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बीजेपी-सीपीसी ऐतिहासिक बैठक: भारत-चीन संबंधों में सुधार का नया अध्याय

बीजेपी-सीपीसी ऐतिहासिक बैठक

भारत और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों से जारी सीमा तनाव के बीच एक बड़ी राजनीतिक सफलता देखने को मिली है। सोमवार, 12 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के मुख्यालय में बीजेपी-सीपीसी ऐतिहासिक बैठक संपन्न हुई।

यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 में गलवान घाटी में हुए हिंसक संघर्ष के बाद यह दोनों सत्तारूढ़ पार्टियों के बीच पहला औपचारिक और सीधा संवाद है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का एक उच्च स्तरीय छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल, जिसका नेतृत्व उप-मंत्री सुन हैयान कर रही थीं, ने बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने और भविष्य की रूपरेखा तैयार करने पर गहन मंथन किया।

गलवान संघर्ष के बाद पहली पार्टी-स्तर की वार्ता

2020 की गर्मियों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुई झड़पों के बाद से भारत और चीन के रिश्ते लगभग चार साल तक पूरी तरह जमे रहे थे। हालांकि, 21 अक्टूबर 2024 को सीमा पर टकराव वाले बिंदुओं से सेना पीछे हटाने के समझौते ने एक नई शुरुआत की नींव रखी।

इसी कड़ी में बीजेपी-सीपीसी ऐतिहासिक बैठक को संबंधों की एक बड़ी पुनर्व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही सुन हैयान, जो CPC के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क विभाग (ILD) की उपाध्यक्ष हैं, इससे पहले सिंगापुर में राजदूत के रूप में भी सेवाएं दे चुकी हैं। इस बैठक में भारत में चीनी राजदूत जू फेइहोंग भी शामिल हुए, जो इस संवाद की गंभीरता को दर्शाता है।

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बीजेपी मुख्यालय में संवाद और भविष्य की रणनीति

बीजेपी मुख्यालय में हुए इस संवाद के दौरान पार्टी महासचिव अरुण सिंह और विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख विजय चौथाईवाले ने चीनी प्रतिनिधियों का स्वागत किया। बैठक का मुख्य एजेंडा दोनों संगठनों के बीच संचार के सेतु को फिर से स्थापित करना और अंतर-पार्टी संवाद को आगे बढ़ाना था।

अरुण सिंह ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी कि चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु बीजेपी और सीपीसी के बीच बातचीत और मेलजोल को बढ़ाने के तरीकों पर था। यह बीजेपी-सीपीसी ऐतिहासिक बैठक ऐसे समय में हुई है जब दोनों देश विश्वास बहाली के कई उपायों (CBMs) को धरातल पर उतार रहे हैं।

आरएसएस नेतृत्व से भी मिलेगा चीनी प्रतिनिधिमंडल

इस दौरे का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बीजेपी नेताओं से मुलाकात के बाद चीनी प्रतिनिधिमंडल मंगलवार, 13 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ सदस्यों से मुलाकात करेगा। पहले कुछ संशय थे, लेकिन अब यह स्पष्ट है कि चीनी पक्ष भारत के वैचारिक आधार को समझने और उससे संवाद करने का इच्छुक है।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी अपडेट किया गया कि पहले तय कार्यक्रम के अनुसार कुछ बदलाव हो सकते हैं, लेकिन आरएसएस के साथ होने वाली यह संभावित मुलाकात भारत-चीन संबंधों के एक नए अध्याय की ओर इशारा करती है, जहाँ केवल सरकार ही नहीं बल्कि संगठन स्तर पर भी समझ विकसित करने की कोशिश हो रही है।

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विश्वास बहाली के उपाय: सीधी उड़ानें और कैलाश मानसरोवर यात्रा

वर्ष 2024 के समझौते के बाद से दोनों देशों ने कई सकारात्मक कदम उठाए हैं। संबंधों में सुधार का सबसे बड़ा प्रतीक 2025 की गर्मियों में कैलाश मानसरोवर यात्रा का फिर से शुरू होना रहा, जिसमें 750 भारतीय तीर्थयात्रियों को पवित्र स्थल के दर्शन की अनुमति मिली।

इसके अलावा, दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें फिर से बहाल कर दी गई हैं और भारत ने चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक व व्यावसायिक वीजा जारी करना फिर से शुरू किया है। इसके बदले में बीजिंग ने भारतीय व्यवसायों को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements) के लिए निर्यात लाइसेंस देना शुरू किया है, जो व्यापारिक संबंधों में आई कड़वाहट को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

पीएम मोदी की कूटनीति और वैश्विक मंचों पर सक्रियता

भारत-चीन संबंधों की इस नई पटकथा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रिय भागीदारी रही है। पिछले साल पीएम मोदी एससीओ (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए चीन के तियानजिन शहर गए थे। उन्होंने 2024 और 2025 के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दो औपचारिक बैठकें की हैं। यह बीजेपी-सीपीसी ऐतिहासिक बैठक उसी कूटनीतिक निरंतरता का हिस्सा है।

रोचक बात यह है कि चीन के साथ यह नरमी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंध तनावपूर्ण हैं और भारत डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ का सामना कर रहा है। आने वाले महीनों में नई दिल्ली ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाली है, जहाँ रूस, चीन और ब्राजील सहित कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष जुटेंगे।

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सीमा विवाद और अनसुलझे मुद्दों पर चर्चा

यद्यपि पार्टी स्तर पर बातचीत शुरू हो गई है, लेकिन सीमा विवाद की जटिलताएं अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। 2024 के अंत से अब तक स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव (SR) स्तर की दो बैठकें हो चुकी हैं और अगली बैठक चीन द्वारा आयोजित की जानी है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भी पिछले अगस्त में दिल्ली का दौरा किया था।

कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि राजनीतिक संचार मजबूत होने से सीमा पर शेष बचे मुद्दों को सुलझाने में मदद मिलेगी। भारत और चीन की साझा विरासत पर भी जोर दिया जा रहा है, जैसे हाल ही में सूज़ौ के टाइगर हिल पैगोडा में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी के दौरान देखा गया।

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घरेलू राजनीति: आरोप-प्रत्यारोप और बदलता परिदृश्य

चीनी प्रतिनिधिमंडल की यह यात्रा भारत की घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बनी हुई है। अतीत में बीजेपी और कांग्रेस ने चीन के साथ संबंधों को लेकर एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं। जहाँ बीजेपी ने कांग्रेस पर 2018 के एमओयू (MOU) को लेकर सवाल उठाए, वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर चीन के सामने नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया।

लेकिन इस नई पार्टी-स्तर की बातचीत ने यह संकेत दिया है कि राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीतिक संवाद के रास्ते खोलना अनिवार्य है। यह संवाद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सभ्यतागत जुड़ाव को भी दर्शाता है, जिससे आने वाले समय में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़े बदलाव की उम्मीद है।

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