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अडानी-गुजरात वन डील और जंगलों के कॉर्पोरेट सरेंडर का सच

अडानी-गुजरात वन डील

अडानी-गुजरात वन डील की कड़वी सच्चाई अब RTI दस्तावेजों और हालिया जांच रिपोर्टों के जरिए देश के सामने आ चुकी है। गुजरात सरकार की अडाणी-समर्थक नीतियों ने मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) को न केवल करारा झटका दिया है, बल्कि यह भी उजागर कर दिया है कि कैसे पर्यावरण संरक्षण के लिए आरक्षित जंगलों को कॉर्पोरेट हितों के आगे पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया गया।

जुलाई 2024 में गुजरात वन विभाग द्वारा 13 भूमि पार्सल्स को GCP से हटाने की मांग ने इस विवाद को जन्म दिया। इन 13 पार्सल्स में से चार स्पष्ट रूप से अडाणी ग्रुप की ‘डिमांड’ पर थे, जो कुल मिलाकर 63.44 हेक्टेयर से अधिक की डिग्रेडेड फॉरेस्ट लैंड है। यह जमीन मुख्यतः कच्छ जिले में मुंद्रा पोर्ट और पावर प्लांट के आसपास स्थित है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2023 में जिस प्रोग्राम को इस विजन के साथ लॉन्च किया था कि कंपनियां और व्यक्ति पेड़ लगाकर ग्रीन क्रेडिट्स कमाएंगे, वह अब महज कागजी वादा बनकर रह गया है।

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मुंद्रा में अडाणी की ‘डिमांड’ और नियमों की अनदेखी

यह योजना अब कॉर्पोरेट्स के लिए जंगलों की ‘ऑन-डिमांड’ सप्लाई का जरिया बन गई है। ICFRE ने इस कदम को ‘विरोधाभासी’ बताया था, क्योंकि ये पार्सल्स पहले ही वनीकरण के लिए रजिस्टर्ड हो चुके थे। इसके बावजूद, केंद्र सरकार ने दिसंबर 2024 में गुजरात की संशोधित मांग को मंजूरी दे दी।

इस मंजूरी की प्रक्रिया में चालाकी यह रही कि आधिकारिक दस्तावेजों में अडानी का नाम लिए बिना सिर्फ ‘फंडर न मिलने’ का बहाना बनाकर 81% पार्सल्स को लिस्ट से हटा दिया गया।

यह अडानी-गुजरात वन डील पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम अवहेलना है, जो मोदी सरकार की ‘विकसित भारत’ की चमकदार तस्वीर के पीछे छिपी कड़वी हकीकत को सबके सामने लाती है। मुंद्रा जैसे क्षेत्रों में अडाणी के विस्तार के लिए नियमों को दरकिनार करना यह दर्शाता है कि सत्ता और पूंजी का गठजोड़ कितना गहरा है।

गुजरात से शुरू हुआ विचार और हिपोक्रिसी का चरम

ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम की जड़ें खुद गुजरात की धरती में हैं, जहां नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री काल के दौरान यह विचार पैदा हुआ था। मूल रूप से यह डिग्रेडेड फॉरेस्ट लैंड पर पेड़ लगवाकर क्रेडिट्स कमाने और ट्रेड करने की एक बाजार-आधारित योजना थी। लेकिन आज यह ‘हिपोक्रिसी’ का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है।

अब कंपनियां क्षतिपूर्ति वनीकरण (Compensatory Afforestation) की अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से बचने के लिए बस क्रेडिट्स खरीद सकती हैं। अडानी-गुजरात वन डील के मामले में ICFRE, जो इस प्रोग्राम का मुख्य प्रशासक है, ने जुलाई 2024 की मांग को सिरे से खारिज करते हुए ‘विरोधाभासी’ करार दिया था क्योंकि ये जमीनें पहले से GCP लैंड बैंक का हिस्सा थीं।

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नीतिगत स्पष्टता का अभाव और केंद्र की चुप्पी

सितंबर 2024 तक ICFRE इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार से पॉलिसी क्लैरिफिकेशन मांगता रहा। लेकिन दिसंबर आते-आते गुजरात सरकार ने अपना तर्क ही बदल दिया। नया तर्क दिया गया कि इन पार्सल्स पर कोई ‘फंडर’ नहीं मिला है, इसलिए इन्हें हटा दिया जाए।

RTI से प्राप्त आंतरिक दस्तावेज बताते हैं कि यह ‘फंडर न मिलने’ का बहाना असल में अडानी की स्पष्ट ‘डिमांड’ को छिपाने की एक सुनियोजित साजिश थी।

