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डिजिटल वॉटर बॉम्ब: भारत में AI डेटा सेंटर्स से गहराता जल संकट

डिजिटल वॉटर बॉम्ब

भारत में AI डेटा सेंटर्स का बढ़ता जाल अब एक डिजिटल वॉटर बॉम्ब के रूप में उभर रहा है, जहाँ डिजिटल विकास की अंधी दौड़ हमारे बहुमूल्य जल संसाधनों को तेज़ी से खोखला कर रही है। वर्तमान में स्थिति यह है कि 2025 तक भारत के सभी डेटा सेंटर्स (AI सहित) का कुल जल उपभोग 150 अरब लीटर के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है।

नवीनतम अनुमान बताते हैं कि यदि यही रफ्तार रही, तो 2030 तक यह आंकड़ा 358 अरब लीटर तक जा सकता है। यह मात्रा इतनी विशाल है कि यह मुंबई या दिल्ली जैसे महानगरों की वार्षिक जल आपूर्ति से भी कई गुना अधिक है।

Alexandre de Vries-Gao के दिसंबर 2025 के अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर AI से जुड़ी जल खपत 312-765 अरब लीटर है, जिसमें अकेले भारत का योगदान 8-12% (लगभग 25-90 अरब लीटर) होने का अनुमान है।

उष्णकटिबंधीय जलवायु और उच्च घनत्व कम्प्यूटिंग का दबाव

भारत की भौगोलिक स्थिति और जलवायु इस समस्या को और अधिक जटिल बना देती है। देश की उष्णकटिबंधीय जलवायु और AI के लिए आवश्यक उच्च घनत्व वाली कम्प्यूटिंग के कारण ‘Evaporative Cooling’ (वाष्पीकरण कूलिंग) एक मजबूरी बन गई है।

इसके परिणामस्वरूप, प्रति MW सालाना 25-26 मिलियन लीटर पानी की खपत अब एक सामान्य बात हो गई है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत पहले से ही दुनिया के सबसे जल-तनावग्रस्त राष्ट्रों में से एक है, जहाँ वैश्विक आबादी का 18% हिस्सा निवास करता है, लेकिन उपयोग के लिए मात्र 4% जल संसाधन उपलब्ध हैं। ऐसे में यह डिजिटल वॉटर बॉम्ब आने वाले समय में एक बड़े सामाजिक संघर्ष का कारण बन सकता है।

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टेक दिग्गजों का निवेश और बढ़ती क्षेत्रीय चुनौतियां

वैश्विक और घरेलू टेक दिग्गजों ने भारत को अपना मुख्य केंद्र बनाया है। Google ने अक्टूबर 2025 में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में 15 अरब डॉलर के निवेश से एक विशाल AI हब की घोषणा की है, जो AdaniConneX के साथ साझेदारी में 1 GW क्षमता का होगा।

वहीं, Microsoft ने AI क्लाउड के लिए 17.5 अरब डॉलर और AWS ने 2030 तक 12.7 अरब डॉलर के निवेश का रोडमैप तैयार किया है। रिलायंस जियो भी पीछे नहीं है, जिसने जामनगर (गुजरात) में NVIDIA के साथ मिलकर 3 GW का मेगा AI डेटा सेंटर प्लान किया है।

इसके अलावा Yotta Infrastructure, CtrlS, Nxtra by Airtel और Sify जैसी कंपनियां मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं बढ़ा रही हैं। विडंबना यह है कि ये सभी शहर पहले से ही गंभीर जल-तनाव से जूझ रहे हैं।

वाष्पीकरण और स्थानीय समुदायों पर पड़ता प्रतिकूल प्रभाव

डेटा सेंटर्स की कार्यप्रणाली में पानी का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इन सेंटर्स में होने वाली कुल खपत का 40-60% हिस्सा वाष्पीकृत होकर हवा में उड़ जाता है। यद्यपि Yotta जैसे स्थानीय ऑपरेटर यह दावा करते हैं कि वे उपचारित (treated) या गैर-पेय जल का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।

ग्रेटर नोएडा जैसे क्षेत्रों में स्थानीय ग्रामीणों को भीषण सूखे और गिरते भूजल स्तर का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र और तेलंगाना में किसानों की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं क्योंकि डेटा सेंटर्स के कारण स्थानीय जल स्रोतों पर अभूतपूर्व दबाव पड़ा है। यह डिजिटल वॉटर बॉम्ब अब उन लोगों की आजीविका पर प्रहार कर रहा है जो सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर हैं।

