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अडानी-SEC कानूनी जंग: न्यूयॉर्क कोर्ट में रिश्वत और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप

अडानी-SEC कानूनी जंग

अडानी-SEC कानूनी जंग 30 जनवरी 2026 को ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रक्रियागत समझौता हुआ। भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी ने अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) द्वारा दायर सिविल फ्रॉड मुकदमे के कानूनी दस्तावेजों को औपचारिक रूप से स्वीकार करने पर अपनी सहमति दे दी है।

यह कदम पिछले 14 महीनों से चले आ रहे उस कूटनीतिक और कानूनी गतिरोध को समाप्त करता है जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं।

अब जबकि अडानी-SEC कानूनी जंग आधिकारिक तौर पर कोर्ट रूम की दहलीज पर पहुंच गई है, जज निकोलस गारौफिस को इस मामले में सेवा (Service of Summons) से संबंधित किसी अलग फैसले की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि अडानी के अमेरिकी वकीलों ने स्वयं ही इन दस्तावेजों को स्वीकार कर लिया।

हाग कन्वेंशन का गतिरोध और भारत सरकार का रुख

यह पूरा मामला नवंबर 2024 में तब शुरू हुआ था जब SEC ने पहली बार शिकायत दर्ज की थी। अमेरिकी एजेंसी हाग कन्वेंशन के प्रावधानों के तहत भारत सरकार के माध्यम से इन दस्तावेजों को अडानी तक पहुंचाने की कोशिश कर रही थी। हालांकि, इस प्रक्रिया में भारत के कानून और न्याय मंत्रालय ने दो बार तकनीकी आधारों पर इन दस्तावेजों को तामील करने से इनकार कर दिया।

मंत्रालय की ओर से दिए गए कारणों में स्याही से किए गए हस्ताक्षर और आधिकारिक मुहर की कमी जैसे तकनीकी बिंदुओं को ढाल बनाया गया था।

इसके बाद जनवरी 2026 में SEC ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उन्हें ईमेल या अन्य वैकल्पिक माध्यमों से समन भेजने की अनुमति दी जाए। लेकिन अडानी की कानूनी टीम के इस हालिया फैसले ने उस कानूनी खींचतान को खत्म कर दिया है, जिससे यह साफ होता है कि अडानी अब इस मुकदमे का सामना सीधे तौर पर करने को तैयार हैं।

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अरबों डॉलर की रिश्वत और सौर ऊर्जा अनुबंधों का खेल

SEC द्वारा लगाए गए आरोप न केवल गंभीर हैं, बल्कि वे भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े भ्रष्टाचार के दावों में से एक हैं। आरोप है कि 2020 से 2024 के बीच गौतम और सागर अडानी ने भारतीय सरकारी अधिकारियों को $250 मिलियन (लगभग $265 मिलियन तक) की भारी-भरकम रिश्वत दी या देने का वादा किया। इस रिश्वत का मुख्य उद्देश्य Adani Green Energy और Azure Power के लिए आकर्षक सौर ऊर्जा अनुबंध हासिल करना था।

इन कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए अगले 20 वर्षों में $2 बिलियन से अधिक का कर-पश्चात (Post-tax) लाभ होने का अनुमान लगाया गया था। इस अडानी-SEC कानूनी जंग के केंद्र में यह आरोप भी है कि आंध्र प्रदेश जैसी राज्य सरकारों को बाजार दरों से काफी ऊपर की कीमतों पर बिजली खरीदने के लिए मजबूर किया गया था, जिसका सीधा बोझ जनता की जेब पर पड़ा।

अमेरिकी निवेशकों के साथ धोखाधड़ी और गुमराह करने वाले दावे

SEC का मुकदमा मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि कैसे रिश्वतखोरी के इस खेल के बीच अमेरिकी निवेशकों के साथ छल किया गया। जांच के अनुसार, सितंबर 2021 में Adani Green ने $750 मिलियन का बॉन्ड जारी किया था, जिसमें से $175 मिलियन की राशि सीधे तौर पर अमेरिकी निवेशकों से जुटाई गई थी। वहीं, Azure Power का स्टॉक भी न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) पर ट्रेड होता था।

SEC का तर्क है कि अडानी ने इन निवेशकों को जानबूझकर गुमराह किया, क्योंकि उनके ऑफरिंग मटेरियल में भ्रष्टाचार विरोधी (Anti-bribery) और एंटी-करप्शन नीतियों का कड़ाई से पालन करने का दावा किया गया था।

अब दस्तावेजी सबूतों के रूप में फोटोग्राफ्ड दस्तावेज और पावरपॉइंट/एक्सेल एनालिसिस सामने आए हैं, जो कथित तौर पर रिश्वत की राशियों का विस्तृत विवरण देते हैं, जिससे यह मामला केवल हिंडनबर्ग की रिपोर्ट तक सीमित न रहकर ठोस न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है।

