भारतीय लोकतंत्र का भविष्य: ढहती नींव और संस्थागत संकट
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां इसकी नींव पर निरंतर हथौड़ा चल रहा है। संस्थाओं की बढ़ती कमजोरी और सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण एक ऐसा खतरनाक संयोजन बन चुका है, जो देश के लोकतांत्रिक ढांचे को हिला रहा है।
आज संसद, जो कभी जीवंत बहस और अटूट जवाबदेही का पवित्र मंच हुआ करती थी, अब महज एक ‘रबर स्टैंप’ बनकर रह गई है। संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर बिलों पर न्यूनतम चर्चा की जा रही है और विपक्ष की वाजिब आवाज को लगातार दबाया जा रहा है।
न्यायपालिका, जिसे न्याय का अंतिम रक्षक माना जाता है, वह भी वर्षों की देरी और लंबित मामलों के बोझ से कराह रही है। स्थिति यह है कि सत्ता की यह एकाग्रता अब असहमति को अपराध की श्रेणी में खड़ा कर रही है, जो भारत को एक अघोषित आपातकाल की अंधेरी सुरंग की ओर धकेल रही है।
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संसदीय लोकतंत्र का क्षरण और विधायी प्रक्रिया पर सवाल
संसद के भीतर बहस की कमी इस बात का स्पष्ट और कड़वा संकेत है कि हमारी विधायी प्रक्रिया अब उतनी लोकतांत्रिक नहीं रह गई है जितनी इसे होना चाहिए था। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि संसद में जनता के मुद्दों पर कितनी गंभीरता से चर्चा होती है, लेकिन हाल के सत्रों ने निराश किया है।
विशेष रूप से 2023 के विशेष सत्र में यह देखा गया कि कई अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले बिल बिना किसी पर्याप्त चर्चा के आनन-फानन में पारित कर दिए गए। विपक्षी सांसदों को अपनी बात रखने या तर्क पेश करने का न्यूनतम मौका भी नहीं मिला। यह प्रवृति न केवल संसदीय परंपराओं का अपमान है, बल्कि यह उस विश्वास को भी तोड़ती है जो आम नागरिक इस सर्वोच्च संस्था में रखता है।
संसदीय समितियों की उपेक्षा और कार्यकारी की मनमानी
एक समय था जब हर महत्वपूर्ण बिल को गहराई से परखने के लिए संसदीय समितियों के पास भेजा जाता था, लेकिन अब यह संख्या तेजी से घट रही है। बहस, जो कभी घंटों और दिनों तक चलती थी, अब महज कुछ मिनटों की औपचारिकता बनकर समाप्त हो जाती है।
यह न केवल कानून बनाने की गुणवत्ता को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है, बल्कि सत्ता पक्ष को एक ऐसी अनियंत्रित शक्ति प्रदान कर रहा है, जहां संसदीय प्रक्रिया महज एक खानापूर्ति नजर आती है। ऐसी स्थिति में विपक्ष की रुकावटें रचनात्मक होने के बजाय सरकार की सुविधा का माध्यम बनती जा रही हैं। परिणामस्वरूप, संसद अब जनता की आकांक्षाओं की आवाज बनने के बजाय कार्यकारी के निर्णयों पर महज मुहर लगाने का एक माध्यम बन चुकी है।
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भारतीय लोकतंत्र का भविष्य
न्यायपालिका में देरी की समस्या अब एक गंभीर महामारी का रूप ले चुकी है, जहां लाखों मामले धूल फांक रहे हैं और महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों पर फैसले वर्षों तक टाले जा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल के दौरान यह उम्मीद थी कि न्याय की गति बढ़ेगी, लेकिन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अदालत की निष्क्रियता साफ तौर पर उजागर हुई है।
ज्ञानवापी या अन्य धार्मिक विवादों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कानून की सख्त और निष्पक्ष व्याख्या करने के बजाय, अक्सर एक ऐसा राजनीतिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास दिखाई देता है जो न्यायिक गरिमा को प्रभावित करता है। न्याय में यह विलंब न केवल लोगों का भरोसा तोड़ रहा है, बल्कि शासन की मनमानी को एक खुला मैदान दे रहा है।
अदालती हस्तक्षेप और राज्य की बुलडोजर नीति
