राजनीतिक और सार्वजनिक हस्तियों को टारगेट कर रहे थे।
‘The Indian Express’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, X बनाम भारत सरकार के बीच यह तनाव चुनावी समय में सबसे ज्यादा देखा गया। अप्रैल-मई 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान अकेले 761 URLs को फ्लैग किया गया, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि “पब्लिक ऑर्डर” का हवाला देकर विपक्षी और आलोचनात्मक आवाज को दबाने की कोशिश की गई है।
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चुनावी प्रक्रिया और असहमति को ‘अव्यवस्था’ करार देने की कवायद
यह केवल संख्याओं का खेल नहीं है, बल्कि इसे सिस्टेमेटिक सेंसरशिप के एक बड़े प्रमाण के रूप में देखा जा रहा है। “पब्लिक ऑर्डर” के नाम पर हटाए गए आधे से ज्यादा URLs यह दर्शाते हैं कि सरकार ने “सार्वजनिक व्यवस्था” की परिभाषा को इतना लचीला बना दिया है कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और जय शाह जैसे रसूखदार नेताओं की आलोचना भी शामिल हो गई है।
हैरानी की बात यह है कि 13 मई, 2024 को जारी एक ही नोटिस में 115 URLs को “चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली मिसइंफॉर्मेशन” बताकर हटाने को कहा गया। लोकतंत्र के महापर्व के दौरान असहमति को “अव्यवस्था” मान लेना सत्ता की छवि बचाने का एक हथियार प्रतीत होता है।
‘सहयोग’ पोर्टल: बिना जवाबदेही वाली नई सेंसरशिप मशीन
सरकार ने मार्च 2024 में ‘सहयोग’ पोर्टल लॉन्च किया, जिसने इस विवाद को और हवा दी। इस पोर्टल के जरिए हजारों सरकारी अधिकारी सीधे टेकडाउन ऑर्डर जारी कर सकते हैं। इसमें आईटी एक्ट की धारा 69A की तरह न तो किसी कोर्ट रिव्यू की व्यवस्था है, न प्री-डिसीजनल हियरिंग की और न ही कोई तर्कसंगत आदेश (Reasoned Order) दिया जाता है।
एलन मस्क की टीम ने इसे “सेंसरशिप पोर्टल” करार देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि सितंबर 2025 में वहां से याचिका खारिज हो गई, लेकिन X बनाम भारत सरकार के इस मामले में कंपनी अब ऊपरी अदालत में अपील की तैयारी कर रही है। मस्क की टीम का तर्क है कि यह प्रक्रिया 2015 के ‘श्रेया सिंघल जजमेंट’ की मूल भावना को कुचलती है।
सुरक्षा का ढोंग या नैरेटिव कंट्रोल की सोची-समझी रणनीति
आंकड़ों की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि इन नोटिसों का मुख्य उद्देश्य साइबर अपराध रोकना नहीं, बल्कि राजनीतिक नियंत्रण हासिल करना था। नोटिसों में प्रधानमंत्री मोदी से जुड़े 21 और अमित शाह से जुड़े 91 URLs शामिल थे, जहां ‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट’ का हवाला देकर चुनावी आलोचना को “अनुचित प्रभाव” मान लिया गया।
केवल 14 नोटिस (करीब 15%) ही ऐसे थे जो वास्तव में आपराधिक गतिविधियों जैसे बेटिंग ऐप्स, चाइल्ड एब्यूज मटेरियल या इम्पर्सोनेशन से जुड़े थे। बाकी का बड़ा हिस्सा राजनीतिक कंटेंट को चुप कराने के लिए इस्तेमाल हुआ, जो यह साबित करता है कि सरकार का असली फोकस अपराध नहीं बल्कि आलोचना को दंडनीय बनाना है।
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एलन मस्क का स्टैंड और आर्टिकल 19(1)(a) का उल्लंघन
X का इन आदेशों को मानने से इनकार करना फ्री स्पीच की वैश्विक लड़ाई का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि सरकार का दबाव निरंतर बढ़ रहा है। जनवरी से जून 2025 के बीच ही रिकॉर्ड 29,118 टेकडाउन रिक्वेस्ट्स भेजी गईं, जिनमें से 91% का अनुपालन करना पड़ा। X ने इसे “अनार्बिट्रेरी सेंसरशिप” (मनमानी सेंसरशिप) कहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि X बनाम भारत सरकार का यह टकराव भारतीय संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) यानी ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ पर सीधा हमला है। सुरक्षा और साइबरक्राइम के नाम पर सरकार एक ऐसा ‘नैरेटिव कंट्रोल’ चाहती है जहां कोई भी असहमति व्यवस्था के लिए खतरा मान ली जाए।
डिजिटल इमरजेंसी की आहट और लोकतंत्र का भविष्य
यह पूरी प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। जब सरकार खुद यह तय करने लगे कि “पब्लिक ऑर्डर” के लिए क्या खतरा है, तो प्रेस, विपक्ष और आम नागरिक की आवाज का दबना तय है।
‘सहयोग’ पोर्टल के माध्यम से बिना किसी जवाबदेही के हजारों पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को सेंसर करने की शक्ति देना एक ‘डिजिटल इमरजेंसी’ जैसा माहौल पैदा कर रहा है। X की यह कानूनी लड़ाई केवल एक व्यावसायिक मंच की नहीं, बल्कि भारतीय नागरिकों के उन मौलिक अधिकारों की है जो उन्हें संविधान द्वारा दिए गए हैं।
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही
अंत में, ये 91 नोटिस और 1,100 से अधिक URLs का डेटा यह चीख-चीखकर कह रहा है कि सत्ता “सुरक्षा” के नाम पर ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ का गला घोंट रही है। हालांकि X का रुख साहसिक है, लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि सेंसरशिप कभी भी स्थायी समाधान नहीं होती।
इतिहास गवाह है कि जो आवाज जितनी दबाई जाती है, वह उतनी ही तेजी से गूंजती है। यह समय पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का है, वरना “पब्लिक ऑर्डर” की यह लचीली परिभाषा भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से हटाकर दुनिया की सबसे बड़ी सेंसरशिप मशीन में तब्दील कर देगी।
सरकार की नीतियों और फैसलों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई मामलों में सरकार बनाम नागरिक अधिकार की बहस तेज़ हुई है।
नागरिक संगठनों का कहना है कि अभिव्यक्ति और निजता पर असर पड़ा है। ऐसे हालात में सरकार बनाम नागरिक अधिकार का मुद्दा लोकतंत्र की कसौटी बन गया है।
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