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लुटियंस दिल्ली जिमखाना विवाद जिमखाना क्लब को खाली करने का नोटिस

लुटियंस दिल्ली जिमखाना विवाद

लुटियंस दिल्ली जिमखाना विवाद देश की सत्ता के सबसे शक्तिशाली गलियारे ‘लुटियंस दिल्ली’ से इस समय की सबसे बड़ी प्रशासनिक खबर सामने आ रही है। केंद्र सरकार के आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने एक अभूतपूर्व और कड़ा रुख अपनाते हुए देश के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ को आगामी 5 जून 2026 तक पूरा परिसर खाली करने का अंतिम नोटिस जारी कर दिया है।

प्रधानमंत्री आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) के ठीक बगल में, 2, सफदरजंग रोड पर स्थित इस विशाल 27.3 एकड़ के परिसर की लीज को माननीय राष्ट्रपति के आदेश पर तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है।

सरकार ने इस ऐतिहासिक भूमि के अधिग्रहण के पीछे “राष्ट्रीय रक्षा बुनियादी ढांचे (Defence Infrastructure) को मजबूत और सुरक्षित करने” की रणनीतिक अनिवार्यता का हवाला दिया है। इस फैसले के बाद क्लब प्रबंधन ने तत्काल बैठक बुलाकर मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा है, वहीं देश के नीति-नियंताओं, पूर्व नौकरशाहों, इतिहासकारों और राजनेताओं के बीच एक नया वैचारिक युद्ध छिड़ गया है।

विरासत बनाम विशेषाधिकार: प्रभु चावला और केसी सिंह में तीखी बहस

इस ऐतिहासिक क्लब को खाली कराए जाने के सरकारी फैसले ने राजधानी के बौद्धिक और प्रशासनिक हलकों को दो धड़ों में बांट दिया है। वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार प्रभु चावला ने सरकार के इस कदम का खुला समर्थन करते हुए इस व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया है। चावला ने तर्क दिया कि सरकारी खजाने या रियायती सरकारी जमीनों पर चलने वाली किसी भी संस्था को अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल सिर्फ कुछ चुनिंदा रसूखदारों तक सीमित रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

उन्होंने लिखा, “दिल्ली जिमखाना और गोल्फ क्लब जैसे ठिकाने पूरे देश में बाबुओं (नौकरशाहों) द्वारा, खुद के और अपने करीबियों के सामाजिक वैभव के लिए मुफ़्त या बेहद रियायती दरों पर दी गई कीमती जमीनों पर चलाए जा रहे हैं। आम नागरिकों को इसकी सदस्यता के लिए तब तक इंतजार करना पड़ता है, जब तक उनके पोते-पोती बड़े नहीं हो जाते।” उन्होंने इसे अंग्रेजों द्वारा केवल अपनी नस्ल के सामाजिक मेलजोल के लिए बनाया गया ढांचा करार दिया।

प्रभु चावला के इन दावों पर तीखा पलटवार करते हुए पूर्व वरिष्ठ राजनयिक और कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ के.सी. सिंह ने नौकरशाही का बचाव किया। सिंह ने तर्क दिया कि लुटियंस दिल्ली में बने ऐसे क्लब सरकारी अधिकारियों और नौकरशाहों को खेलकूद की सुविधाएं और उचित कीमत पर भोजन मुहैया कराते थे, क्योंकि वे निजी क्षेत्र (Private Sector) के कॉर्पोरेट दिग्गजों की तुलना में काफी कम वेतन पर देश की सेवा करते हैं।

उन्होंने कहा, “यह इंफ्रास्ट्रक्चर अधिकारियों को उस पैसे वाले और कॉर्पोरेट वर्ग पर निर्भर होने से बचाता था, जो अपनी व्यावसायिक सहूलियतों के लिए सरकारी मेहरबानी चाहते हैं।”

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यादों का कारवां: किरण बेदी और एएस दुलत ने बताया ‘संस्थागत त्रासदी’

देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी ने इस फैसले को “दुर्भाग्यपूर्ण और बेहद दुखद” बताया है। खेल और टेनिस विरासत का हवाला देते हुए बेदी ने कहा कि यह सिर्फ 27 एकड़ की जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि एक जीवित इतिहास है।

यहां देश के कुछ बेहतरीन टेनिस मैच खेले गए हैं और कई पीढ़ियों की खेल उपलब्धियां इस परिसर से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि बदलाव जरूरी हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय विरासत और इतिहास को सोच-समझकर संरक्षित किया जाना चाहिए।