दिग्गज वकीलों की फौज और अडानी की रक्षात्मक रणनीति

अपनी कानूनी स्थिति मजबूत करने के लिए अडानी ने वॉल स्ट्रीट के सबसे शक्तिशाली वकीलों में से एक, ‘सुलिवन एंड क्रॉमवेल’ के को-चेयर रॉबर्ट गिफ्रा जूनियर को मैदान में उतारा है। गिफ्रा की पहचान एक ऐसे वकील की है जो कठिन से कठिन मामलों को मोड़ने की क्षमता रखते हैं और हाल ही में वे डोनाल्ड ट्रंप की आपराधिक सजा को चुनौती देने वाली टीम का भी हिस्सा रहे हैं।

गिफ्रा ने कोर्ट में जो स्टिपुलेशन दाखिल किया है, वह दिखाता है कि अडानी समूह इसे टालने के बजाय एक आक्रामक डिफेंस की तैयारी में है। हालांकि अडानी ने व्यक्तिगत क्षेत्राधिकार (Personal Jurisdiction) सहित अपने सभी बचाव अधिकार सुरक्षित रखे हैं, लेकिन 90 दिनों का समय मिलने से उन्हें ‘Motion to Dismiss’ दाखिल करने या सबूतों को चुनौती देने का पर्याप्त मौका मिलेगा।

इस अडानी-SEC कानूनी जंग की समयरेखा अब स्पष्ट है—अडानी के जवाब के बाद SEC को 60 दिन और फिर अडानी को दोबारा जवाब के लिए 45 दिन मिलेंगे।

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भारतीय क्रोनी कैपिटलिज्म और राजनीतिक संरक्षण पर उठते सवाल

यह मामला भारत में क्रोनी कैपिटलिज्म और सत्ता के गलियारों में कॉर्पोरेट प्रभाव की गहरी जड़ों को भी उजागर करता है। जिस तरह से भारत सरकार ने हाग कन्वेंशन के तहत समन पहुंचाने में तकनीकी बाधाएं पैदा कीं, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि और अमेरिका के साथ राजनयिक संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आलोचकों का मानना है कि सरकारी संस्थान अब निष्पक्ष रहने के बजाय चुनिंदा शक्तिशाली कारोबारियों की रक्षा कवच की तरह काम कर रहे हैं।

बाजार की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जनवरी 2026 में जैसे ही SEC ने ईमेल के जरिए समन भेजने की अनुमति मांगी, अडानी समूह के शेयरों में 5-14% की भारी गिरावट देखी गई और देखते ही देखते $12.5 बिलियन का मार्केट कैप स्वाहा हो गया।

नैतिक दिवालियापन और ग्रीन एनर्जी सेक्टर पर प्रभाव

यह मुकदमा सिर्फ वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि ‘ग्रीन एनर्जी’ जैसे भविष्योन्मुखी क्षेत्र में नैतिक दिवालियापन का भी उदाहरण है। पर्यावरण के अनुकूल प्रोजेक्ट्स को हासिल करने के लिए रिश्वत का सहारा लेना निवेशकों के भरोसे को तोड़ता है।

हालांकि अडानी ग्रुप लगातार यह तर्क दे रहा है कि आरोप निराधार हैं और कंपनियां (जैसे अडानी ग्रीन) इस मुकदमे में सीधे तौर पर पार्टी नहीं हैं, बल्कि केवल व्यक्तिगत अधिकारी ही आरोपी हैं।

परंतु हकीकत यह है कि जब नेतृत्व की साख पर सवाल उठते हैं, तो पूरे समूह की बॉन्ड फंडिंग, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग और भविष्य के निवेश पर इसका नकारात्मक असर पड़ना तय है। अमेरिकी न्याय प्रणाली की निष्पक्षता अब इस बात की परीक्षा लेगी कि क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ‘अजेय’ छवि कानूनी प्रक्रिया के ऊपर हो सकती है।

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भविष्य की राह: डिस्कवरी फेज या भारी जुर्माना

आने वाले 90 दिनों के बाद की स्थिति इस अडानी-SEC कानूनी जंग का भविष्य तय करेगी। यदि कोर्ट ‘Motion to Dismiss’ को खारिज कर देता है, तो यह मामला ‘डिस्कवरी फेज’ में चला जाएगा, जहां और भी गुप्त दस्तावेज और सबूत सार्वजनिक हो सकते हैं।

दूसरी ओर, एक बड़े समझौते (Settlement) की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता, जिसमें भारी जुर्माना और भविष्य के लिए कड़े सुधारात्मक कदम शामिल हो सकते हैं।

भारतीय निवेशकों और जनता के लिए यह एक चिंतन का विषय है कि क्या देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को किसी कॉर्पोरेट हितों के लिए दांव पर लगाना उचित है। यह घटनाक्रम सत्ता और व्यापार के उस गठजोड़ की कमजोरी की शुरुआत हो सकती है, जो अब तक खुद को कानून से ऊपर समझती रही है।

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