कॉरपोरेट दावे बनाम रिपोर्टिंग की अपारदर्शिता

Microsoft, Google और AWS जैसी कंपनियां 2030 तक “जल-सकारात्मक” (Water-Positive) होने का बड़े स्तर पर प्रचार करती हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह ज्यादातर PR स्टंट और अप्रत्यक्ष जल रिचार्ज प्रोजेक्ट्स तक सीमित है। वास्तविकता यह है कि कंपनियों की 2025 की रिपोर्ट्स में भारत के लिए स्पष्ट AI विशिष्ट जल डेटा उपलब्ध नहीं है।

इसमें बिजली उत्पादन के दौरान होने वाली अप्रत्यक्ष खपत को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। डेटा सेंटर की वर्तमान नीति (2024-25) कंपनियों को सब्सिडी और इंसेंटिव तो देती है, लेकिन जल उपयोग की सख्त सीमा या अनिवार्य ‘Water Usage Effectiveness’ (WUE) रिपोर्टिंग का कोई प्रावधान न होना एक बड़ी नीतिगत लापरवाही है।

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थर्मल पावर और AI चिप्स की बढ़ती ऊर्जा मांग

समस्या की एक मुख्य जड़ AI वर्कलोड के लिए आवश्यक बिजली और थर्मल पावर पर निर्भरता है। भारत में कई सेंटर्स अब 100+ kW/rack डेंसिटी वाले AI वर्कलोड चला रहे हैं, जिससे कूलिंग के लिए पानी की मांग में 30-40% की बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ता हुआ डिजिटल वॉटर बॉम्ब भूजल स्तर को रसातल में ले जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, जहाँ एक सामान्य व्यक्ति को 150 लीटर पानी प्रति दिन की आवश्यकता होती है, वहां मशीनों के लिए करोड़ों लीटर पानी का यह “लग्जरी” उपयोग विकास की असमानता को दर्शाता है। वैश्विक कॉर्पोरेट मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि इसकी असली कीमत स्थानीय किसान और गरीब तबका चुका रहा है।

समाधान की राह: नई तकनीकों और नीतियों की आवश्यकता

संकट गहरा है, लेकिन समाधान अभी भी संभव हैं। एयर कूलिंग (Dry Cooling), इमर्शन कूलिंग (Immersion/Liquid Cooling) और AI-आधारित वॉटर रिसाइक्लिंग जैसी तकनीकें 40-95% तक पानी बचा सकती हैं। Microsoft के वॉटर-फ्री डिज़ाइन और Yotta द्वारा इमर्शन कूलिंग को बढ़ावा देना सही दिशा में कदम हैं।

नीतिगत स्तर पर, केंद्र सरकार और NGT को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। प्रति MW जल उपयोग की सीमा तय करना, गैर-पेय जल के उपयोग को अनिवार्य बनाना और तकनीकी सुधारों पर सब्सिडी देना अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। यदि अब सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक 200+ अरब लीटर की अतिरिक्त खपत का अनुमान एक भयावह वास्तविकता बन जाएगा।

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पर्यावरणीय न्याय और भविष्य की जिम्मेदारी

निष्कर्ष के तौर पर, AI का “डिजिटल क्रांति” का सपना जल सुरक्षा की कीमत पर पूरा नहीं किया जा सकता। भारत को अपनी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं और पर्यावरणीय न्याय के बीच एक ठोस संतुलन स्थापित करना होगा।

यह बूम यदि अनियंत्रित रहा, तो यह एक पर्यावरणीय-सामाजिक बुलबुले की तरह फटेगा, जिसका सबसे बुरा असर समाज के हाशिए पर खड़े लोगों पर होगा। टेक कंपनियों को अब केवल ‘जिम्मेदार AI’ का नारा देने के बजाय वास्तविक पारदर्शिता और स्थानीय प्रभाव का आकलन करना होगा।

सवाल अब भी वही है कि क्या हम भविष्य की तकनीक के लिए अपना जीवनदायी जल गंवा रहे हैं? समय आ गया है कि नीति-निर्माता और नागरिक मिलकर एक सख्त रुख अपनाएं, क्योंकि जल ही जीवन है।

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