वहीं, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) के पूर्व प्रमुख और क्लब के पूर्व अध्यक्ष ए.एस. दुलत इस फैसले से बेहद भावुक नजर आए। उन्होंने कहा, “राजधानी में रहने वाले कई बुजुर्गों और पूर्व अधिकारियों के लिए यह क्लब एक घर और मंदिर जैसा है, जहां उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बिताई है।

इस जगह का कोई मुआवजा या विकल्प नहीं हो सकता। अगर आप जिमखाना क्लब को सफदरजंग रोड से हटाकर कहीं और ले जाते हैं, तो वह ‘दिल्ली जिमखाना’ नहीं रह जाएगा, उसकी रूह खत्म हो जाएगी।” जाने-माने इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने भी इसे एक महान संस्था का अंत बताते हुए दुख व्यक्त किया, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि इस क्लब को और अधिक समावेशी और आम जनता के लिए उपयोगी बनाए जाने की जरूरत थी।

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37 साल की लंबी वेटिंग लिस्ट और 20 लाख रुपये फीस का रहस्य

वर्ष 1913 में ब्रिटिश राज के दौरान ‘इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ के नाम से स्थापित इस क्लब का इतिहास बेहद दिलचस्प है। इसके पहले अध्यक्ष ‘यूनाइटेड प्रोविंसेस ऑफ आगरा एंड अवध’ के तत्कालीन गवर्नर स्पेंसर हारकोर्ट बटलर थे, जबकि इसका आलीशान डिजाइन मशहूर आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल ने तैयार किया था, जिन्होंने तीन मूर्ति भवन और सफदरजंग एयरपोर्ट जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनाई हैं।

यह क्लब देश का सबसे विशिष्ट (Exclusive) ठिकाना माना जाता है। क्लब की कुल क्षमता वैसे तो 14,000 सदस्यों की है, लेकिन वर्तमान में केवल 1,200 सक्रिय स्थायी सदस्य ही इसे संचालित करते हैं। क्लब में प्रवेश पाना इस कदर मुश्किल है कि हर साल महज 100 नए आवेदकों को ही मेंबरशिप मिल पाती है।

आज की तारीख में इसकी मेंबरशिप फीस लगभग 20 लाख रुपये है और इसके बावजूद 3,000 से अधिक वीआईपी और रसूखदार लोग इसकी वेटिंग लिस्ट में शामिल हैं, जहां सदस्यता मिलने का औसत इंतजार 35 से 37 साल का है। यह वही ऐतिहासिक परिसर है जहां 1966 में भारत-जर्मनी टेनिस मैच हुआ था और जहां अभिनेता दिलीप कुमार और सायरा बानो की शादी का गवाह भी यही लॉन बना था।

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विपक्ष का सरकार पर हमला: “तानाशाही और राजा की मर्जी”

इस मुद्दे पर राजनीतिक रोटियां सेकने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। कांग्रेस नेता उदित राज ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इसे “राजा की मर्जी” करार दिया। उन्होंने कहा, “दिल्ली जिमखाना क्लब का एक गौरवशाली इतिहास है। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं होता।

लेकिन चूंकि देश के ‘राजा’ नहीं चाहते कि उनके घर के बगल में कोई जिमखाना क्लब रहे, इसलिए इसे हटाने का फरमान जारी कर दिया गया।” आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने भी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए इसे सरकार का एक “तानाशाही और अहंकार से भरा कदम” बताया है।

संपादकीय दृष्टिकोण:

दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली करने का नोटिस केवल एक जमीन का विवाद नहीं, बल्कि लुटियंस दिल्ली के उस औपनिवेशिक (Colonial) विशेषाधिकार पर चोट है, जो आजादी के 78 साल बाद भी देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने में खुद को आम जनता से ऊपर समझता था।

सुरक्षा और डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर सरकार का यह कदम कानूनी रूप से भले ही सही हो, लेकिन लुटियंस जोन के ‘एलीट क्लब कल्चर’ के प्रति देश के आम नागरिक का जो रोष है, उसे प्रभु चावला के बयानों ने हवा दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय हेगड़े ने बिल्कुल सही कहा कि लोकप्रिय जननेताओं द्वारा विशिष्ट वर्ग (Elite Class) के गढ़ों को उखाड़ फेंकना इंसानी इतिहास जितना ही पुराना खेल है।

देखना यह होगा कि 5 जून की समयसीमा से पहले क्या देश की न्यायपालिका इस 113 साल पुरानी संस्था को कोई ‘लाइफलाइन’ देती है या फिर यह ऐतिहासिक परिसर हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा। वीआईपी क्लब की सदस्यता को लेकर फिर गरमाया लुटियंस दिल्ली जिमखाना विवाद नियमों के उल्लंघन के आरोपों पर लुटियंस दिल्ली जिमखाना विवाद में नया मोड़

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