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आवास का अधिकार और मताधिकार: दोनों को खत्म करती बीजेपी सरकारें!

मताधिकार और आवास का अधिकार

मताधिकार और आवास का अधिकार – दोनों खतरे में

भारतीय संविधान अनुच्छेद 326 स्पष्ट करता है। वयस्क मताधिकार आवास स्थिति से स्वतंत्र है। प्रत्येक 18+ नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त है। महल या फुटपाथ, कोई भेदभाव नहीं। मताधिकार और आवास का अधिकार मूलभूत स्तंभ हैं। एक बेघर व्यक्ति का मताधिकार करोड़पति के बराबर है। यह संवैधानिक समानता का सार है।

परंतु वास्तविकता भिन्न दिखती है। हाल के विध्वंसों ने संकट पैदा किया है। पुनर्वास के बिना झुग्गियाँ गिराई जा रही हैं। फॉर्म 7 का दुरुपयोग बढ़ रहा है। मताधिकार और आवास का अधिकार एक साथ कमजोर हो रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

शक्ति पृथक्करण: लोकतंत्र की आत्मा

न्यायमूर्ति स्कैलिया ने बार-बार चेतावनी दी। शक्ति पृथक्करण अत्याचार रोकता है। संविधान अधिकारियों के इरादों पर निर्भर नहीं करता। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका का संतुलन जरूरी है। संरचनात्मक पृथक्करण सर्वोत्तम सुरक्षा कवच है।

आज यह सिद्धांत संकट में है। विकास प्राधिकरण, चुनाव आयोग और सरकार साथ काम कर रहे हैं। इस सहयोग ने संतुलन तोड़ा है। परिणामस्वरूप, मताधिकार और आवास का अधिकार प्रभावित हुए हैं। यह संवैधानिक नैतिकता का सीधा उल्लंघन है।

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कानूनी ढाँचा: सिद्धांत बनाम व्यवहार

कानून सैद्धांतिक रूप से पारदर्शी है। आरपी अधिनियम की धारा 19 केवल “सामान्य निवास” माँगती है। अनुच्छेद 326 गैर-निवास को अयोग्यता का आधार बनाता है। चुनाव आयोग ने निर्देश जारी किए हैं। बेघर नागरिक भी मतदाता सूची में शामिल हो सकते हैं। क्षेत्रीय जाँच से उनका सत्यापन संभव है।

व्यवहार में गंभीर समस्याएँ हैं। बूथ स्तर अधिकारी दस्तावेजों पर अटके रहते हैं। विध्वंस के तुरंत बाद मतदाता हटाए जाते हैं। मताधिकार और आवास का अधिकार कागजी दावा बनकर रह गए। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

फॉर्म 7 को राजनीतिक हथियार बनाया गया। निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 का नियम 19 सुनवाई की गारंटी देता है। परंतु अक्सर इसकी अनदेखी होती है। दिल्ली उच्च न्यायालय का सुडामा सिंह फैसला मील का पत्थर है। पुनर्वास के बिना बेदखली जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। नागरिक भागीदारी इसका अभिन्न अंग है।

भारत में मताधिकार का ऐतिहासिक संघर्ष

भारत ने सार्वभौमिक मताधिकार के लिए संघर्ष किया। 1950 में संविधान लागू होने पर यह अधिकार मिला। जाति, धर्म या लिंग के भेद के बिना। आवास स्थिति कभी बाधा नहीं बनी। स्वतंत्रता संग्राम ने समानता का सपना देखा था। मताधिकार और आवास का अधिकार इसी सपने का हिस्सा हैं।

आजादी के बाद पहले आम चुनाव हुए। 1951-52 में 17 करोड़ मतदाताओं ने भाग लिया। उस समय बेघरों को भी वोट डालने का अधिकार था। निवास प्रमाण के लचीले नियम थे। समय के साथ प्रक्रिया जटिल हुई। यह मताधिकार और आवास का अधिकार सीमित करता है।

आवास अधिकार का कानूनी विकास

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसले दिए। 1985 में ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम मामला महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने कहा, आवास जीवन का अधिकार है। यह अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। मताधिकार और आवास का अधिकार इस प्रकार जुड़े हुए हैं।

2005 में प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) शुरू हुई। इसका लक्ष्य सबको आवास देना था। परंतु शहरी गरीबों को लाभ कम मिला। विस्थापन के बाद पुनर्वास अपवाद बना रहा। यह मताधिकार और आवास का अधिकार कमजोर करता है।

