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बॉम्बे हाईकोर्ट को नरसंहार रोकने की सार्वभौमिक ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए

बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 25 जुलाई को एक चौंकाने वाला फैसला सुनाया। CPI(M) की गाजा रैली याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने याचिकाकर्ताओं से “देशभक्त बनने” को कहा। साथ ही “भारतीय समस्याओं” पर ध्यान देने का निर्देश दिया। यह टिप्पणी गाजा में हो रहे इजरायली नरसंहार के संदर्भ में चिंताजनक है। विशेषकर तब, जब जुलाई 2025 में अकेले 48 फिलिस्तीनी भूख से मर चुके हैं।

गाजा संकट: तथ्यों पर एक नज़र

गाजा में मानवीय संकट भयावह स्तर पर पहुँच गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 95% आबादी भोजन की कमी से जूझ रही है। अस्पतालों में बच्चे कुपोषण से दम तोड़ रहे हैं। इजरायल ने सीमा पार से भोजन व दवा आपूर्ति अवरुद्ध कर रखी है। WHO की रिपोर्ट बताती है कि 10 में से 9 बच्चे प्रतिदिन भोजन नहीं जुटा पाते।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने इसे “नरसंहार की संभावना” बताया है। तीन महीने में 50,000 से अधिक फिलिस्तीनियों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। इनमें 70% महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। इजरायली सेना ने 85% आवासीय इमारतें ध्वस्त कर दी हैं। जल संकट इतना गंभीर है कि लोग पीने के लिए नाली का पानी उबाल रहे हैं।

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बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के पीछे तीन बड़े कारण

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह रुख अचानक नहीं है। यह भारत में बदलते सार्वजनिक प्रवचन का प्रतिबिंब है। पिछले दशक में तीन प्रमुख कारकों ने इसे आकार दिया है। विदेश नीति का सुरक्षाकरण पहला कारण है। सार्वजनिक सुरक्षा का सांप्रदायिकरण दूसरा कारक बना। नागरिक समाज का विघटन तीसरा प्रमुख बिंदु है।

कारण 1: विदेश नीति का सुरक्षाकरण

आज विदेश नीति “राज्य का विशेषाधिकार” बन गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी यही रवैया दिखाया। अदालत ने कहा कि CPI(M) की स्थिति केंद्र सरकार से अलग है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह भारत के “विदेशी हितों” को नुकसान पहुँचा सकता है। यह दृष्टिकोण लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। विदेश नीति पर बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।

सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसा ही कदम उठाया था। इजरायल को हथियार निर्यात रोकने की याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने विदेश नीति में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। यह न्यायिक पलायनवाद चिंता का विषय है। जब नरसंहार जैसे मुद्दे उठें, तो न्यायपालिका को आगे आना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय कानून “जस कोजेंस” सिद्धांत स्पष्ट करता है। नरसंहार की रोकथाम हर राष्ट्र का कर्तव्य है। दूरी या राष्ट्रीय हित इस जिम्मेदारी को कम नहीं करते। स्पेन और जर्मनी जैसे देश इसका उदाहरण हैं। उन्होंने अन्य देशों में हुए युद्ध अपराधों पर मुकदमे चलाए हैं। भारत की न्यायपालिका को भी यह दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

कारण 2: सार्वजनिक सुरक्षा का सांप्रदायिकरण

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले का दूसरा पहलू सांप्रदायिक पूर्वाग्रह है। पिछले सप्ताह ही इसी अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाया। 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के सभी 12 मुस्लिम आरोपी बरी कर दिए गए। अदालत ने पुलिस यातना और कमजोर सबूतों की निंदा की। यह फैसला मीडिया के पूर्वाग्रह को उजागर करता है।

ऐसे मामले कोई अपवाद नहीं हैं। 2006 मालेगांव ब्लास्ट में भी 8 मुस्लिम आरोपी बरी हुए। 2002 अक्षरधाम मामले में 6 आरोपी छूटे। पत्रकार जोसी जोसेफ अपनी किताब “द साइलेंट कूप” में बताते हैं। मीडिया अक्सर बिना सत्यापन के खुफिया जानकारी प्रकाशित करता है। खासकर जब आरोपी मुस्लिम हों।

इसके विपरीत, हिंदुत्व समूहों से जुड़े आतंक मामलों का अलग ही ट्रीटमेंट है। मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर संसद सदस्य बन गईं। उन्हें चिकित्सीय आधार पर जेल से रिहाई मिली। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट दिखता है। 9/11 के बाद “आतंकवाद के खिलाफ युद्ध” ने इस पूर्वाग्रह को बढ़ाया।

