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एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड: सरेआम दरिंदगी, क्या अब एम्स भी सुरक्षित नहीं?

एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड

एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और सुरक्षित कार्यस्थल के दावों की पोल खोल दी है। मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को सामने आई इस भयावह घटना में एम्स गोरखपुर में कार्यरत नागालैंड की एक महिला डॉक्टर को न केवल शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, बल्कि उन्हें गंभीर नस्ली गालियों का भी सामना करना पड़ा।

रिपोर्टों के अनुसार, जब वह डॉक्टर अपनी ड्यूटी खत्म कर घर लौट रही थीं, तब कुछ मनचलों ने उनका पीछा करना शुरू किया। यह पीछा केवल कुछ मीटर का नहीं था, बल्कि आरोपियों ने लगभग 1.5 किलोमीटर तक उनका पीछा किया, जो उनके भीतर बैठे खौफ और अपराधी मानसिकता को दर्शाता है। यह घटना दर्शाती है कि समाज में महिलाओं के लिए रात तो क्या, दिन का उजाला भी सुरक्षित नहीं रह गया है, खासकर तब जब वे अपनी जड़ों से दूर देश की सेवा कर रही हों।

डेढ़ किलोमीटर तक पीछा और नस्ली गालियां: एक बहादुर डॉक्टर का मानसिक टॉर्चर

इस एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड की सबसे विचलित करने वाली बात वह नस्लवाद (Racism) है जिसे उस डॉक्टर ने झेला। वाराणसी और लखनऊ के स्थानीय मीडिया के अनुसार, हमलावरों ने डॉक्टर के रंग और उनके पूर्वोत्तर मूल को लेकर बेहद आपत्तिजनक और भद्दी टिप्पणियां कीं।

हमलावरों का साहस इतना बढ़ गया था कि उन्होंने डॉक्टर का रास्ता रोका और उनके साथ हाथापाई की। 1.5 किलोमीटर तक का वो पीछा किसी भी इंसान की रूह को कंपा देने के लिए काफी है।

यह केवल एक महिला के साथ छेड़खानी नहीं थी, बल्कि यह भारत के उस लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रहार था जो हर नागरिक को सम्मान के साथ कहीं भी रहने और काम करने का अधिकार देता है। डॉक्टर की बहादुरी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इस मानसिक टॉर्चर के बावजूद आरोपियों का सामना किया और मामले की रिपोर्ट दर्ज कराई।

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मेघालय के मुख्यमंत्री का गुस्सा: ‘बेहद शर्मनाक’ और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग

जैसे ही इस एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड की खबर पूर्वोत्तर भारत में पहुँची, वहां के राजनीतिक नेतृत्व में भारी आक्रोश देखा गया। मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने सोशल मीडिया पर इस घटना को ‘बेहद शर्मनाक’ करार देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

संगमा ने जोर देकर कहा कि पूर्वोत्तर के लोग देश के किसी भी हिस्से में असुरक्षित महसूस नहीं करने चाहिए और नस्ली नफरत फैलाने वालों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो एक नजीर बन सके।

मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी के बाद यह मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है, जिससे स्थानीय प्रशासन पर आरोपियों को जल्द से जल्द पकड़ने का दबाव बढ़ गया है। यह केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत की एकता और अखंडता से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है।

नस्लवाद की गहरी जड़ें: क्या पूर्वोत्तर के लोग अपने ही देश में अजनबी हैं?

एक संपादकीय विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि आखिर क्यों 21वीं सदी में भी हम अपनी नस्ली पहचान से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड ने उस कड़वे सच को उजागर किया है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है। पूर्वोत्तर के डॉक्टर, छात्र और कामकाजी लोग अक्सर दिल्ली, यूपी और कर्नाटक जैसे राज्यों में ‘बाहरी’ होने का अहसास कराए जाते हैं।

उन्हें ‘मोमो’ या ‘चाऊमीन’ जैसे अपमानजनक शब्दों से पुकारा जाता है, जो उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है। गोरखपुर जैसी जगह में, जहाँ एम्स जैसा प्रतिष्ठित संस्थान है, वहां के स्थानीय लोगों की यह मानसिकता दिखाती है कि शिक्षा और विकास के बावजूद हमारा सामाजिक नजरिया कितना संकुचित है। हमें अपनी लड़ाई केवल अपराधियों के खिलाफ नहीं, बल्कि इस नस्ली सोच के खिलाफ भी लड़नी होगी।

महिला सुरक्षा पर उठे सवाल: क्या एम्स गोरखपुर का कैंपस और सड़के सुरक्षित हैं?

