डिजिटल अरेस्ट किल स्विच और बैंक फ्रॉड इंश्योरेंस से रुकेगा साइबर अपराध
भारत में तेजी से बढ़ते ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर घोटालों के खिलाफ केंद्र सरकार एक बड़ा हथियार तैयार कर रही है। गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा गठित एक उच्च-स्तरीय अंतर-विभागीय समिति एक क्रांतिकारी “किल स्विच” फीचर को बैंकिंग सिस्टम में एकीकृत करने की जांच कर रही है।
डिजिटल अरेस्ट किल स्विच का मुख्य उद्देश्य यूज़र्स को वह शक्ति देना है, जिससे वे किसी भी प्रकार के साइबर फ्रॉड का आभास होते ही अपने सभी फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन को एक क्लिक में तुरंत रोक सकें। इस प्रस्ताव पर पिछले साल दिसंबर के आखिर में गठित समिति गंभीरता से चर्चा कर रही है, जो विशेष रूप से ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए बनाई गई है।
बैंकिंग ऐप्स में मिलेगा एक-बटन फ्रीज का विकल्प
इस नई अवधारणा के तहत, यूपीआई (UPI) और बैंकिंग ऐप्स में एक सिंगल-बटन विकल्प को जोड़ने का प्रस्ताव है। यह इमरजेंसी कंट्रोल ग्राहक को जैसे ही फ्रॉड का एहसास होगा, वैसे ही सभी आउटगोइंग ट्रांजैक्शन को फ्रीज करने की अनुमति देगा।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय द्वारा गठित यह समिति इस बात की भी गहन जांच कर रही है कि क्या धोखाधड़ी वाले लेनदेन को शुरुआती स्तर पर ही फ्लैग किया जा सकता है। इससे ठगी गई रकम को कई ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) में तेजी से फैलने से रोकना संभव हो पाएगा, जो वर्तमान में जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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धोखाधड़ी के नुकसान की भरपाई के लिए इंश्योरेंस फ्रेमवर्क
किल स्विच के समानांतर, सरकार बैंकिंग सिस्टम के भीतर धोखाधड़ी से संबंधित नुकसान को कवर करने के लिए एक बीमा-आधारित (Insurance-based) फ्रेमवर्क की संभावनाओं को भी तलाश रही है। डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते ग्राफ को देखते हुए बैंकों पर जोखिम-प्रबंधन दृष्टिकोण को आधुनिक बनाने का दबाव है।
अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल अरेस्ट किल स्विच जैसे तकनीकी समाधानों के साथ-साथ एक मजबूत बीमा सुरक्षा चक्र होने से ग्राहकों का विश्वास बढ़ेगा और सिस्टम की स्थिरता बनी रहेगी। इस दिशा में आरबीआई के अधिकारियों ने भी स्टेकहोल्डर्स के साथ बातचीत शुरू कर दी है।
क्या है डिजिटल अरेस्ट और कैसे काम करता है यह जाल
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में अपराधी मनोवैज्ञानिक दबाव का सहारा लेते हैं। इसमें स्कैमर्स वीडियो कॉल पर पुलिस, सीबीआई या अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के फर्जी अधिकारी बनकर पीड़ितों को डराते हैं। वे दावा करते हैं कि पीड़ित पर गंभीर अपराधों के लिए जांच चल रही है। डराने के लिए नकली गिरफ्तारी वारंट, लीक हुई व्यक्तिगत जानकारी और जाली आईडी कार्ड का उपयोग किया जाता है। पीड़ितों को घंटों या दिनों तक वीडियो कॉल पर बंधक बनाकर रखा जाता है और डर के साये में उनसे बड़ी रकम ट्रांसफर करवा ली जाती है। डिजिटल अरेस्ट किल स्विच ऐसे नाजुक समय में एक ढाल का काम करेगा।
सुप्रीम कोर्ट का संज्ञान और उच्च-स्तरीय समिति का गठन
देशभर में इन घोटालों से होने वाला नुकसान करीब 3,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह समस्या इतनी गंभीर हो गई कि पिछले अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले का संज्ञान लिया।
इसी के मद्देनजर दिसंबर में एक इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी बनाई गई, जिसमें MeitY, DoT, DFS, RBI, CBI, NIA, दिल्ली पुलिस और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
इस पैनल की अध्यक्षता MHA के स्पेशल सेक्रेटरी (इंटरनल सिक्योरिटी) कर रहे हैं और I4C के CEO इसके मेंबर-सेक्रेटरी हैं। समिति ने अब तक कई बैठकें की हैं और सुप्रीम कोर्ट को हाल ही में एक स्टेटस रिपोर्ट भी सौंपी है।
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तकनीकी दिग्गज और प्लेटफार्मों के साथ सरकार की बैठक
इस महीने की शुरुआत में MeitY ने गूगल, व्हाट्सएप, टेलीग्राम और माइक्रोसॉफ्ट जैसे प्रमुख टेक्नोलॉजी दिग्गजों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। इसमें MHA, DoT और I4C के अधिकारी भी शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य इन प्लेटफार्मों के जरिए होने वाली ठगी को रोकना था।
सरकार चाहती है कि डिजिटल अरेस्ट किल स्विच केवल बैंकिंग ऐप्स तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम में एक ऐसा सुरक्षा जाल तैयार किया जाए जहां अपराधी तकनीकी खामियों का फायदा न उठा सकें। साइबर-सक्षम धोखाधड़ी, फिशिंग हमले और अकाउंट टेकओवर अब बहुत जटिल हो चुके हैं, जिसके लिए सामूहिक तकनीकी प्रयास अनिवार्य हैं।
आरबीआई और बीमा नियामक की भूमिका पर चर्चा
आरबीआई के डिप्टी गवर्नर टी रबी शंकर ने हाल ही में एक कार्यक्रम में सवाल उठाया था कि क्या मौजूदा जोखिम-हस्तांतरण उपकरण पर्याप्त हैं। आरबीआई अब बीमा समाधानों के जरिए धोखाधड़ी के नुकसान को दूर करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है।
हालांकि, बीमा कंपनियों का कहना है कि इसके लिए नियामक IRDAI को नेतृत्व करना होगा। वर्तमान में जो साइबर इंश्योरेंस उपलब्ध हैं, वे सिस्टम ब्रीच (सिस्टम में सेंधमारी) को तो कवर करते हैं, लेकिन ग्राहक के साथ होने वाली ‘सोशल इंजीनियरिंग’ या ‘कस्टमर मैनिपुलेशन’ को कवर नहीं करते। इसी कमी को दूर करने के लिए एक नया डिजिटल पेमेंट प्रोटेक्शन फंड या पूल्ड इंश्योरेंस मॉडल प्रस्तावित किया गया है।
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पेमेंट विजन 2025 और भविष्य की सुरक्षा का खाका
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 34,771 करोड़ रुपये के 23,879 धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए हैं। इन आंकड़ों को देखते हुए ‘पेमेंट विजन 2025’ डॉक्यूमेंट में धोखाधड़ी वाले ग्राहकों के लिए प्रोटेक्शन फंड की व्यवहार्यता का अध्ययन करने का प्रस्ताव है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को आतंकवाद बीमा पूल की तरह ही एक ‘धोखाधड़ी बीमा पूल’ बनाना चाहिए, जिसे बैंकों और बीमा कंपनियों द्वारा फंड किया जाए। इससे पूरी वित्तीय प्रणाली में जोखिम का वितरण हो जाएगा और आम आदमी की मेहनत की कमाई सुरक्षित रहेगी।
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