सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला जेलों में दिव्यांगों के अधिकार सुनिश्चित हो।
जेलों में दिव्यांगों के अधिकार करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जेलों में दिव्यांग व्यक्तियों को सुलभता और आवश्यक देखभाल से वंचित करना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु के लिए विशिष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश एक ऐसे मामले में आया है जिसने देश भर की जेलों में दिव्यांगों की दुर्दशा को उजागर किया है।
मुख्य बिंदु
- सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में दिव्यांग कैदियों के लिए समान अधिकारों की कानूनी गारंटी तय की।
- न्यायालय ने राज्यों को सभी जेलों में दिव्यांग-अनुकूल ढांचे और सुविधाएं सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
- कोर्ट ने कहा, जेल भी संविधान के तहत ‘लोक सेवा स्थल’ की परिभाषा में आती है।
- दिव्यांग व्यक्तियों को समान गरिमा, स्वतंत्रता और सुविधाएं मिलना मौलिक अधिकार है: सुप्रीम कोर्ट।
- राज्य सरकारों को 6 महीने में सभी जेलों का ऑडिट कर सुधारात्मक कदम उठाने को कहा गया।
- न्यायालय ने RPWD कानून 2016 के तहत जेलों में भी समावेशिता लागू करने की आवश्यकता दोहराई।
- फैसले को मानवाधिकार विशेषज्ञों और दिव्यांग संगठनों ने न्याय की दिशा में बड़ा कदम बताया।
जेलों में बदलाव की बयार: सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जेलों में बंद दिव्यांग व्यक्तियों को सुगम्यता और आवश्यक देखभाल से वंचित करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने तमिलनाडु की जेलों में व्यापक बदलाव का निर्देश दिया है। इनमें व्हीलचेयर के अनुकूल स्थान, सुलभ शौचालय, रैंप और उनकी चिकित्सीय आवश्यकताओं के लिए समर्पित स्थान प्रदान करना शामिल है। पीठ ने छह महीने के भीतर सभी जेलों का राज्य स्तरीय सुगम्यता ऑडिट करने का आदेश भी दिया है।
- यह ऑडिट समाज कल्याण और दिव्यांगजन कल्याण विभाग के अधिकारी करेंगे।
- इसमें प्रमाणित पहुँच लेखा परीक्षक भी शामिल होंगे।
आंकड़ों की कमी और मानवीय गरिमा का उल्लंघन
अदालत ने एक गंभीर “आंकड़ों की कमी” का भी उल्लेख किया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) कैदियों की जाति, लिंग और धर्म का विस्तृत विवरण देता है। लेकिन उनकी दिव्यांगता की स्थिति को दर्ज नहीं करता है। अदालत ने कहा, “कानूनी कारावास मानवीय गरिमा के अधिकार को निलंबित नहीं करता है।” सजा केवल स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने में निहित है। यह मानवीय व्यवहार या उचित सुविधाओं से इनकार करने में नहीं।
- प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं या हिरासत नीतियों के अभाव में, कैदियों को अक्सर मदद से वंचित रहना पड़ता है।
- इससे अपमान, मानसिक कष्ट और कभी-कभी गंभीर शारीरिक नुकसान होता है।
याचिकाकर्ता की आपबीती और अदालत के निर्देश
अदालत के ये निर्देश एल मुरुगनांथम द्वारा दायर याचिका पर आए। मुरुगनांथम बेकर की मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित हैं। उन्हें 2020 में तमिलनाडु की एक जेल में 11 दिनों के लिए कैद किया गया था। वहाँ विकलांग लोगों के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। अदालत ने निर्देश दिया कि जेल महानिदेशक तीन महीने के भीतर राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी) को रिपोर्ट दें। इस रिपोर्ट में निर्देशों के अनुपालन की जानकारी होगी।
- यह सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।
- ताकि दिव्यांग कैदियों के अधिकारों की रक्षा हो।
पुरानी नियमावली और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ
अदालत ने पाया कि अधिकांश राज्य जेल नियमावली “पुरानी” हैं। वे विकलांग व्यक्तियों के अधिकार (RPwD) अधिनियम 2016 के अनुरूप नहीं हैं। ये नियमावली संवेदी या शारीरिक विकलांगताओं को मानसिक बीमारी से मिला देती हैं। इससे दिव्यांग कैदियों को अपने वैध अधिकारों का दावा करने में दिक्कत होती है। भारत दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCRPD) का हस्ताक्षरकर्ता है। इसका अनुच्छेद 15 हिरासत में दिव्यांगों के साथ अमानवीय व्यवहार को प्रतिबंधित करता है।
- अदालत ने स्वीकार किया कि जेलों में व्यवस्थित उपेक्षा है।
- विशेषकर दिव्यांग कैदियों की जरूरतों के संबंध में।
स्वास्थ्य सेवा का अधिकार और पोषण का पहलू
राज्य को दिव्यांग कैदियों को समुदाय में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवा के बराबर सेवा देनी होगी। इसमें फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मनोरोग देखभाल शामिल है। व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र जैसे सहायक उपकरण भी उपलब्ध होने चाहिए। जेल अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे निर्बाध देखभाल सुनिश्चित करें। नियमित और ज़रूरत के अनुसार जीवनरक्षक उपचार भी उपलब्ध होना चाहिए। प्रत्येक दिव्यांग कैदी को उनकी विशिष्ट स्वास्थ्य और आहार आवश्यकताओं के अनुरूप भोजन मिलेगा।
- अदालत ने अतिरिक्त मुआवजे की याचिका अस्वीकार कर दी।
- क्योंकि व्यक्तिगत या शानदार भोजन की मांग मौलिक अधिकार नहीं है।
पुलिस अधिकारियों और जेल कर्मचारियों का प्रशिक्षण
पुलिस अधिकारियों के लिए दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर ज़िलावार जागरूकता कार्यक्रम होंगे। ऐसे कार्यक्रम अधिनियम के प्रावधानों पर पर्याप्त प्रकाश डालेंगे। पुलिस अधिकारियों को दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे। इनमें दिव्यांग व्यक्तियों से निपटने का तरीका बताया जाएगा। इसी तरह के दिशानिर्देश सरकारी डॉक्टरों को भी जारी होंगे। सभी जेल कर्मचारियों को विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर व्यापक प्रशिक्षण मिलेगा।
- सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों का नियमित निरीक्षण होगा।
- यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे ठीक से काम कर रहे हैं।
भविष्य की दिशा: एक समावेशी जेल प्रणाली
शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु की सभी जेलों का राज्य-स्तरीय पहुँच ऑडिट छह महीने के भीतर पूरा करने का आदेश दिया। भारत में सार्वभौमिक पहुँच के लिए समन्वित दिशानिर्देशों (2021) के अनुसार ऑडिट होंगे। यह अदालत का प्रयास जेलों में दिव्यांगों के अधिकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह न्याय प्रणाली में सबसे कमजोर समूहों की दुर्दशा को संबोधित करता है।
- अदालत ने कहा, “यह दुर्गमता और बुनियादी देखभाल से वंचित करना सिर्फ़ प्रशासनिक चूक नहीं है।”
- ये भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं।
यह फैसला सिर्फ दिव्यांग कैदियों के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली की समावेशिता को स्थापित करने के लिए भी ऐतिहासिक है। अब हर जेल में यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा कि जेलों में दिव्यांगों के अधिकार हों — यानी समान गरिमा, स्वतंत्रता, पहुंच और मूलभूत सेवाओं तक समान पहुँच।



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