केंद्र सरकार ने इन आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए मंजूरी दी, जिससे मुंद्रा में अडाणी के प्रोजेक्ट्स के विस्तार का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया। यह स्थिति दिखाती है कि जब बात ‘मित्र’ कॉर्पोरेट्स की आती है, तो पर्यावरण मंत्रालय अपने नियमों में कितनी आसानी से लचीलापन ले आता है।

आदिवासी अधिकारों का हनन और ग्राम सभा की अनदेखी

दिसंबर 2024 की यह घटना राज्य और केंद्र की गहरी साठगांठ का क्लासिक प्रमाण पेश करती है। RTI के खुलासे बताते हैं कि गुजरात के अधिकारियों ने शुरू में अडानी का नाम लिया था, लेकिन बाद में ‘पॉलिसी इश्यू’ से बचने के लिए ‘बोली नहीं आई’ जैसा झूठ गढ़ा गया।

यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट का विनाश नहीं है; 2023 के फॉरेस्ट कंजर्वेशन अमेंडमेंट एक्ट ने वनवासियों और आदिवासियों की ग्राम सभा सहमति की शक्ति को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब बिना स्थानीय समुदायों की मर्जी के फॉरेस्ट डाइवर्जन किया जा सकता है।

गुजरात के डांग जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में अडानी-गुजरात वन डील जैसा ही पैटर्न दिख रहा है, जहां खेती की जमीनों को बिना सहमति प्लांटेशन के लिए छीना जा रहा है और FRA क्लेम्स को सालों से लटकाया गया है।

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1.73 लाख हेक्टेयर जंगलों का विनाश और विकास का सच

यह कांड 2014 से 2024 के बीच भारत में हुए 1.73 लाख हेक्टेयर से अधिक जंगलों के डाइवर्जन का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, माइनिंग, हाइड्रोपावर और इरिगेशन प्रोजेक्ट्स ने सबसे ज्यादा जंगलों को निगला है, जिसमें माइनिंग अकेले 40,000 हेक्टेयर के विनाश की जिम्मेदार है।

गुजरात में अडाणी के लिए यह डाइवर्जन ‘ऑफ-बजट क्लियरेंस’ और GCP के दुरुपयोग के जरिए किया जा रहा है, जो सिस्टम की पारदर्शिता को पूरी तरह कुचल देता है। दुनिया जहां क्लाइमेट चेंज से जूझ रही है, वहीं भारत में हसदेव अरण्य जैसे फेफड़ों को कोल माइंस और पोर्ट्स के लिए काटा जा रहा है।

ग्रीनवॉशिंग: वनीकरण के नाम पर सिर्फ छलावा

GCP अब ‘ग्रीनवॉशिंग’ का एक टूल बन चुका है। केंद्र ने इसके माध्यम से वनीकरण क्षतिपूर्ति के नियमों को इतना कमजोर कर दिया है कि अब क्रेडिट्स खरीदकर जंगलों की कटाई को वैध बनाया जा सकता है। 2024 की गाइडलाइंस में भी ट्रेडिंग और एक्सचेंज को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है।

फरवरी 2024 की कार्यप्रणाली (Methodology) केवल वृक्षारोपण पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि जैव विविधता (Biodiversity) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ के हसदेव में अडानी के कोल प्रोजेक्ट्स के लिए लाखों पेड़ों की कटाई और गुजरात में इसी पैटर्न का दोहराव यह साबित करता है कि नेट जीरो 2070 और ‘LiFE मूवमेंट’ जैसे वैश्विक वादे सिर्फ खोखले नारे बनकर रह गए हैं।

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भविष्य का संकट और पर्यावरणीय न्याय की हत्या

अंत में, गुजरात-अडानी-केंद्र की यह तिकड़ी भारत की पर्यावरण नीतियों की उस नंगी सच्चाई को उजागर करती है, जहां ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ ब्रांडिंग और चुनावी जुमलों के लिए किया जाता है। 1.73 लाख हेक्टेयर का डाइवर्जन, GCP का दुरुपयोग और आदिवासी सहमति का खात्मा मिलकर एक ऐसा खतरनाक कॉकटेल बना रहे हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए तबाही लेकर आएगा।

यदि अडाणी जैसी कंपनियां ‘डिमांड’ पर जंगल हासिल करती रहेंगी, तो पारिस्थितिकी तंत्र का बचना नामुमकिन है। यह समय कॉर्पोरेट-प्रेमी नीतियों पर कड़े सवाल उठाने का है, वरना ‘विकसित भारत’ का सपना प्रदूषित हवा और कंक्रीट के ढेरों के बीच हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।

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