इसी पूर्वाग्रह ने फिलिस्तीन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। मीडिया ने फिलिस्तीनी प्रतिरोध को “आतंकवाद” बताया। उनके औपनिवेशिक संघर्ष को नजरअंदाज किया गया। गाजा की तबाही को बड़े पैमाने पर कवर नहीं किया गया। इस्लामोफोबिया ने सहानुभूति को और कम कर दिया।

कारण 3: नागरिक समाज का विघटन

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला तीसरे बड़े रुझान को दर्शाता है। यह है नागरिक समाज पर प्रहार। पिछले दस वर्षों में कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया। FCRA के तहत विदेशी फंडिंग रोकी गई। “आंदोलनजीवी” और “शहरी नक्सल” जैसे लेबल लगाए गए। यह शब्दावली सामाजिक सक्रियता को बदनाम करती है।

इस माहौल ने सहानुभूति को “कमजोरी” बना दिया है। रोहिंग्या शरणार्थियों के प्रति उदासीनता इसी का उदाहरण है। बंगाली मुस्लिम प्रवासियों को निशाना बनाया जा रहा है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज कर दी। अंडमान में रोहिंग्या परिवारों को छोड़े जाने की घटना को “काल्पनिक” बताया गया। यह UN की रिपोर्टों के विपरीत था।

गाजा के बच्चों की पीड़ा पर भारतीय मीडिया की प्रतिक्रिया उदासीन रही। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के विपरीत, यहाँ मानवीय पहलू कम दिखा। इसने सार्वजनिक संवाद को नुकसान पहुँचाया। न्यायपालिका भी इस उदासीनता से अछूती नहीं रही।

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नरसंहार रोकना क्यों है सबकी जिम्मेदारी?

बॉम्बे हाईकोर्ट को अंतरराष्ट्रीय कानून समझना चाहिए। नरसंहार रोकना “जस कोजेंस” मानदंड है। यह सभी राष्ट्रों पर लागू होता है। कोई भी संधि इस कर्तव्य को रद्द नहीं कर सकती। दूरी या राष्ट्रीय सीमाएँ बाधा नहीं हैं। कनाडा और बेल्जियम ने इस सिद्धांत पर कार्रवाई की है।

भारत में भी प्रासंगिक कानून मौजूद हैं। धारा 166A IPC मानवता के खिलाफ अपराधों से निपटती है। न्यायपालिका को इसका उपयोग करना चाहिए। गाजा में जारी हिंसा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालतों को मानवाधिकारों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखना होगा।

क्यों जरूरी है विरोध का अधिकार?

बॉम्बे हाईकोर्ट का तर्क है कि भारत में समस्याएँ पहले हल होनी चाहिए। यह दृष्टिकोण भ्रामक है। नागरिक एक साथ कई मुद्दों पर चिंता जता सकते हैं। गाजा के प्रति एकजुटता “अपदेशभक्ति” नहीं है। यह मानवीय प्रतिक्रिया है।

भारत में बाढ़, रेल दुर्घटनाएँ और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ हैं। इन पर विरोध जारी है। परंतु लोकतंत्र में वैश्विक मुद्दों पर बोलना भी जरूरी है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अहम हिस्सा है।

बॉम्बे हाईकोर्ट को याद रखना चाहिए: विरोध अधिकार संविधान की देन है। रैली की अनुमति न देना इस अधिकार का हनन है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए असहमति जरूरी है। न्यायपालिका को इसे बचाने के लिए आगे आना होगा।

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निष्कर्ष: न्यायपालिका की ऐतिहासिक जिम्मेदारी

गाजा में हर घंटे 10 बच्चे अपने अंग खो रहे हैं। इजरायली बमबारी ने 22 अस्पतालों को नष्ट कर दिया है। ऐसे में चुप्पी साधना नैतिक विफलता है। बॉम्बे हाईकोर्ट को मानवाधिकारों का संरक्षक बनना चाहिए।

नरसंहार की रोकथाम किसी एक देश का काम नहीं है। यह सभ्यता का साझा दायित्व है। न्यायपालिका को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठना होगा। गांधी और मंडेला के देश को यही शोभा देता है।

बॉम्बे हाईकोर्ट को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने की आजादी देता है। अनुच्छेद 51(c) अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन का निर्देश देता है। गाजा के लिए आवाज उठाना इन्हीं सिद्धांतों का विस्तार है।

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