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“चुनावी चंदा घोटाला 2.0″लेक्टोरल ट्रस्ट से भाजपा को मिला 82 प्रतिशत चंदा,

चुनावी चंदा घोटाला 2.0

चुनावी चंदा घोटाला 2.0 सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया था, जिससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ने और कॉरपोरेट प्रभाव कम होने की उम्मीद जगी थी।

लेकिन हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि चुनावी चंदा घोटाला 2.0 की शुरुआत हो चुकी है, जहां इलेक्टोरल ट्रस्टों के जरिए राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा तीन गुना से ज्यादा बढ़कर 3,811 करोड़ रुपये पहुंच गया है।

फंडिंग में भारी असमानता: भाजपा की झोली भरी, विपक्ष के पास बचा ‘चिल्लर’

इस पूरी व्यवस्था में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुल 3,811 करोड़ रुपये में से 82 प्रतिशत यानी करीब 3,143 करोड़ रुपये अकेले भाजपा के खाते में गए हैं। यह डेटा भारतीय लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर सवालिया निशान लगाता है। दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को महज 299 करोड़ रुपये मिले, जो कुल चंदे का 8 प्रतिशत भी नहीं है।

बाकी सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियां जैसे टीएमसी, आप (AAP), टीडीपी और वाईएसआरसीपी आदि मिलकर सिर्फ 400 करोड़ रुपये पर सिमट गईं।

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लोकतंत्र पर असर क्यों गंभीर

प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट इस पूरे खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है। इस अकेले ट्रस्ट ने 2,668 करोड़ रुपये जुटाए और बांटे, जिसमें से 2,181 करोड़ रुपये सीधे भाजपा को थमा दिए गए। इसके प्रमुख डोनर्स की सूची देखें तो इसमें एलएंडटी की लिंक्ड फर्म (500 करोड़), मेघा इंजीनियरिंग (175 करोड़), जिंदल ग्रुप, भारती एयरटेल, अशोक लेलैंड और डीएलएफ जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि ये वही कंपनियां हैं जो इलेक्टोरल बॉन्ड्स के समय भी भाजपा को भरपूर चंदा देती थीं। ट्रस्टों की यह व्यवस्था ऊपर से पारदर्शी दिखती है, क्योंकि डोनर के नाम सार्वजनिक होते हैं, लेकिन असल में किस पार्टी को कितना पैसा बांटना है, इसका पूरा फैसला ट्रस्ट का होता है। प्रूडेंट जैसे ट्रस्टों का झुकाव जिस तरह सत्ता की तरफ साफ दिख रहा है, वह चुनावी चंदा घोटाला 2.0 की गहराई को दर्शाता है।

टाटा और महिंद्रा जैसे बड़े समूहों का झुकाव भी सत्ता की ओर

सिर्फ प्रूडेंट ही नहीं, अन्य ट्रस्टों का व्यवहार भी सत्ता के प्रति अत्यधिक उदार रहा है। टाटा ग्रुप से जुड़े प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने कुल 915 करोड़ रुपये जुटाए और उनमें से 758 करोड़ रुपये भाजपा की झोली में डाल दिए। इसी तरह, महिंद्रा ग्रुप से जुड़े न्यू डेमोक्रेटिक ट्रस्ट ने 160 करोड़ रुपये में से 150 करोड़ रुपये भाजपा को दिए।

ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि बड़े कॉरपोरेट घराने अपनी फंडिंग का बड़ा हिस्सा सिर्फ सत्ताधारी दल पर ही केंद्रित रख रहे हैं। छोटे ट्रस्ट जैसे ‘हार्मनी’ और ‘ट्रायम्फ’ भी इसी राह पर चलते हुए अपना ज्यादातर पैसा भाजपा को ही दे रहे हैं।

यह एक ऐसी व्यवस्था बन गई है जहां विपक्ष की फंडिंग के रास्ते धीरे-धीरे सुखाए जा रहे हैं। कांग्रेस, जिसे बॉन्ड्स के समय 828 करोड़ मिलते थे, अब ट्रस्टों से केवल 299 करोड़ पर आ टिकी है।

