Loading Now

अडानी रिश्वतखोरी मामला: न्यूयॉर्क कोर्ट में SEC की बड़ी कार्रवाई

अडानी रिश्वतखोरी मामला

यह मामला अब एक गंभीर राजनयिक गतिरोध में बदल चुका है, जहां यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने नवंबर 2024 में दायर सिविल केस (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन बनाम अडानी, केस नंबर 1:24-cv-08080, ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यूयॉर्क) में गौतम अडानी और सागर अडानी पर $265 मिलियन डॉलर की रिश्वतखोरी, सिक्योरिटीज फ्रॉड और झूठे बयानों के गंभीर आरोप लगाए थे।

अडानी रिश्वतखोरी मामला की जड़ें अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की 2001 की बॉन्ड ऑफरिंग से जुड़ी हैं, जिसमें अमेरिकी निवेशकों से $175 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि जुटाई गई थी।

आरोप है कि इस दौरान कंपनी ने अपनी एंटी-ब्राइबरी पॉलिसी और कंप्लायंस के बारे में निवेशकों को गुमराह करने वाले बयान दिए थे। कमीशन ने शुरुआत से ही हेग सर्विस कन्वेंशन (1965 की संधि) के तहत भारत के कानून और न्याय मंत्रालय से सहायता मांगी थी, लेकिन कार्यवाही में निरंतर बाधाएं आती रही हैं।

हेग कन्वेंशन की विफलता और कमीशन की नई कानूनी चाल

फरवरी 2025 से दिसंबर 2025 तक कम से कम पांच स्टेटस रिपोर्ट्स में बार-बार “कोई प्रगति नहीं” या “सर्विस अभी तक नहीं हुई” की बात कही गई है। इस कछुआ चाल से परेशान होकर जनवरी 2026 में कमीशन ने एक मोशन दाखिल किया है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि हेग कन्वेंशन के पारंपरिक रास्ते से अब कोई उम्मीद शेष नहीं है।

इसी कारण, कमीशन ने अब वैकल्पिक सर्विस (Alternative Service) की अनुमति मांगी है। इसके तहत अमेरिकी वकीलों, जैसे किर्कलैंड एंड एलिस या क्विन इमैनुएल के जरिए, या ईमेल तथा अन्य डिजिटल माध्यमों से समन भेजने की मांग की गई है। यह कदम चौदह महीने से अधिक की निरंतर कोशिशों के बावजूद भारत की ओर से कोई ठोस कार्रवाई न होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो एक बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय संधि के प्रति गंभीर लापरवाही या जानबूझकर की गई देरी जैसा प्रतीत होता है।

इसे भी पढ़े :-अमेरिकी कोर्ट में पाँचवीं बार टला अडानी, समन, भारत केस: न्याय का मज़ाक

रूल 4(f)(3) का इस्तेमाल: अमेरिका का कड़ा एस्केलेशन

कमीशन की यह मोशन एक बहुत बड़ा एस्केलेशन माना जा रहा है। अब तक न्यूयॉर्क कोर्ट ने कमीशन को बार-बार स्टेटस रिपोर्ट्स फाइल करने के आदेश दिए थे। रिकॉर्ड बताते हैं कि अक्टूबर 2025 में आखिरी कम्युनिकेशन 14 सितंबर को हुआ था, लेकिन भारतीय पक्ष से कोई जवाब नहीं मिला।

दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में कमीशन ने कोर्ट को साफ बताया कि भारतीय मंत्रालय ने सर्विस पूरी नहीं की। अब जनवरी 2026 में हेग प्रक्रिया को “अप्रभावी” मानते हुए रूल 4(f)(3) के तहत वैकल्पिक रास्ते की मांग की गई है।

यह नियम अमेरिकी फेडरल कोर्ट को यह शक्ति देता है कि यदि पारंपरिक राजनयिक तरीके विफल हो जाएं, तो ईमेल, सोशल मीडिया, विदेशी वकीलों या सार्वजनिक प्रकाशन के जरिए सर्विस की जा सकती है। अडानी रिश्वतखोरी मामला में यदि कोर्ट इसकी अनुमति देता है, तो यह पहली बार होगा जब इतने हाई-प्रोफाइल विदेशी डिफेंडेंट्स के खिलाफ ऐसा कड़ा रुख अपनाया जाएगा।

भारत सरकार की निष्क्रियता और रणनीतिक टालमटोल के सवाल

भारत सरकार और उसके कानून तथा न्याय मंत्रालय की लगातार निष्क्रियता इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू बनकर उभरी है। हेग कन्वेंशन के आर्टिकल 5 के तहत, भारत की सेंट्रल अथॉरिटी (कानून मंत्रालय) का यह दायित्व है कि वह विदेशी कानूनी अनुरोधों पर अनिवार्य रूप से सेवा करे।

फरवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच 11-12 महीने बीत जाने के बाद भी कोई प्रगति न होना कई संदेह पैदा करता है। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि फरवरी 2025 में मंत्रालय ने मामला अहमदाबाद सेशंस कोर्ट को फॉरवर्ड किया था, लेकिन इसके बाद कोई फॉलो-अप नहीं हुआ।

यह लंबी देरी महज संयोग नहीं लगती; यह एक रणनीतिक टालमटोल प्रतीत होता है, जहां राजनीतिक संरक्षण के बल पर प्रक्रिया को जानबूझकर रोका जा रहा है। सवाल यह है कि यदि सरकार “कानून का राज” की पक्षधर है, तो अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सहयोग में यह अड़ंगा क्यों?

