अमित शाह संविधान विधेयक पर विपक्ष का हमला: लोकतंत्र संघवाद खतरे में
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बुधवार, 20 अगस्त, 2025 को लोकसभा में पेश किए गए तीन विधेयकों ने भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी है। इनमें ‘संविधान (एक सौ तीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2025’ प्रमुख है, जिसका उद्देश्य गंभीर आपराधिक आरोपों में 30 दिनों तक हिरासत में रहने वाले प्रधानमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों को पद से हटाने के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान करना है। इस कदम को लेकर विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र और भारत के संवैधानिक संघीय व्यवस्था के लिए ‘मृत्यु की घंटी’ बताया है। भाकपा (माले) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने पटना में प्रेस को संबोधित करते हुए इसे गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर करने की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान जानबूझकर गैर-भाजपा सरकारों को निशाना बनाने के लिए बनाया गया है, क्योंकि प्रधानमंत्री या भाजपा के मंत्रियों को जेल नहीं भेजा जाएगा। भट्टाचार्य ने कहा कि ईडी, सीबीआई और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के दुरुपयोग के बाद, यह विधेयक गैर-भाजपा सरकारों के अस्तित्व को लगभग असंभव बना देगा। उन्होंने लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर नागरिक से इस विधेयक का कड़ा विरोध करने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष द्वारा उपराष्ट्रपति पद के लिए न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी का चयन एक सकारात्मक निर्णय है। उन्होंने कहा कि रेड्डी का मानवाधिकारों की रक्षा में उल्लेखनीय ट्रैक रिकॉर्ड रहा है और उन्होंने छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम अभियान को असंवैधानिक घोषित किया था। भट्टाचार्य ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ को लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए एक जन आंदोलन बताया। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी निशाना साधते हुए कहा कि प्रवासी मजदूरों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जबकि गुजरात के नेता बिहार के मतदाता बन रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लाखों लोगों के नाम बिना पते के पाए गए हैं।
विपक्ष का आरोप: भाजपा अपने सहयोगियों को भी डरा रही है
विपक्षी नेताओं ने अमित शाह संविधान विधेयक के पीछे छिपी एक और रणनीति का खुलासा किया है। उनके अनुसार, यह विधेयक भाजपा के सहयोगी दलों जैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाऊ नायडू को ‘नियंत्रण में रखने’ के लिए है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह खतरनाक विधेयक है जो संघवाद पर प्रहार करता है और इसे वोट चोरी के खुलासे से ध्यान भटकाने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक नायडू और नीतीश जैसे सहयोगियों को ‘धमकाने’ के लिए है। शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने भी कहा कि इस विधेयक से नायडू और नीतीश ‘सबसे ज़्यादा डरे हुए’ हैं। राजद के मनोज झा ने नीतीश कुमार से ‘जागने’ और इस ‘ऑरवेलियन राज्य’ बनाने के कदम का विरोध करने का आह्वान किया।
मुख्यमंत्री स्टालिन और विजयन का कड़ा विरोध
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस विधेयक को “काला विधेयक” और “तानाशाही की शुरुआत” बताया। उन्होंने कहा कि 30 दिन की गिरफ्तारी बिना किसी मुकदमे या दोषसिद्धि के एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को हटाने के बराबर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम भाजपा द्वारा “वोट चोरी” के खुलासे से ध्यान भटकाने के लिए उठाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह विधेयक एनडीए सहयोगियों को ‘हमारे साथ रहो वरना’ का संदेश देने का एक कुटिल प्रयास है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी इस अमित शाह संविधान विधेयक की आलोचना करते हुए इसे संघवाद और राज्यों के अधिकारों पर ‘जबरदस्त हमला’ बताया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर करने की एक नई रणनीति है। उन्होंने भाजपा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो लोग भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार होते हैं, वे भाजपा में शामिल होते ही ‘अचानक संत’ कैसे बन जाते हैं।
सरकार का बचाव और जम्मू-कश्मीर में नई हलचल
इन आलोचनाओं के बीच, गृह मंत्री अमित शाह ने विधेयकों का बचाव करते हुए कहा कि जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ये संशोधन आवश्यक थे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को नए कानून के दायरे में रखा है, जबकि विपक्ष जेल से भी ‘सत्ता से चिपके रहने’ का आरोप लगा रहा है। उन्होंने अपने खुद के अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि जब उन्हें एक ‘राजनीति से प्रेरित’ मामले में गिरफ्तार किया गया था, तो उन्होंने गिरफ्तारी से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इस बीच, अमित शाह द्वारा लोकसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किए जाने के साथ ही, गृह मंत्रालय ने पूरे केंद्र शासित प्रदेश में अर्धसैनिक बलों की नए सिरे से तैनाती का आदेश दिया है। इस बदलाव के तहत सीआरपीएफ नागरिक क्षेत्रों में राष्ट्रीय राइफल्स की जगह लेगी, जबकि सेना सीमा पार के खतरों पर ध्यान केंद्रित करेगी। इस कदम का उद्देश्य सुरक्षा अभियानों को सुव्यवस्थित करना बताया गया है



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