चुनावी बॉन्ड योजना पर फिर सवाल

चंदा देने वाली कंपनियों की सूची वही पुरानी और संदिग्ध है। मेघा इंजीनियरिंग, जो इलेक्टोरल बॉन्ड्स में 966 करोड़ रुपये के साथ दूसरी सबसे बड़ी डोनर थी, अब ट्रस्ट के जरिए 175 करोड़ दे रही है। इतना ही नहीं, इसके एमडी ने व्यक्तिगत रूप से 150 करोड़ रुपये अलग से दिए हैं। एलएंडटी (500 करोड़), टाटा ग्रुप (कुल 915 करोड़), जिंदल ग्रुप, भारती एयरटेल, अशोक लेलैंड और डीएलएफ जैसे नामों की प्राथमिकता हमेशा से भाजपा ही रही है।

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सिर्फ सात बड़े कॉरपोरेट घरानों (टाटा, जिंदल, एलएंडटी, मेघा, अशोक लेलैंड, डीएलएफ, महिंद्रा) ने ट्रस्टों में कुल 2,107 करोड़ रुपये डाले, जो पूरी फंडिंग का 55 प्रतिशत है। चुनावी चंदा घोटाला 2.0 यह प्रमाणित करता है कि बॉन्ड खत्म होने के बावजूद कॉरपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गया है।

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क्विड प्रो क्वो: क्या सरकारी नीतियों और ठेकों के बदले मिल रहा है चंदा?

यह मामला सिर्फ चंदे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘क्विड प्रो क्वो‘ (बदले में कुछ देना) का एक स्पष्ट उदाहरण जान पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, टाटा ग्रुप ने सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स के लिए 44,000 करोड़ रुपये की सरकारी सब्सिडी मिलने के ठीक बाद इतना बड़ा चंदा दिया।

मेघा इंजीनियरिंग को लगातार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट्स मिलते रहे हैं, जिनमें तेलंगाना का कालेश्वरम प्रोजेक्ट और मुंबई टनल जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। इसी तरह एलएंडटी को बड़े प्रोजेक्ट्स और महिंद्रा को डिफेंस डील्स मिलना क्या महज इत्तेफाक है?

सत्ता में बैठी पार्टी को ही 82 प्रतिशत चंदा मिलना साफ दिखाता है कि कॉरपोरेट्स सत्ता के साथ खड़े हैं और बदले में नीतियां उनके हित में बनाई जा रही हैं। यह क्रोनी कैपिटलिज्म का सबसे ज्वलंत और जीता-जागता उदाहरण है।

पारदर्शिता के नाम पर लोकतंत्र का अपहरण और विपक्ष की घेराबंदी

इलेक्टोरल ट्रस्टों की यह व्यवस्था बॉन्ड्स से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है। अब चंदा पारदर्शिता के नाम पर और ज्यादा बढ़ गया है, लेकिन इसका असल नियंत्रण अभी भी उन्हीं कॉरपोरेट हाथों में है। ट्रस्ट जनता को यह तो बताते हैं कि पैसा किसने दिया, लेकिन किस आधार पर 15 पार्टियों में से 82 प्रतिशत पैसा अकेले एक ही दल को दिया गया, इसका कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है।

यह व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र को धीरे-धीरे ‘कॉरपोरेटक्रेसी’ में बदलने की एक गहरी साजिश लगती है। जहां सत्ता पक्ष को और अधिक वित्तीय ताकत देकर मजबूत बनाया जा रहा है, वहीं विपक्ष को संसाधनों के अभाव में कमजोर किया जा रहा है। यह लोकतांत्रिक संतुलन के लिए एक बड़ा खतरा है।

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विपक्ष का हमला और सियासी बयानबाज़ी

चुनाव आयोग के ये आंकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ एक योजना (बॉन्ड्स) को रद्द करने तक सीमित रह गया, लेकिन राजनीतिक फंडिंग का पूरा ढांचा आज भी कॉरपोरेट के चंगुल में है।

यदि जल्द ही इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए—जैसे कि चंदे पर एक निश्चित कैप (सीमा) लगाना, डोनर से पार्टी का सीधा लिंक सुनिश्चित करना, पब्लिक फंडिंग की व्यवस्था करना और ट्रस्टों की कार्यप्रणाली पर सख्त निगरानी रखना—तो भारतीय लोकतंत्र बड़े कारोबारियों की कठपुतली बनकर रह जाएगा।

यह कोई साधारण वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का खुला अपहरण है, जो चुनावी समर में सभी दलों को मिलने वाले समान अवसरों को खत्म कर रहा है।

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