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मताधिकार और आवास का अधिकार: वास्तविक चुनौतियाँ

सुंदर नर्सरी, दिल्ली: मतदाता शुद्धिकरण का मॉडल

नवंबर 2023 में सुंदर नर्सरी के पास झुग्गियाँ गिराई गईं। 1000+ परिवार बेघर हुए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था। 2006 के बाद अतिक्रमण का हवाला दिया गया। गूगल मैप्स को प्राथमिक सबूत बनाया गया। बाद में डीयूएसआईबी ने वकील को नोटिस भेजा। उसने गलत हलफनामा दाखिल किया था।

जंगपुरा निर्वाचन क्षेत्र का चुनावी मानचित्र बदल गया। 2024 लोकसभा चुनाव में ये लोग वोट डाल सके। परंतु 2025 विधानसभा चुनाव से बाहर कर दिए गए। फॉर्म 7 का सुनियोजित दुरुपयोग हुआ। 628 मतदाताओं को सूची से हटाया गया। उन्हें “स्थानांतरित” घोषित किया गया। यह चुनावी हेराफेरी का स्पष्ट मामला था।

इन काट-छांट ने चुनाव परिणाम बदल दिया। भाजपा के तरविंदर सिंह मरवाह 675 वोटों से जीते। आप के मनीष सिसोदिया हार गए। हटाए गए मतदाताओं की संख्या 628 थी। यह जीत के अंतर से अधिक थी। मताधिकार और आवास का अधिकार सीधे प्रभावित हुए। यह लोकतंत्र के मूल्यों पर प्रहार है।

असम में बुलडोजर राजनीति: नागरिकता का संकट

असम में बंगाली भाषी मुसलमानों को निशाना बनाया गया। 2023-24 में बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। उन्हें “अतिक्रमणकारी” घोषित किया गया। धलपुर में 2000 परिवार बेदखल किए गए। उनके नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए। नए क्षेत्रों में पुनर्पंजीकरण के लिए शुल्क देना पड़ा।

कचुताली में 1000 मतदाताओं को काट-छांट नोटिस मिला। विस्थापन के तुरंत बाद यह कार्रवाई हुई। वे उसी निर्वाचन क्षेत्र में अस्थायी शिविरों में रह रहे थे। अधिकारियों ने “स्थानांतरण” का बहाना बनाया। चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों की अवहेलना की गई। बेघर मतदाताओं के लिए रात्रि सत्यापन अनिवार्य है।

नलबाड़ी विस्थापन ने दादा क्लॉज को नष्ट कर दिया। असम समझौते की 1971 की कट-ऑफ तिथि महत्वहीन हो गई। बकरिकुची के दशकों पुराने निवासी बेघर हुए। उनकी नागरिकता और मताधिकार दोनों खतरे में पड़ गए। मताधिकार और आवास का अधिकार साथ-साथ समाप्त हो रहे हैं। यह सुनियोजित राजनीतिक दमन है।

अकबर नगर, लखनऊ: शहरी विकास का छलावा

जून 2024 में अकबर नगर का विध्वंस हुआ। 1800 संरचनाएँ नष्ट कर दी गईं। 10,000 निवासी विस्थापित कर दिए गए। कुकरैल रिवरफ्रंट परियोजना का कारण बताया गया। अधिकांश निवासी मुस्लिम समुदाय से थे। उनके पास वैध वोटर आईडी और बिजली बिल थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने विध्वंस को वैध ठहराया। पीएमएवाई के तहत पुनर्वास अनिवार्य किया गया। परंतु कई लोग ₹4.8 लाख का फ्लैट नहीं खरीद सके। वैकल्पिक स्थान अपर्याप्त और दूर थे। बसंत कुंज लगभग 12 किमी दूर स्थित है। इससे मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया बाधित हुई।

मताधिकार और आवास का अधिकार गंभीर संकट में पड़ गए। विस्थापित निवासी कानूनी रूप से कमजोर हो गए। उनके नाम फॉर्म 7 के जरिए चुनौती के लिए खुले हैं। दिल्ली और असम के अनुभव भविष्य की तस्वीर दिखाते हैं। चुनाव आयोग अक्सर ऐसे विलोपन को मंजूरी देता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 326 का सीधा उल्लंघन है।

