“अरावली राजनीतिक घमासान” पहाड़ियों की नई परिभाषा पर छिड़ा बड़ा विवाद
अरावली राजनीतिक घमासान के बीच राजस्थान के मंत्री जवाहर सिंह बेधम ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। शुक्रवार को बेधम ने आरोप लगाया कि विपक्षी पार्टी अरावली मुद्दे पर “लोगों को गुमराह” कर रही है और जानबूझकर “फर्जी प्रोपेगेंडा” फैला रही है।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि विरोध करने वाले वही लोग हैं जो कभी अशोक गहलोत सरकार का हिस्सा हुआ करते थे। बेधम के अनुसार, कांग्रेस इस संवेदनशील मामले को लेकर जनता में भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है, जबकि सरकार केवल कानूनी प्रक्रियाओं का पालन कर रही है।
100 मीटर की परिभाषा पर सचिन पायलट की चेतावनी
दूसरी ओर, राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव पर चिंता जताई है जो सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया है। पायलट का दावा है कि अरावली पर्वत श्रृंखला को इस नई परिभाषा से “गंभीर खतरा” है, क्योंकि केंद्र ने 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही सुरक्षा के दायरे में रखने की बात कही है।
उन्होंने तर्क दिया कि अरावली की अधिकांश पर्वत श्रृंखलाएं 100 मीटर से कम ऊंची हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि इस प्राचीन सुरक्षा कवच का अस्तित्व अब खतरे में है। पायलट ने चेतावनी दी कि सरकार की निष्क्रियता से अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति हो सकती है।
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अरावली की सुरक्षा और अस्तित्व पर सवाल
पायलट ने आगे कहा कि प्रतिबंध तो पहले से ही लागू था, लेकिन नई परिभाषा के कारण अब सरकार लोगों का विश्वास खो रही है। उनके अनुसार, अरावली पर्वत श्रृंखला प्राचीन काल से उत्तर-पश्चिमी भारत के लिए एक सुरक्षा कवच रही है। आज जब इसका अस्तित्व खतरे में है, तो लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
अरावली राजनीतिक घमासान तब और तेज हो गया जब पायलट ने केंद्र पर पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इन पहाड़ियों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अरावली केवल पत्थर नहीं, बल्कि एक जीवन रेखा है जिसे खत्म किया जा रहा है।
जयराम रमेश और भूपेंद्र यादव के बीच जुबानी जंग
सोशल मीडिया पर भी यह विवाद कम नहीं है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के बीच अरावली को लेकर तीखी बहस छिड़ गई। रमेश ने भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 20 मीटर से अधिक ऊंची अरावली पहाड़ियों में से केवल 8.7% ही 100 मीटर से अधिक ऊंची हैं।
यदि सभी पहचानी गई पहाड़ियों को देखा जाए, तो 1% से भी कम 100 मीटर की ऊंचाई पार करती हैं। रमेश ने केंद्र के फैसले को “विनाशकारी” बताते हुए कहा कि पूरी अरावली को उसकी ऊंचाई की परवाह किए बिना संरक्षित किया जाना चाहिए।
खनन माफिया को संरक्षण और भ्रष्टाचार के आरोप
इस अरावली राजनीतिक घमासान में पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी कूद पड़े हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में खनन माफिया को संरक्षण दे रही है। चीमा का दावा है कि क्षेत्र में खनन रोकने के लिए कोई प्रभावी आदेश लागू नहीं किए जा रहे हैं।
वहीं, राज्यसभा सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने हरियाणा के अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध खनन का मुद्दा उठाया। उन्होंने ईडी के हवाले से दावा किया कि दादुम पहाड़ियों में अवैध खनन से सरकारी खजाने को ₹1,200 करोड़ का नुकसान हुआ है और लोग भारी मशीनों के शोर व डर के साए में जीने को मजबूर हैं।
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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और अवमानना की धमकी
अरावली को परिभाषित करने का मामला तब गंभीर हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों को अवमानना की चेतावनी दी। एक साल से अधिक समय तक तीन कमेटियां इस पर काम करती रहीं, लेकिन कोई ठोस तकनीकी मानदंड तय नहीं हो पाया।
अंततः अगस्त 2025 में एक उप-समिति बनी, जिसने पारिस्थितिक विचारों और 2019 की राष्ट्रीय खनिज नीति के बीच “संतुलन” बनाने पर ध्यान दिया। मंत्रालय के 2,000 पन्नों के हलफनामे के अनुसार, आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण खनिजों के दोहन की बात कही गई है।
कोर्ट ने अब स्पष्ट किया है कि जब तक सतत खनन प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार नहीं हो जाती, कोई नई माइनिंग लीज नहीं दी जाएगी।
अरावली की भौगोलिक महत्ता और 2 अरब साल का इतिहास
उत्तर-पश्चिमी भारत में 670 किलोमीटर लंबी दुनिया की सबसे पुरानी फोल्ड-माउंटेन बेल्ट में से एक है। लगभग 2 अरब साल पुरानी यह श्रृंखला दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। इसकी सबसे ऊंची चोटी माउंट आबू में ‘गुरु शिखर’ (1,722 मीटर) है।
राजनीतिक घमासान का मुख्य केंद्र यही है कि इसके 34 जिलों में फैले विविध भू-भाग को केवल ऊंचाई के आधार पर वर्गीकृत करना कितना सही है। 2010 के मानकों के अनुसार, 3 डिग्री से अधिक ढलान वाली जमीन को पहाड़ी माना जाता था, लेकिन नई परिभाषा ने इन मानकों को पूरी तरह बदल दिया है।
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भविष्य की रणनीति और सस्टेनेबल माइनिंग की चुनौती
20 नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ICFRE द्वारा अरावली का कुल प्रभाव मूल्यांकन और पारिस्थितिक वहन क्षमता का अध्ययन किया जाएगा। इसमें रणनीतिक और परमाणु खनिजों जैसे लिथियम, निकल और ग्रेफाइट के वैज्ञानिक दोहन पर भी विचार होगा।
हालांकि, सुरजेवाला जैसे नेताओं का कहना है कि चरखी दादरी जैसे जिलों में 383 हेक्टेयर पहाड़ियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं। अब देखना यह है कि क्या सरकार और अदालतों का यह ‘संतुलन’ अरावली के अस्तित्व को बचा पाता है या फिर यह विकास की भेंट चढ़ जाएगा।
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