जब अदालतें महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर मौन साध लेती हैं, तो इसका सीधा असर नागरिक अधिकारों पर पड़ता है। आज स्थिति यह है कि न्यायपालिका कभी-कभी राज्य की ‘बुलडोजर नीतियों’ को भी मूक सहमति या धीमी प्रतिक्रिया के माध्यम से हरी झंडी देती नजर आती है। देरी से मिलने वाला न्याय दरअसल न्याय न मिलने के बराबर है।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से कार्यकारी के निर्णयों की समीक्षा करे, लेकिन वर्तमान में इसकी स्वतंत्रता पर उठ रहे सवाल लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ को अंदर से खोखला कर रहे हैं। यह स्थिति नागरिकों को सत्ता की निरंकुशता के सामने असहाय बना रही है।
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भारतीय लोकतंत्र का भविष्य
लोकतंत्र की शुद्धता उसके चुनावों में निहित होती है, लेकिन आज चुनाव आयोग (ईसीआई) पर समझौतों के आरोप अब केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित पैटर्न बन चुके हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान ईसीआई की भूमिका संदेह के घेरे में रही, जहां मतदाता संख्या में असंगतियां और ईवीएम से जुड़ी शिकायतों पर आयोग का रवैया बेहद उदासीन रहा।
आदर्श आचार संहिता के खुले उल्लंघनों पर भी आयोग की कार्रवाई सत्ता पक्ष के प्रति नरम दिखाई दी। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भले ही बदलाव किए गए हों, लेकिन संस्था की निष्पक्षता का संकट बरकरार है। जब आयुक्तों को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद पद्म पुरस्कार या राज्यपाल जैसे पदों से पुरस्कृत किया जाता है, तो संस्था की साख को भारी चोट पहुंचती है।
जनता और युवाओं की भूमिका
ईडी और सीबीआई जैसी प्रवर्तन एजेंसियां अब अपनी जांच क्षमता के बजाय राजनीतिक हथियार के रूप में अधिक पहचानी जा रही हैं। विपक्षी नेताओं पर छापे और गिरफ्तारियां बिना किसी ठोस आधार या बिना एफआईआर के की जा रही हैं, जो सीधे तौर पर “प्रक्रिया ही सजा है” (Process is the Punishment) की दमनकारी नीति को दर्शाता है।
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी चेहरों पर एजेंसियों की कार्रवाई यह साबित करती है कि कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल अब न्याय के लिए नहीं, बल्कि विरोधी आवाजों को चुप कराने के लिए किया जा रहा है।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य अंधकारमय होता दिख रहा है क्योंकि ये एजेंसियां सत्ता के केंद्रीकरण को मजबूत करने का माध्यम बन चुकी हैं, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान पूरी तरह असमान हो गया है।
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नागरिक प्रतिरोध और संविधान बचाने की अंतिम पुकार
आज विपक्ष का उत्पीड़न एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, जहां नेताओं को जेल भेजना, उनके भाषणों को संसद के रिकॉर्ड से हटाना और मीडिया के जरिए उनके खिलाफ दुष्प्रचार करना शामिल है। यह केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सिविल सोसाइटी और एनजीओ को भी निशाने पर लेकर असहमति को अपराध बनाया जा रहा है।
संस्थाओं की यह कमजोरी संघीय सिद्धांतों को चोट पहुँचा रही है और उत्तर-दक्षिण विभाजन के साथ-साथ जातीय तनावों को भी उकसा रही है। जब संसद, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसे स्तंभ ढहने लगते हैं, तो नागरिकों की स्वतंत्रता के सामने बड़ा खतरा पैदा हो जाता है।
अब समय आ गया है कि जनता स्वयं सड़कों पर उतरे और संविधान की रक्षा के लिए आवाज उठाए। यदि इन संस्थाओं की गरिमा और स्वायत्तता बहाल नहीं हुई, तो अघोषित तानाशाही भारत के भाग्य में अपरिहार्य हो जाएगी।



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