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जया बच्चन का पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड और राजीव शुक्ला का खुलासा

पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड

पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने हाल ही में भारतीय राजनीति और बॉलीवुड के अंतर्संबंधों पर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने विशेष रूप से अमिताभ बच्चन के राजनीतिक करियर और जया बच्चन के संसदीय व्यवहार पर चर्चा की।

शुक्ला ने बताया कि जया बच्चन का पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड जितना शानदार है, उतना ही कड़क उनका अनुशासन भी है। वह उन चुनिंदा फिल्मी सितारों में से एक हैं जिन्हें संसद की कार्यवाही में निरंतर उपस्थिति के लिए जाना जाता है।

राजीव शुक्ला के अनुसार, जया बच्चन केवल उपस्थित ही नहीं रहतीं, बल्कि सदन की गरिमा और अनुशासन को लेकर इतनी सख्त हैं कि वह मंत्रियों को उनके मुंह पर डांटने से भी नहीं हिचकिचातीं।

अमिताभ बच्चन: ‘शहंशाह’ का राजनीति में वो एक गलत कदम

अमिताभ बच्चन पिछले पांच दशकों से बॉलीवुड पर निर्विवाद रूप से राज कर रहे हैं, लेकिन उनकी जीवन यात्रा यह भी सिखाती है कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, बच्चन अपने करीबी दोस्त राजीव गांधी के समर्थन में कांग्रेस में शामिल हुए थे।

उन्होंने इलाहाबाद सीट से भारी बहुमत से जीत हासिल की, लेकिन राजनीति में उनका अनुभव सुखद नहीं रहा। बोफोर्स घोटाले में नाम आने के कारण उन्हें 1987 में इस्तीफा देना पड़ा।

राजीव शुक्ला ने इसे उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती करार दिया। राजनीति के अलावा 90 के दशक में ABCL कंपनी का फ्लॉप होना और एक्टिंग करियर में आए उतार-चढ़ाव ने भी उन्हें मुश्किल में डाला, हालांकि उन्होंने बाद में जबरदस्त वापसी की।

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जया बच्चन: मंत्रियों को सरेआम डांटने वाली निडर सांसद

राजीव शुक्ला ने ANI पॉडकास्ट पर बताया कि जया बच्चन मंत्रियों को उनके मुंह पर डांटती थीं, जो उनके निडर व्यक्तित्व का प्रमाण है। जया बच्चन पहली बार 2004 में समाजवादी पार्टी से राज्यसभा पहुंचीं। शुक्ला के अनुसार, वह अनुशासनहीनता को रत्ती भर भी बर्दाश्त नहीं करतीं।

यदि उन्हें लगता है कि सदन में कोई अनडिसिप्लिन्ड हो रहा है, तो वह खुलकर बोलती हैं। पार्लियामेंट में वह अपनी सीट से उठकर मंत्रियों और यहां तक कि चेयरमैन तक को टोक देती थीं। उनका पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड उनकी गंभीरता को दर्शाता है, क्योंकि वह केवल एक सेलिब्रिटी के तौर पर नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि के रूप में काम करती हैं।

रेखा की भूमिका: राजनीति में सक्रियता या महज औपचारिकता?

जया बच्चन के विपरीत, राजीव शुक्ला ने रेखा के राजनीतिक करियर को लेकर काफी अलग राय साझा की। रेखा ने 2012 में राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली थी, लेकिन शुक्ला उन्हें ‘राजनेता’ मानने से इनकार करते हैं। उन्होंने बताया कि रेखा हर सेशन में केवल एक बार आती थीं।

रेखा की राज्यसभा से गैर-मौजूदगी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि कार्यकाल खत्म होने तक उनकी भूमिका महज औपचारिक रही। जहां जया बच्चन डिबेट्स में सक्रिय रूप से हिस्सा लेती हैं, वहीं रेखा को कभी भी सदन की बहसों में हिस्सा लेते नहीं देखा गया। शुक्ला ने साफ कहा कि रेखा को पॉलिटिशियन कहना सही नहीं होगा।