अन्य राज्यों में समान पैटर्न

मुंबई की झुग्गियाँ: 2022 में गोवंडी के करीब 1200 घर गिराए गए। निवासियों को तिरुपति या कोल्हापुर भेजा गया। उन्हें स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र से हटाया गया। मतदाता सूची में नाम बहाल करने में 18 महीने लगे।

चेन्नई का तटीय विस्थापन: 2023 में 500 मछुआरे परिवार बेदखल हुए। समुद्री तट विकास परियोजना का हवाला दिया गया। उनकी मतदाता पहचान रद्द कर दी गई। न्यायालय ने हस्तक्षेप किया तब बहाली हुई।

आँकड़ों की कहानी: राष्ट्रीय परिदृश्य

  • 2017-2023 के बीच 1.2 करोड़ लोग विस्थापित हुए।
  • शहरी क्षेत्रों में 67% विस्थापन पुनर्वास के बिना हुआ।
  • 2024 में 45 लाख मतदाताओं को सूचियों से हटाया गया।
  • बेघर मतदाताओं का पंजीकरण दर 12% से कम है।

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अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में सुरक्षा

सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र अनुच्छेद 21 महत्वपूर्ण है। इसमें आवास के अधिकार को मान्यता दी गई है। अंतर्राष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार संधि (ICCPR) भी स्पष्ट करती है। मताधिकार सार्वभौमिक होना चाहिए। मताधिकार और आवास का अधिकार वैश्विक मानकों का हिस्सा हैं।

भारत ने इन संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसलिए दायित्व बनता है। राष्ट्रीय कानूनों को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप होना चाहिए। विस्थापन और मतदान अधिकारों का सम्मान जरूरी है।

न्यायिक सक्रियता: आशा की किरण

सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में हस्तक्षेप किया। 2020 में अर्नब गोस्वामी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामला उल्लेखनीय है। न्यायालय ने बिना सुनवाई विध्वंस पर रोक लगाई। यह मताधिकार और आवास का अधिकार की रक्षा करता है।

उच्च न्यायालय भी सक्रिय हुए हैं। 2023 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फैसला दिया। विस्थापितों का मतदाता पंजीकरण तुरंत होना चाहिए। अस्थायी शिविरों को भी निवास स्थान माना जाए।

समाधान के रास्ते

  1. फॉर्म 7 प्रक्रिया में सुधार: काट-छांट से पहले अनिवार्य सुनवाई हो। बेघरों के लिए विशेष प्रावधान बनें।
  2. डिजिटल पहचान प्रणाली: आधार को निवास प्रमाण से अलग किया जाए। मोबाइल ऐप से वोटर सत्यापन हो।
  3. न्यायिक पर्यवेक्षण समिति: हर विस्थापन पर न्यायाधीशों की निगरानी हो।
  4. सामुदायिक पंजीकरण शिविर: विस्थापन स्थलों पर ही वोटर पंजीकरण हो।

नागरिक समाज की भूमिका

गैर-सरकारी संगठन महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) ने कई याचिकाएँ दायर कीं। उन्होंने मताधिकार और आवास का अधिकार के लिए संघर्ष किया।

मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) ने जागरूकता फैलाई। उनके प्रयासों से राजस्थान में नीतिगत बदलाव आए। स्थानीय निकायों को विस्थापितों की सूची सौंपी जाती है। यह मतदाता सूची अद्यतन में मदद करता है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र को बचाने का समय

बुलडोजर विध्वंस नया जेरीमैंडरिंग बन गया है। यह दो-चरणीय हमला है। पहले विस्थापन, फिर मतदाता सूची से हटाना। इससे अनुच्छेद 326 का सार्वभौमिक मताधिकार कमजोर होता है। मताधिकार और आवास का अधिकार लोकतंत्र की आधारशिला हैं।

स्कैलिया की चेतावनी याद रखें। जब संस्थाएँ मिलकर काम करती हैं, तो शक्ति पृथक्करण टूटता है। यह प्रच्छन्न तानाशाही का रास्ता है। बुलडोजर सिर्फ ईंटें नहीं गिराते। वे संवैधानिक नैतिकता को नष्ट कर रहे हैं। सार्वभौमिक मताधिकार खतरे में है।

हमें सचेत होने की आवश्यकता है। मताधिकार और आवास का अधिकार हर नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। इनकी रक्षा करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। अन्यथा, लोकतंत्र एक खोखला शब्द बन जाएगा। आइए, संविधान के मूल्यों को पुनर्जीवित करें।

मताधिकार और आवास का अधिकार- यही है भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की कसौटी।

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