बीजेपी-चीन गुप्त संवाद: क्या गलवन के बाद बदला राष्ट्रवाद?
भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों बीजेपी-चीन गुप्त संवाद की चर्चाएं जोरों पर हैं। यह एक ऐसा मोड़ है जो राष्ट्रवाद के पारंपरिक दावों और कूटनीतिक वास्तविकताओं के बीच की धुंधली रेखा को उजागर करता है। साल 2020 में गलवन घाटी में हुई उस हिंसक झड़प की यादें आज भी हर भारतीय के जहन में ताजा हैं, जिसमें हमारे 20 वीर सैनिकों ने अपनी शहादत दी थी।
उस समय चीन की विस्तारवादी नीति और भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ ने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया था। लेकिन अब, करीब छह साल बाद, सियासी हालात कुछ बदलते दिख रहे हैं। 12 जनवरी 2026 को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की उपमंत्री सन हयान के नेतृत्व में एक दल का दिल्ली आना और सत्ताधारी दल के मुख्यालय में बातचीत करना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
गलवन के जख्म और सीपीसी का भाजपा मुख्यालय दौरा
इतिहास गवाह है कि 2020 के बाद भारत और चीन के बीच संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। चीन ने न केवल घुसपैठ की, बल्कि सैकड़ों वर्ग किलोमीटर जमीन पर अपना दावा भी ठोका। बावजूद इसके, सीपीसी के छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह और विदेश विभाग प्रभारी विजय चौथाईवाले से लंबी मुलाकात की।
इस मुलाकात को ‘पार्टी-टू-पार्टी’ संवाद को मजबूत करने की कोशिश बताया जा रहा है। हालांकि, आलोचक इसे बीजेपी-चीन गुप्त संवाद के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि एक तरफ तो सीमा पर तनाव और अतिक्रमण की खबरें आती रहती हैं, और दूसरी तरफ दिल्ली के सत्ता केंद्रों में चीनी नेताओं का रेड कार्पेट स्वागत हो रहा है।
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केशव कुंज में संवाद: आरएसएस और कम्युनिस्टों की विचित्र मुलाकात
इस दौरे का सबसे हैरान करने वाला पहलू 13 जनवरी 2026 को सामने आया, जब यह दल आरएसएस के दिल्ली स्थित मुख्यालय ‘केशव कुंज’ पहुंचा। वहां संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के साथ चीनी दल की बातचीत हुई। जो संगठन घरेलू स्तर पर वामपंथ को ‘देशद्रोही’ विचारधारा मानता है और कम्युनिस्टों को भारत की संस्कृति के लिए खतरा बताता है, उसका एक सत्तावादी विदेशी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ बैठना किसी विरोधाभास से कम नहीं है।
संघ ने दावा किया कि उन्होंने चीनी दल को अपनी कार्यप्रणाली और विचारधारा समझाने में रुचि दिखाई, लेकिन जानकारों का मानना है कि इस तरह के संवाद राष्ट्रवाद की उस कठोर छवि को धूमिल करते हैं जिसे बीजेपी और आरएसएस ने सालों से संजोया है।
सीमा विवाद और व्यापार का जटिल गणित
भाजपा का कहना है कि इन बैठकों में सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और दुर्लभ खनिजों (Rare Minerals) पर चीन द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए। लेकिन जनता के मन में यह संशय है कि क्या ये चर्चाएं वाकई भारत के हित में कुछ ठोस परिणाम देंगी? चीन का पिछला रिकॉर्ड धोखे और विश्वासघात का रहा है।
गलवन के बाद भी उसने एलएसी पर सैन्य तैनाती कम नहीं की। ऐसे में बीजेपी-चीन गुप्त संवाद की पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या सरकार व्यापारिक लाभ के लिए उन बलिदानों को भूल रही है जो हमारे सैनिकों ने सीमा पर दिए थे? यह व्यापार बनाम राष्ट्रवाद की एक ऐसी जंग है जिसमें फिलहाल कूटनीति हावी दिख रही है।
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विपक्ष का प्रहार और ‘देशद्रोह’ के आरोप
कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सरकार की घेरेबंदी तेज कर दी है। मुख्य विपक्षी दल ने इन मुलाकातों को ‘देशद्रोह’ और ‘दोहरा मापदंड’ करार दिया है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जब चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोक रहा है और 2016 से 2018 के बीच 1000 से अधिक बार अतिक्रमण कर चुका है, तो ऐसे में उनसे शिष्टाचार भेंट करना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।
जनता की भावनाओं का हवाला देते हुए विपक्ष पूछ रहा है कि क्या सत्ता की भूख ने विचारधारा को पीछे छोड़ दिया है? यह आलोचना इसलिए भी गहरी हो जाती है क्योंकि बीजेपी अक्सर विपक्ष पर चीन के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाती रही है।
कजान मुलाकात के बाद क्या पिघली बर्फ?
माना जा रहा है कि इस संवाद की नींव 2024 में मोदी और शी जिनपिंग की कजान मुलाकात के दौरान पड़ी थी। वहां से शुरू हुआ ‘पिघलाव’ अब प्रतिनिधिमंडलों के दौरों तक पहुंच गया है। सरकार इसे भारत-चीन संबंधों में सुधार के संकेत के रूप में देख रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या चीन की विस्तारवादी फितरत वाकई बदल गई है?
वह आर्थिक रूप से भारत को दबाने के लिए संसाधनों पर नियंत्रण करना चाहता है। ऐसे में बीजेपी-चीन गुप्त संवाद के जरिए जो नजदीकी बढ़ाई जा रही है, वह किसी बड़े कूटनीतिक जुए से कम नहीं है। जनता को एक तरफ ‘बॉयकॉट चाइना’ का नारा दिया जाता है और दूसरी तरफ नेताओं की यह मेल-जोल वाली नीति एक राजनीतिक छलावा महसूस होती है।
लोकतंत्र और संप्रभुता पर मंडराते खतरे
सीपीसी एक ऐसी पार्टी है जो किसी भी तरह की असहमति को कुचलने के लिए जानी जाती है। वहीं आरएसएस खुद को भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का रक्षक कहता है। इन दोनों का मिलना न केवल वैचारिक असंगति है, बल्कि यह भारत की विदेश नीति के संतुलन को भी बिगाड़ सकता है।
एक ओर भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है, वहीं चीन के साथ इस तरह की नजदीकी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। क्या यह संवाद वास्तव में शांति लाएगा या यह किसी गुप्त समझौते की ओर इशारा है जो भविष्य में भारत की संप्रभुता को चुनौती दे सकता है?
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जनता का विश्वास और राजनीतिक साख
अंततः, राजनीति में संवाद जरूरी है, लेकिन वह राष्ट्र की कीमत पर नहीं होना चाहिए। गलवन में शहीद हुए सैनिकों का खून अभी सूखा नहीं है, और सीमा पर तनाव बरकरार है। भाजपा और आरएसएस को अपनी वैचारिक स्थिरता और जनता के विश्वास के प्रति जवाबदेह होना होगा।
अगर यह संवाद केवल व्यापारिक हितों के लिए है, तो यह 140 करोड़ भारतीयों के साथ विश्वासघात जैसा होगा। इतिहास साक्षी है कि चीन पर आंख मूंदकर भरोसा करना बड़ी भूल साबित हुई है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है, बल्कि राष्ट्रवादी दावों की विश्वसनीयता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।



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