कांवड़ यात्रा क्यूआर कोड विवाद: सुप्रीम कोर्ट का यूपी सरकार को नोटिस
नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कांवड़ क्यूआर कोड विवाद से जुड़े मामलों में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों को नोटिस जारी करते हुए एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह मामला कांवड़ यात्रा मार्ग पर दुकानों और ढाबों के बाहर क्यूआर कोड अनिवार्य रूप से लगाने के आदेश से जुड़ा है, जिसमें मालिकों की पहचान उजागर होती है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कदम धार्मिक पहचान को उजागर करने की एक अप्रत्यक्ष और असंवैधानिक कोशिश है, जिससे अल्पसंख्यक विक्रेताओं की सुरक्षा और निजता को गंभीर खतरा है।
मुख्य घटनाएं
| तिथि | घटना |
|---|---|
| जुलाई 2023 | सुप्रीम कोर्ट ने नाम सार्वजनिक करने के निर्देश पर रोक लगाई। |
| 25 जून 2024 | यूपी सरकार ने कांवड़ मार्ग पर क्यूआर कोड लगाने का निर्देश जारी किया। |
| 11 जुलाई 2024 | कांवड़ यात्रा की शुरुआत। |
| 16 जुलाई 2024 | सुप्रीम कोर्ट ने यूपी-उत्तराखंड को नोटिस भेजा। |
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
- न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यूपी सरकार के निर्देश पर सवाल उठाते हुए 22 जुलाई को अगली सुनवाई तय की।
- कोर्ट ने कहा कि पहले से जारी अंतरिम रोक का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
- याचिका में निर्देश को कोर्ट की “जानबूझकर अवहेलना” बताया गया।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति क्या है?
- निर्देश को बताया “डिजिटल धार्मिक प्रोफाइलिंग” का प्रयास।
- याचिकाकर्ता अपूर्वानंद झा, महुआ मोइत्रा और आकार पटेल ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा कि:
- क्यूआर कोड स्कैन करने से दुकानदार की पहचान उजागर होती है।
- इससे अल्पसंख्यक दुकानदारों के खिलाफ भीड़ हिंसा की आशंका बढ़ती है।
- यह निजता और समानता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
पहले भी सुप्रीम रोक
- जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक पहचान अनिवार्यता पर रोक लगाई थी।
- कोर्ट ने कहा था कि कोई भी दुकानदार केवल भोजन के प्रकार की जानकारी देने के लिए बाध्य हो सकता है, पहचान उजागर करने के लिए नहीं।
याचिकाकर्ता पक्ष की दलील
- वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा, “यह कोर्ट के स्थगन आदेश की अवमानना है।”
- उन्होंने बताया कि कांवड़ यात्रा केवल 10-12 दिन में समाप्त हो रही है, अत: मामले में त्वरित सुनवाई आवश्यक है।
- चंदर उदय सिंह और हुजेफा अहमदी भी याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए।
कानूनी विश्लेषण: क्या यह आदेश संविधान विरोधी है?
- विशेषज्ञों के अनुसार, क्यूआर कोड में मालिकों की पहचान अनिवार्य करना “सूचना का अनावश्यक प्रकटीकरण“ है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), और 21 (निजता का अधिकार) का उल्लंघन कर सकता है।
- सुप्रीम कोर्ट का ‘पुट्टास्वामी फैसला’ (2017) निजता को मौलिक अधिकार मानता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
- टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा: “यह सरकार की चालाकी से भरी धार्मिक ध्रुवीकरण की नीति है।”
- एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी: “कांवड़ यात्रा के नाम पर अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जा रहा है।”
- यूपी सरकार का रुख: दो हफ्ते की मोहलत मांगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर एक सप्ताह में जवाब देने को कहा।
QR कोड बनाम लाइसेंस – विवाद का मूल
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि:
- दुकान के अंदर लाइसेंस पहले से प्रदर्शित होता है।
- बाहर नाम और धर्म उजागर करना गैरकानूनी और भेदभावपूर्ण है।
- “कांवड़ क्यूआर कोड विवाद” इस बात को लेकर है कि क्या धार्मिक पहचान दिखाना किसी खाद्य सुरक्षा या प्रशासनिक कारण से जरूरी है?
क्या खतरा है अल्पसंख्यकों को?
- रिपोर्टों के अनुसार, कई दुकानों पर क्यूआर कोड स्कैन करने के बाद भीड़ ने धार्मिक आधार पर दुकानें बंद कराईं।
- पिछले वर्षों में भी कांवड़ यात्रा मार्ग पर विक्रेताओं के साथ हिंसा की घटनाएँ दर्ज हुई हैं।
- इससे “निगरानी समूहों द्वारा जबरन कार्रवाई” का खतरा भी सामने आया है।
अगला सप्ताह निर्णायक
सुप्रीम कोर्ट की नजर इस बात पर है कि क्या कांवड़ यात्रा के नाम पर सरकारी आदेश धार्मिक पहचान उजागर करने की ओर बढ़ रहा है। अदालत की 22 जुलाई की सुनवाई यह तय कर सकती है कि क्या यह नीति संवैधानिक मूल्यों और निजता के अधिकार के अनुरूप है या फिर धार्मिक ध्रुवीकरण का एक माध्यम।



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