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दिल्ली दंगा: उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज, 5 को SC से मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज की, जबकि गुलफिशा और 4 अन्य को बेल दी। जानिए कोर्ट ने बड़ी साजिश मामले में क्या कहा।

उमर खालिद की जमानत याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा और निर्णायक फैसला सामने आया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ (बिगर कॉन्सपिरेसी) मामले में अपना फैसला सुनाते हुए जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों से इन दोनों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 के तहत ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) मामला बनता है। बेंच ने यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर के उस आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिकाओं पर दिया, जिसमें आरोपियों को राहत देने से मना किया गया था।

बड़ी साजिश में आरोपियों की भूमिका और कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि वह इस मामले में किसी ‘सामूहिक दृष्टिकोण’ (Collective Approach) के बजाय ‘व्यक्तिगत विश्लेषण’ पर भरोसा कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग और अधिक गंभीर है। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री से संकेत मिलता है कि ये दोनों न केवल दंगों की योजना बनाने में शामिल थे, बल्कि लामबंदी और रणनीतिक दिशा देने के स्तर पर भी इनकी सक्रिय संलिप्तता थी। कोर्ट ने माना कि उनकी भूमिका महज छिटपुट या स्थानीय कृत्यों तक सीमित नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी।

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गुलफिशा फातिमा और अन्य 5 आरोपियों को मिली राहत

इसी मामले में एक बड़ा मोड़ तब आया जब शीर्ष अदालत ने पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी। इसमें गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। गुलफिशा के संबंध में अदालत ने टिप्पणी की कि हालांकि उन पर स्थानीय महिलाओं को इकट्ठा करने और लॉजिस्टिक्स समन्वय का आरोप है, लेकिन सबूत यह नहीं दिखाते कि उनके पास स्वतंत्र कमान या रणनीतिक नियंत्रण था। कोर्ट ने कहा कि चूंकि वे वरिष्ठों के निर्देशों पर काम कर रही थीं और जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है, इसलिए उन्हें और अधिक समय तक जेल में रखना उचित नहीं होगा। इन सभी को 12 कड़ी शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया गया है।

UAPA मामलों में ट्रायल में देरी ‘ट्रम्प कार्ड’ नहीं

जस्टिस अरविंद कुमार ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि UAPA के तहत चल रहे मुकदमों में केवल ‘ट्रायल में देरी’ को जमानत पाने का स्वचालित आधार या ‘ट्रम्प कार्ड’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ‘के.ए. नजीब’ मामले के संदर्भ को स्पष्ट करते हुए कहा कि देरी होने पर न्यायिक जांच और गहन हो जाती है, लेकिन यह वैधानिक प्रतिबंधों (धारा 43D(5)) को पूरी तरह खत्म नहीं करती। अदालत ने जोर दिया कि जब मामला देश की संप्रभुता और अखंडता से जुड़ा हो, तो समय बीतने मात्र से कानून के कठोर प्रावधान बेअसर नहीं हो सकते।

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व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार की गारंटी देता है। बेंच ने कहा कि प्री-ट्रायल हिरासत को सजा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालांकि, उमर खालिद की जमानत याचिका के संदर्भ में कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ लगे आरोपों की प्रकृति इतनी गंभीर है कि संवैधानिक सुरक्षा उपायों और वैधानिक सीमाओं के बीच एक आनुपातिक संतुलन बनाना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपियों की लगातार हिरासत ने फिलहाल उस सीमा को पार नहीं किया है जहां इसे संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य माना जाए।

दिल्ली पुलिस के गंभीर आरोप और ‘रिजीम चेंज’ की थ्योरी

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एएसजी एस.वी. राजू ने दलील दी कि ये दंगे अचानक नहीं हुए थे, बल्कि एक ‘गहरी और पूर्व-नियोजित’ साजिश का परिणाम थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने शांतिपूर्ण विरोध की आड़ में ‘रिजीम चेंज ऑपरेशन’ (सत्ता परिवर्तन अभियान) चलाने और भारत सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी। हलफनामे में दावा किया गया कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने जेएनयू के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया और सांप्रदायिक व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर छात्रों को उकसाया। पुलिस के अनुसार, ‘चक्का-जाम’ का उद्देश्य आवश्यक सेवाओं को बाधित करना और हिंसा भड़काना था।

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खालिद और इमाम के पास अब क्या है विकल्प?

जमानत याचिका खारिज करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को एक छोटी राहत भी दी है। कोर्ट ने कहा कि वे संरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) की जांच पूरी होने के बाद या आज के फैसले से एक साल की अवधि बीतने पर दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह गवाहों की जांच की प्रक्रिया में तेजी लाए ताकि मुकदमा अनावश्यक रूप से लंबा न खिंचे। उमर खालिद की जमानत याचिका पर विचार करते समय कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल जमानत के उद्देश्य से हैं और मुकदमे के गुण-दोष पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा।

असम के मुख्यमंत्री और राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का राजनीतिक असर भी देखने को मिला। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सदस्यों को राहत न मिलना राष्ट्र की एकता के लिए जरूरी है। उन्होंने शरजील इमाम के उस पुराने भाषण का भी जिक्र किया जिसमें पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात कही गई थी। दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोपियों का बचाव करते हुए तर्क दिया था कि 5 साल से अधिक की हिरासत बिना किसी दोषसिद्धि के मौलिक अधिकारों का हनन है।

आज के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि उमर खालिद की जमानत याचिका पर फिलहाल कानूनी मुहर नहीं लग पाई है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद और देश के खिलाफ साजिश जैसे गंभीर मामलों में न्यायिक जांच ‘आरोपी-विशिष्ट’ होती है और हर किसी को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता। अब सभी की निगाहें ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर टिकी हैं।

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