एलोपैथी बनाम आयुर्वेद विवाद: चिकित्सा पद्धतियों की साख पर सवाल
नई दिल्ली: एलोपैथी बनाम आयुर्वेद विवाद को लेकर योग गुरु बाबा रामदेव के खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया है कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने कोविड-19 महामारी के दौरान एलोपैथी दवाओं के खिलाफ उनकी कथित टिप्पणियों से जुड़ी एफआईआर में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। इस घटनाक्रम ने रामदेव की कानूनी लड़ाई को एक बड़ी राहत दी है, क्योंकि अब उनके खिलाफ केवल बिहार के पटना में एक ही मामला लंबित है।
यह मामला न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष था, जहाँ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस नई जानकारी को साझा किया। उन्होंने पीठ को बताया कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने पहले ही क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। रामदेव की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने इस बात पर जोर दिया कि आदेश में इस बयान को दर्ज किया जाए, लेकिन पीठ ने इससे इनकार कर दिया। पीठ का मानना था कि छत्तीसगढ़ का मामला बंद होने के बाद, विभिन्न राज्यों में दर्ज एफआईआर को एक साथ करने की रामदेव की प्रार्थना अब अप्रासंगिक हो गई है। अब केवल बिहार में एक एफआईआर लंबित है।
पृष्ठभूमि और कानूनी लड़ाई
यह विवाद 2021 में शुरू हुआ, जब रामदेव ने एक वीडियो में एलोपैथिक दवाओं के बारे में विवादास्पद टिप्पणियां की थीं। इस वीडियो में, उन्होंने दावा किया था कि कोविड-19 के लिए एलोपैथिक दवाएं लेने से लाखों लोगों की मौत हुई है। हालांकि बाद में उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया था, लेकिन उनकी टिप्पणियों ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) सहित कई चिकित्सा निकायों को नाराज कर दिया था। इसके बाद, आईएमए की पटना और रायपुर (छत्तीसगढ़) शाखाओं ने उनके खिलाफ शिकायतें दर्ज कराईं। छत्तीसगढ़ में दर्ज एफआईआर में रामदेव पर आईपीसी की धारा 188, 269, 504 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत आरोप लगाए गए थे।
रामदेव ने इन मामलों को रद्द करने या एक साथ करने और गिरफ्तारी से सुरक्षा की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये शिकायतें व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों से प्रेरित थीं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एफआईआर “स्पष्ट रूप से” “प्रायोजित” व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गई थीं।
अदालत में बहस और वर्तमान स्थिति
अदालत में सुनवाई के दौरान, रामदेव के वकील सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि पिछले निर्देशों के अनुसार, छत्तीसगढ़ राज्य ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है, लेकिन बिहार ने अभी तक ऐसा नहीं किया है। बिहार के वकील ने बताया कि पटना मामले में शिकायतकर्ता स्थानीय अदालत में पेश नहीं हो रहा है। दवे ने यह भी आशंका जताई कि अगर शिकायतकर्ता विरोध याचिका दायर करता है तो छत्तीसगढ़ का मामला फिर से शुरू हो सकता है। हालांकि, पीठ ने उनके इस अनुरोध को खारिज कर दिया कि इस दलील को औपचारिक रूप से दर्ज किया जाए।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा, “अब इन शिकायतों को एक साथ रखने की क्या ज़रूरत है? वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ बंद कर दिया गया है। एफआईआर अब केवल पटना, बिहार में है। आपकी प्रार्थना अब मान्य नहीं है।” इस पर, न्यायालय ने रामदेव को यह आश्वासन दिया कि उनकी पहले दी गई अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी। इस कानूनी कार्यवाही में यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है, क्योंकि यह एलोपैथी बनाम आयुर्वेद विवाद में रामदेव को तत्काल राहत प्रदान करता है।
पुराने घटनाक्रम और आगामी सुनवाई
इस मामले में पहले भी कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं। अगस्त 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने आईएमए द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए रामदेव की आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों का अपमान करने वाली टिप्पणियों के लिए उन्हें फटकार लगाई थी। उस याचिका में, कोविड-19 टीकाकरण और आधुनिक चिकित्सा के खिलाफ चलाए जा रहे “बदनाम करने वाले अभियान” को रोकने के लिए उपाय करने की मांग की गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी रामदेव को डॉक्टरों के संघों द्वारा दायर एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान एलोपैथी के बारे में भ्रामक दावे करने से बचने को कहा था।
इस बीच, दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) ने भी मामले में पक्षकार बनने की अनुमति मांगी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि रामदेव ने “कोरोनिल” किट बेचकर ₹1,000 करोड़ से अधिक की कमाई की, जिन्हें सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया था। रामदेव, जिनके बयानों ने एलोपैथी बनाम आयुर्वेद विवाद को एक राष्ट्रव्यापी बहस बना दिया था, ने तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का पत्र मिलने के बाद अपने बयान वापस ले लिए थे, जिसमें उनकी टिप्पणियों को “अनुचित” बताया गया था।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 दिसंबर की तारीख तय की है, तब तक बिहार राज्य द्वारा अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने की उम्मीद है।
इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ में कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद अब रामदेव का ध्यान केवल बिहार में लंबित एकमात्र एफआईआर पर केंद्रित होगा। यह उनके लिए एक बड़ी राहत है और दिखाता है कि कैसे कानूनी प्रक्रियाएं एक लंबी और जटिल लड़ाई के बाद भी परिणाम दे सकती हैं।



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