सोलर कॉन्ट्रैक्ट्स और 2200 करोड़ की कथित रिश्वत का गणित

यह पूरा प्रकरण अडानी ग्रुप की वैश्विक विश्वसनीयता पर गहरा सवालिया निशान लगाता है। खुद को “ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर लीडर” बताने वाला यह ग्रुप अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से अरबों डॉलर के फंड जुटाता है। लेकिन अडानी रिश्वतखोरी मामला की परतों में छिपे आरोप चौंकाने वाले हैं।

आरोपों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच भारतीय अधिकारियों को $265 मिलियन डॉलर (करीब 2200 करोड़ रुपये) की रिश्वत देकर ‘सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ से सोलर कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल किए गए। इन प्रोजेक्ट्स से अगले 20 वर्षों में $2 बिलियन डॉलर का मुनाफा होने का अनुमान था।

अडानी ग्रीन ने इन्हीं कॉन्ट्रैक्ट्स को आधार बनाकर अमेरिकी निवेशकों से निवेश लिया, जबकि उनके एंटी-करप्शन दावे पूरी तरह खोखले थे। यदि ये आरोप साबित होते हैं, तो यह भारतीय कॉरपोरेट गवर्नेंस और क्रोनी कैपिटलिज्म की साख को वैश्विक स्तर पर ध्वस्त कर सकता है।

इसे भी पढ़े :-किंगमेकर्स की चुप्पी और अडानी साम्राज्य का खतरनाक विस्तार

वैश्विक बाजारों में भारत की छवि पर मंडराता खतरा

कमीशन का यह आक्रामक रुख भारत के लिए एक सीधी चुनौती है: या तो हेग कन्वेंशन का पालन करते हुए कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाए, या फिर वैश्विक अलगाव और कठोर आर्थिक परिणामों के लिए तैयार रहा जाए। अमेरिका में SEC की शक्तियां अत्यंत व्यापक हैं।

यदि अल्टरनेटिव सर्विस को मंजूरी मिलती है, तो केस बिजली की गति से आगे बढ़ सकता है, जिससे डिफॉल्ट जजमेंट, एसेट फ्रीज (संपत्ति कुर्क) या अन्य सख्त एनफोर्समेंट कार्रवाइयों का रास्ता साफ हो जाएगा। भारत की ओर से “कोई प्रगति नहीं” की रिपोर्ट्स अब एक पैटर्न बन चुकी हैं, जो केवल समय खींचने की कोशिश लगती हैं।

शायद यह उम्मीद की जा रही है कि राजनीतिक नेगोशिएशंस से मामला ठंडा पड़ जाएगा, लेकिन कमीशन और पैरलल क्रिमिनल केस चला रहा डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस (DOJ) पीछे हटते नहीं दिख रहे।

क्या भारत का सिस्टम चुनिंदा पूंजीपतियों के लिए ‘प्रोटेक्टेड जोन’ है?

दरसल यह मुद्दा भारत की आर्थिक पारदर्शिता, विदेश नीति और न्यायिक स्वतंत्रता की असली कसौटी बन चुका है। अगर न्यूयॉर्क कोर्ट कमीशन की मोशन मंजूर करता है—जिसकी संभावना बहुत अधिक है क्योंकि देरी के सबूत स्पष्ट हैं—तो अडानी पक्ष को कोर्ट में जवाब देना ही होगा; अब चुप्पी या टालमटोल काम नहीं आएगी।

अडानी रिश्वतखोरी मामला अब सिर्फ रिश्वत और फ्रॉड तक सीमित नहीं रहा; यह एक बड़ा संवैधानिक और नैतिक सवाल बन गया है कि क्या भारत का सिस्टम कुछ खास अरबपतियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन चुका है? वैश्विक नियमों की अनदेखी की कीमत भारत को विदेशी निवेश में कमी, क्रेडिट रेटिंग डाउनग्रेड और बॉन्ड मार्केट में पूंजी की ऊंची लागत के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

इसे भी पढ़े :-अडानी अमेरिकी वारंट विवाद और भारत की संप्रभुता पर मंडराता बड़ा खतरा

जवाबदेही और कानून के राज की अंतिम परीक्षा

यह पूरी घटना एक कड़वी लेकिन जरूरी सच्चाई उजागर करती है कि जब राजनीतिक शक्ति और बड़े बिजनेस का गठजोड़ अंतरराष्ट्रीय संधियों को भी बौना बनाने की कोशिश करता है, तो लोकतंत्र और बाजार की अखंडता दोनों दांव पर लग जाते हैं।

SEC का यह सख्त कदम एक उम्मीद की किरण है कि डिजिटल युग में क्रॉस-बॉर्डर न्याय को अनंत काल तक नहीं रोका जा सकता। अडानी ग्रुप और भारत सरकार को अब यह तय करना होगा कि वे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करेंगे या एक लंबी और प्रतिष्ठा-घटाने वाली कानूनी जंग में उलझेंगे।

समय आ गया है कि कानून मंत्रालय तत्काल सर्विस पूरी करे और यह संदेश दे कि कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वह कोई भी शक्तिशाली अरबपति क्यों न हो। यह मामला भारतीय पूंजीवाद की वैश्विक परीक्षा का निर्णायक मोड़ है।

इसे भी पढ़े :-पवार-अडानी का पुराना रिश्ता: राहुल गांधी के विरोध और गठबंधन की मजबूरी

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed