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समीर वानखेड़े ड्रग्स केस में आरिफ भुजवाला को 15 साल की जेल

समीर वानखेड़े ड्रग्स केस

समीर वानखेड़े ड्रग्स केस नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के मुंबई विंग के पूर्व जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के कार्यकाल के दौरान देश भर की सुर्खियों में रहे वर्ष 2021 के हाई-प्रोफाइल सिंथेटिक ड्रग्स जब्ती मामले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आया है।

ठाणे की एक विशेष एनडीपीएस (NDPS) अदालत ने इस मामले में मुख्य आरोपी और ड्रग सरगना मोहम्मद आरिफ भुजवाला सहित पांच आरोपियों को प्रतिबंधित नशीले पदार्थों को रखने और उनकी तस्करी का दोषी करार देते हुए सजा का ऐलान किया है।

स्पेशल जज जी.टी. पवार ने अपने विस्तृत फैसले में जहाँ आरोपियों से हुई वास्तविक बरामदगी को सही माना, वहीं अभियोजन पक्ष (NCB) के उस सबसे बड़े और सनसनीखेज दावे को पूरी तरह हवा में उड़ा दिया, जिसमें कहा गया था कि ये आरोपी भगोड़े अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसके भाई अनीस इब्राहिम के अंतरराष्ट्रीय सिंथेटिक ड्रग्स तस्करी सिंडिकेट का हिस्सा थे।

विशेष अदालत के अंतिम आदेश में दाऊद इब्राहिम या उसके किसी संगठित सिंडिकेट के साथ आरोपियों के कथित संबंधों का दूर-दूर तक कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

सजा का गणित: भुजवाला को 15 साल, चिंकू पठान को 5 साल की कैद

अदालत ने उपलब्ध सबूतों और बरामदगी की मात्रा को देखते हुए आरोपियों के खिलाफ सजा तय की। चूंकि मोहम्मद आरिफ भुजवाला के खिलाफ व्यावसायिक मात्रा (Commercial Quantity) के प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की बरामदगी का हिस्सा साबित हुआ, इसलिए अदालत ने उसे कानूनन निर्धारित न्यूनतम सजा से अधिक दंड देने का निर्णय लिया।

भुजवाला को 15 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है और साथ ही 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। चूंकि भुजवाला ट्रायल के दौरान जमानत पर बाहर था, इसलिए कोर्ट ने उसे तत्काल आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया है।

इसके अलावा, दिवंगत अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला के पोते परवेज नसरुल्लाह खान उर्फ ​​चिंकू पठान, सलमान खान और विक्रांत जैन को 5-5 साल के कठोर कारावास और प्रत्येक पर 50,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई है। वहीं, एक अन्य आरोपी हारिस खान को 1 साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा दी गई है।

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आधा केस खारिज: फोरेंसिक रिपोर्ट ने खोली एनसीबी के दावों की पोल

इस मामले की गहराई में जाने पर पता चलता है कि विशेष अदालत ने अभियोजन पक्ष के दावों को केवल आंशिक रूप से ही स्वीकार किया है। जनवरी और मई 2021 के बीच दक्षिण मुंबई के चिंचबंदर स्थित ‘नूर मंजिल’ और भिवंडी व घनसोली के ठिकानों पर समीर वानखेड़े के नेतृत्व में देर रात कई ताबड़तोड़ छापेमारी की गई थी।

एनसीबी ने चार्जशीट में दावा किया था कि उन्होंने नूर मंजिल से 5.375 किलोग्राम एमडी (मेफेड्रोन), 6.126 किलोग्राम एफेड्रिन और 990 ग्राम मेथामफेटामाइन बरामद किया था। हालांकि, जब इन रासायनिक नमूनों की फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) द्वारा जांच की गई, तो एनसीबी की कहानी बिखर गई।

केमिकल विश्लेषण रिपोर्टों में सामने आया कि एनसीबी ने जिन नमूनों को भारी मात्रा में हेरोइन, एफेड्रिन और मेथामफेटामाइन बताया था, उनमें से कई नमूनों में इन ड्रग्स की मौजूदगी पाई ही नहीं गई। फोरेंसिक सबूतों की इस बड़ी विसंगति के कारण अदालत ने भुजवाला के खिलाफ कथित जब्ती के केवल एक हिस्से (670 ग्राम और 35 ग्राम एमडी) को ही कानूनी रूप से प्रमाणित माना और बाकी बड़े दावों को खारिज कर दिया।

समीर वानखेड़े की जिरह: कागजी तारीखों पर घिरी केंद्रीय एजेंसी

इस मामले के फैसले में तत्कालीन जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े की गवाही और उस पर बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा की गई जिरह (Cross-Examination) का विस्तार से उल्लेख है। वानखेड़े इस मामले में अभियोजन पक्ष के एक महत्वपूर्ण गवाह के रूप में अदालत के सामने पेश हुए थे।

जिरह के दौरान समीर वानखेड़े ने अदालत में यह स्वीकार किया कि मामले से जुड़े खुफिया सूचना नोटों (Information Notes) में संदिग्धों या जब्ती के संबंध में कोई विशिष्ट संख्याएं दर्ज नहीं थीं।

सबसे बड़ी कमजोरी तब उजागर हुई जब उन्होंने माना कि वह अदालत के सामने ऐसा कोई समकालीन लिखित या तकनीकी सबूत पेश नहीं कर सके जिससे यह अकाट्य रूप से साबित हो सके कि ये खुफिया दस्तावेज ठीक उसी समय और तारीख को तैयार किए गए थे, जिसका जिक्र केस डायरी में है।

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पंच गवाहों का न आना और संदेह का लाभ: 5 आरोपी हुए बरी

बचाव पक्ष के वकीलों, जिनमें वकील अली काशिफ खान देशमुख शामिल थे, ने दलील दी थी कि एनसीबी का पूरा मामला इसलिए खारिज किया जाना चाहिए क्योंकि इस जब्ती के कई स्वतंत्र ‘पंच गवाहों’ (Panch Witnesses) का परीक्षण नहीं कराया गया और जांच में गंभीर प्रक्रियागत खामियां थीं।

हालांकि, जज जी.टी. पवार ने इस तर्क को आंशिक रूप से खारिज करते हुए कहा, “यदि अन्य गवाहों और सरकारी अधिकारियों के सबूत विश्वसनीय पाए जाते हैं, तो केवल पंचों की जांच न होना पूरे मामले को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता।”

इसके बावजूद, सबूतों की अपर्याप्तता और संदिग्ध फोरेंसिक रिपोर्ट के चलते अदालत ने 10 में से 5 आरोपियों को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए पूरी तरह बरी कर दिया।

बरी होने वाले लोगों में राहुल कुमार वर्मा, मोहम्मद औन जावेद हैदर सैयद (जिसकी त्वरित सुनवाई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने में ट्रायल पूरा करने का आदेश दिया था), जाकिर हुसैन फजल हक शेख, मोहम्मद फारान खान और मोहम्मद जमान हिदायतुल्ला खान शामिल हैं। मामले का एक अन्य आरोपी, हुसैन बिलाल तेलवाला अभी भी कानून की गिरफ्त से दूर और फरार घोषित है।

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संपादकीय दृष्टिकोण:

ठाणे एनडीपीएस कोर्ट का यह फैसला केंद्रीय जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ा सबक है। जब कोई जांच एजेंसी किसी मामले को केवल ड्रग्स जब्ती से आगे बढ़ाकर ‘अंडरवर्ल्ड सिंडिकेट’ और ‘अंतरराष्ट्रीय कार्टेल’ जैसी भारी-भरकम और मीडिया को आकर्षित करने वाली सुर्खियां देती है, तो उसे अदालत की कसौटी पर भी उतने ही पुख्ता सबूत पेश करने होते हैं।

समीर वानखेड़े के दौर में मीडिया के सामने दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क का जो दावा जोर-शोर से किया गया था, वह वैज्ञानिक और फोरेंसिक जांच की कसौटी पर टिक नहीं सका। यह फैसला साफ करता है कि अदालतें केवल जांच अधिकारियों के बयानों या सनसनीखेज आरोपों पर नहीं, बल्कि अकाट्य फोरेंसिक रिपोर्ट और पारदर्शी कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर ही न्याय तय करती हैं। सोशल मीडिया पर फिर चर्चा में आया समीर वानखेड़े ड्रग्स केस समीर वानखेड़े ड्रग्स केस, बयानों और सबूतों को लेकर बड़ी खबर

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