इस एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड ने मेडिकल कम्युनिटी के भीतर भी डर का माहौल पैदा कर दिया है। डॉक्टरों का तर्क है कि अगर एम्स जैसे संस्थान के पास ही एक महिला डॉक्टर सुरक्षित नहीं है, तो आम महिलाओं का क्या हाल होगा? रेजिडेंट डॉक्टरों ने मांग की है कि कार्यस्थल के आसपास सुरक्षा और गश्त बढ़ाई जानी चाहिए।

रात की पाली में काम करने वाली महिला डॉक्टरों के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए। पुलिस की ढिलाई पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि कैसे भीड़भाड़ वाले इलाके में कोई 1.5 किलोमीटर तक किसी महिला का पीछा कर सकता है और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगती? यह विफलता दर्शाती है कि एंटी-रोमियो स्क्वाड जैसे अभियानों को कागजों से निकलकर सड़कों पर प्रभावी होने की सख्त जरूरत है।

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सोशल मीडिया आउटरेज: #JusticeForNagalandDoctor और युवाओं की एकजुटता

आज की जेन-जी और मिलेनियल्स पीढ़ी ने इस एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया है। इंस्टाग्राम और ट्विटर पर हजारों की संख्या में लोग पीड़ित डॉक्टर के समर्थन में खड़े हो गए हैं। हैशटैग #JusticeForNagalandDoctor और #StopRacism तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं।

युवाओं का कहना है कि वे ऐसे किसी भी समाज का हिस्सा नहीं बनना चाहते जहाँ किसी की नस्ल या मूल स्थान के आधार पर उसका अपमान किया जाए।

डिजिटल युग में यह आक्रोश केवल एक शहर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर देश की छवि को प्रभावित करता है। युवाओं की यह एकजुटता एक सकारात्मक संकेत है कि आने वाली पीढ़ी नस्लवाद और लैंगिक हिंसा के खिलाफ शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति रखती है।

कानूनी प्रक्रिया और एफआईआर: क्या दोषियों को मिलेगी उनके किए की सजा?

गोरखपुर पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कुछ संदिग्धों की पहचान करने का दावा किया है। हालांकि, पीड़ित डॉक्टर और उनके परिवार का कहना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी हो रही है। इस तरह के मामलों में अक्सर ‘इम्प्युनिटी’ (सजा का डर न होना) अपराधियों के हौसले बढ़ाती है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में न केवल छेड़खानी (354 IPC) बल्कि नस्ली टिप्पणी से जुड़ी धाराओं को भी शामिल किया जाना चाहिए ताकि मामले की गंभीरता बनी रहे। उत्तर प्रदेश सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह मामला केवल कागजों तक सीमित न रहे और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए, ताकि अन्य किसी को भी ऐसी हिमाकत करने की हिम्मत न हो।

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एक समावेशी और सुरक्षित भारत की ओर कड़े कदम की जरूरत

अंततः, एम्स डॉक्टर छेड़छाड़ कांड हमारे लिए एक आईना है जो हमारी कमियों को दिखाता है। यह हमें याद दिलाता है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है, बल्कि समाज की मानसिकता में बदलाव लाना अधिक महत्वपूर्ण है। पूर्वोत्तर के लोग हमारे अपने हैं और उनकी सुरक्षा तथा सम्मान की जिम्मेदारी पूरे देश की है।

एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में मेरा मानना है कि जब तक हम ‘नस्लवाद’ और ‘पितृसत्ता’ के गठजोड़ को नहीं तोड़ेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक मूल्यों में संवेदनशीलता लानी होगी ताकि कोई भी डॉक्टर, चाहे वह कहीं की भी हो, बिना किसी डर के अपनी सेवा दे सके। यह लड़ाई न्याय की है, सम्मान की है और एक बेहतर भारत के भविष्य की है।

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