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सोनम वांगचुक पर NSA और लद्दाख में गहराता संवैधानिक संकट

सोनम वांगचुक पर NSA

सोनम वांगचुक पर NSA के तहत की गई कार्रवाई आज लद्दाख के हर घर में चर्चा का विषय बनी हुई है। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो का हालिया बयान लद्दाख के लोगों की उस गहरी पीड़ा और निराशा को बयां करता है, जो केंद्र सरकार की वादाखिलाफी और दमनकारी नीतियों को वर्षों से झेल रहे हैं।

उन्होंने साफ कहा कि बंदूक के दम पर लद्दाख के हक नहीं छीने जा सकते। यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि बीजेपी का अपना चुनावी वादा है—2019 और 2020 के चुनावों में छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा देने का वादा।

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जोधपुर जेल में बंद वांगचुक और कानूनी संघर्ष

दिसंबर 2025 तक सोनम वांगचुक अभी भी NSA के तहत जोधपुर जेल में बंद हैं, जहां उनकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस मामले की सुनवाई 15 दिसंबर को हुई, जहां केंद्र ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की अनुमति तक देने से इनकार कर दिया।

यह दमन की राजनीति का चरम है, जहां एक शांतिपूर्ण आंदोलनकारी को राष्ट्र-विरोधी करार देकर जेल में डाल दिया गया। सोनम वांगचुक पर NSA लगाने के सरकारी फैसले को गीतांजलि ने एक सोची-समझी ‘विच-हंट’ करार दिया है।

2019 के वादे बनाम 2025 की कड़वी हकीकत

2019 में अनुच्छेद 370 हटाकर लद्दाख को अलग संघ क्षेत्र बनाने के समय बीजेपी ने बड़े वादे किए थे। इनमें राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के माध्यम से आदिवासी संस्कृति और भूमि की सुरक्षा, स्थानीय नौकरियां और पर्यावरण संरक्षण शामिल थे। लेकिन छह साल बाद हकीकत इसके ठीक उलट है।

आज बेरोजगारी चरम पर है, औद्योगिक परियोजनाओं से नाजुक ग्लेशियर पिघल रहे हैं, और बाहरियों को बसाने की नीतियां लागू हो रही हैं। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) की जायज मांगों को लगातार अनसुना किया जा रहा है।

सोनम वांगचुक और NSA विवाद

सितंबर 2025 में 35 दिन की भूख हड़ताल के दौरान लद्दाख की सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया। पुलिस फायरिंग में चार लोग मारे गए और 90 से ज्यादा लोग घायल हुए। सरकार ने सारा दोष वांगचुक पर थोप दिया, जबकि वे खुद हिंसा रोकने की अपील कर रहे थे और हड़ताल समाप्त कर चुके थे।

यह स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक साजिश लगती है, जहां SECMOL की FCRA लाइसेंस रद्द करना, CBI जांच और पाकिस्तानी लिंक के झूठे आरोप लगाना, सब असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका है। सोनम वांगचुक पर NSA का इस्तेमाल इसी दमनकारी चक्र का हिस्सा है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा या राष्ट्र का गौरव?

सोनम वांगचुक, जो कभी प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की तारीफ करते थे, आज जेल की सलाखों के पीछे हैं। वे वही व्यक्ति हैं जिन्होंने आइस स्टूपा जैसे नवाचारों से दुनिया को जल संरक्षण सिखाया और भारतीय सेना के लिए हिमालयी इलाकों में विशेष शेल्टर बनाए। आज उन्हें ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ बता कर जेल भेजा गया है।

सितंबर 2025 की हिंसा के बाद उन्हें 26 सितंबर को गिरफ्तार कर जोधपुर शिफ्ट किया गया था, जहां एडवाइजरी बोर्ड की सुनवाई के बावजूद उन्हें रिहाई नहीं मिली। गीतांजलि ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि लद्दाख में अब डर का माहौल है।

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संवैधानिक मांगें और सरकार का यू-टर्न

लद्दाख की मांगें पूरी तरह जायज और संवैधानिक हैं। राज्य का दर्जा मिलने से लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आएगा और छठी अनुसूची से आदिवासी भूमि, संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा होगी। इसके साथ ही अलग लोकसभा सीटें और पब्लिक सर्विस कमीशन से स्थानीय युवाओं को नौकरियां मिलने का रास्ता साफ होगा।

बीजेपी ने 2020 हिल काउंसिल चुनाव में इन्हीं वादों पर जीत हासिल की थी, लेकिन अब यू-टर्न ले लिया है। केंद्र ने 84% ST रिजर्वेशन और स्थानीय भाषाओं जैसी कुछ रियायतें तो दीं, लेकिन मुख्य मांगें अभी भी ठंडे बस्ते में हैं।

NSA के तहत सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी

गीतांजलि अंगमो ने सही कहा कि जेल से लद्दाख चुप नहीं होगा। वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद LAB और KDA ने केंद्र से बातचीत का बहिष्कार कर दिया और न्यायिक जांच की मांग रखी। अक्टूबर 2025 में न्यायिक जांच की घोषणा के बाद वार्ता फिर शुरू हुई, लेकिन दिसंबर तक कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी।

युवाओं का गुस्सा अब एक ‘Gen Z रिवॉल्यूशन‘ का रूप ले रहा है, क्योंकि उनका भविष्य दांव पर है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने दावा किया है कि सोनम वांगचुक पर NSA वैध है, लेकिन उनके सार्वजनिक भाषण हमेशा गांधीवादी और शांतिपूर्ण रहे हैं।

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क्या चुनावी वादे केवल सत्ता की सीढ़ी हैं?

दिसंबर 2025 के अंत तक स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है। हालांकि कर्फ्यू हट चुके हैं, लेकिन लोगों के मन में गहरा डर और निराशा व्याप्त है। केंद्र ने निवास नियमों में कुछ बदलाव किए हैं, लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची पर चुप्पी बरकरार है।

गीतांजलि का बयान एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या चुनावी वादे सिर्फ सत्ता पाने के लिए होते हैं? यदि सरकार ने समय रहते संवाद किया होता, तो शायद चार लोगों की जान न जाती। इतिहास इस वादाखिलाफी को कभी माफ नहीं करेगा, क्योंकि यह लड़ाई लद्दाख की पहचान और अस्तित्व की लड़ाई है।

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