जया प्रदा की मेहनत और फिल्मी सितारों का राजनीतिक रवैया

पॉडकास्ट के दौरान शुक्ला ने अन्य फिल्मी सितारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जया प्रदा पूरी तरह से एक पॉलिटिशियन बन चुकी हैं और लगातार कड़ी मेहनत कर रही हैं, हालांकि उन्हें अभी और बड़े मौकों का इंतजार है।

शुक्ला का मानना है कि राजनीति में आने वाले ज्यादातर सेलिब्रिटी सांसदों में कानूनी और संसदीय कार्यों को पूरा करने का वो पक्का इरादा नहीं होता जो एक राजनेता के लिए जरूरी है। जया बच्चन का बेहतरीन पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड इस मामले में एक मिसाल है क्योंकि वह 2004, 2006 और 2012 के अपने सभी टर्म में बेहद सक्रिय और समर्पित रहीं।

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निडर जवाबदेही: जया बच्चन का संसदीय कार्य करने का ढंग

जया बच्चन ने राज्यसभा में खुद को एक ऐसी सांसद के रूप में स्थापित किया है जो सामाजिक अच्छाइयों से ज्यादा निडर जवाबदेही को प्राथमिकता देती हैं। राजीव शुक्ला ने बताया कि उनकी सख्ती, जिसे अक्सर लोग उनकी पब्लिक इमेज मान लेते हैं, दरअसल उनका असली रूप है।

वह सीधे चेयर को संबोधित करते हुए मंत्रियों को सार्वजनिक रूप से टोकती हैं। 2004 से आज तक का उनका सफर उनके समर्पण को दिखाता है। वह न केवल सदन में मौजूद रहती हैं, बल्कि उन सभी डिबेट्स को लीड भी करती हैं जिनमें वह शामिल होती हैं। वह अपने पद का उपयोग एग्जीक्यूटिव ब्रांच को चुनौती देने के लिए करती हैं।

रेखा, सचिन और लता मंगेशकर: सुविधाओं का त्याग

राजीव शुक्ला ने एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी दी कि रेखा ने भले ही सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन उन्होंने सांसद के तौर पर मिलने वाली सुविधाओं का लाभ नहीं उठाया। रेखा और सचिन तेंदुलकर ने सांसद बनने के बाद सरकारी घर नहीं लिया।

इसी तरह स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने भी सांसद रहते हुए न तो MPLADS फंड का इस्तेमाल किया और न ही कोई सरकारी घर या टिकट जैसी फैसिलिटी ली। रेखा ने सरकारी सिस्टम का हिस्सा बनने के बावजूद अपनी नियुक्ति का सम्मान करते हुए खुद को सरकारी फायदों से दूर रखा, हालांकि उनका पार्लियामेंट अटेंडेंस रिकॉर्ड जया बच्चन की तुलना में काफी कमजोर रहा।

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सेलिब्रिटी सांसदों के दो अलग पहलू

राजीव शुक्ला के इन खुलासों से यह स्पष्ट होता है कि ग्लैमर की दुनिया से राजनीति में आने वाले लोगों के दो अलग-अलग दृष्टिकोण होते हैं। एक तरफ जया बच्चन जैसी सांसद हैं जिन्होंने 2004 से अब तक संसदीय मर्यादा और उपस्थिति के नए मानक स्थापित किए, जो हर मीटिंग में शामिल होकर निडर होकर अपनी बात रखती हैं।

दूसरी तरफ रेखा जैसे व्यक्तित्व हैं, जिनकी उपस्थिति केवल औपचारिक रही। शुक्ला ने अंत में यही संदेश दिया कि जया बच्चन का निडर व्यवहार और अनुशासन उन्हें एक असली राजनेता बनाता है, जबकि रेखा की भूमिका संसद में बहुत सीमित रही।

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