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अभिसार शर्मा पर FIR: पत्रकारिता का धर्म, या राष्ट्रद्रोह का आरोप?

अभिसार शर्मा पर FIR

21 अगस्त 2025 को, जाने-माने पत्रकार और YouTuber अभिसार शर्मा के खिलाफ असम के गुवाहाटी में दर्ज एक FIR ने पूरे देश में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर से तीखी बहस छेड़ दी है। यह मामला सिर्फ एक कानूनी कार्यवाही से कहीं ज्यादा, पत्रकारिता के सिद्धांतों, अभिव्यक्ति की आज़ादी और सत्ता से सवाल पूछने के अधिकार पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

FIR का कारण: वीडियो और आरोप

इस पूरे विवाद की जड़ 8 अगस्त को अभिसार शर्मा द्वारा अपलोड किया गया एक वीडियो था। इस वीडियो में उन्होंने असम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए थे। विशेष रूप से, उन्होंने 3000 बीघा आदिवासी भूमि एक निजी सीमेंट कंपनी (Mahabal Cements) को आवंटित करने के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। यह मुद्दा जो पहले से ही गुवाहाटी हाई कोर्ट में विचाराधीन था। इसके बाद, 21 अगस्त को गुवाहाटी क्राइम ब्रांच ने एक स्थानीय निवासी, आलोक बरुआ की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए अभिसार शर्मा के खिलाफ FIR दर्ज कर दी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि शर्मा के वीडियो ने “सांप्रदायिक राजनीति” का आरोप लगाकर सरकार का उपहास उड़ाया है और समाज में धार्मिक वैमनस्य फैलाने की कोशिश की है।

कानूनी पहलू: FIR में लगाई गई धाराएं

इस FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की बेहद गंभीर धाराएं लगाई गईं: धारा 152 (राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालना), धारा 196 (आपराधिक साज़िश), और धारा 197 (झूठे बयान देना)। धारा 152 को पुराने राजद्रोह कानून का ही नया रूप माना जाता है, जो सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ अक्सर इस्तेमाल किया जाता रहा है।

मीडिया की प्रतिक्रिया और कानूनी लड़ाई

इस FIR के सामने आने के बाद, 22 अगस्त को देश भर के पत्रकार संगठनों में आक्रोश फैल गया और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया तथा एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया जैसी प्रमुख संस्थाओं ने इसे ‘प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला’ बताते हुए FIR को तुरंत रद्द करने की मांग की। यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पत्रकार अभिसार शर्मा ने अपने वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के माध्यम से सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। जहां पत्रकार अभिसार शर्मा के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोरदार दलीलें दीं कि यह FIR कानून का दुरुपयोग है, और अगर हर असहमति की आवाज़ को ‘राष्ट्र विरोधी’ माना जाएगा, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। 28 अगस्त को जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच के सामने यह मामला सुनवाई के लिए आया। उन्होंने कपिल सिब्बल यह भी तर्क दिया कि BNS की धारा 152, जो पुराने ‘राजद्रोह’ कानून की तरह है, का मनमाने ढंग से पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर एक संतुलित और महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने कपिल सिब्बल की दलीलों को सुना, लेकिन FIR को सीधे रद्द करने से इनकार कर दिया और पत्रकार को पहले हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने पत्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए, एक अहम आदेश दिया कि अभिसार शर्मा को गिरफ्तारी से चार सप्ताह की अंतरिम सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने BNS की धारा 152 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है, जिससे यह मामला अब एक बड़ी कानूनी और संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है।

प्रेस की स्वतंत्रता का भविष्य: एक गहरा संकट?

यह मामला सिर्फ एक पत्रकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उन सभी पत्रकारों के लिए एक चेतावनी है जो निष्पक्षता के साथ रिपोर्टिंग करते हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया जैसे संगठनों ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है और इस कार्रवाई को वापस लेने की मांग की है। यह घटना भविष्य में इस बात का संकेत दे रही है कि सरकारें अपनी आलोचना को लेकर कितनी सख्त होंगी और प्रेस की स्वतंत्रता को किस हद तक चुनौती दी जाएगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कानूनी लड़ाई कहाँ तक जाती है और क्या यह देश में पत्रकारिता के भविष्य को नई दिशा देगी।

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