एपस्टीन फाइल्स इंडिया कनेक्शन: जेस स्टेली और हरदीप पुरी के रिश्तों का सच
एपस्टीन फाइल्स इंडिया कनेक्शन के हालिया खुलासों ने न केवल वैश्विक अभिजात वर्ग के नेटवर्क पर गहरे संदेह पैदा कर दिए हैं, बल्कि वित्तीय और राजनीतिक शक्ति के बीच के उस खतरनाक अंतर्संबंध को भी उजागर किया है जिसे अब तक परदे के पीछे रखा गया था।
बार्कलेज के पूर्व सीईओ जेस स्टेली और भारतीय राजनीति के दिग्गज हरदीप सिंह पुरी के नाम जेफरी एपस्टीन के साथ जुड़ना महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित तंत्र की ओर इशारा करता है।
स्टेली, जो 2015 से 2021 तक बार्कलेज के शीर्ष पद पर रहे, 2023 में यूके के फाइनेंशियल कंडक्ट अथॉरिटी (FCA) द्वारा आजीवन प्रतिबंधित कर दिए गए। उन पर आरोप था कि उन्होंने एपस्टीन के साथ अपने गहरे रिश्तों को जानबूझकर छिपाया और नियामकों को गुमराह किया।
जेस स्टेली और एपस्टीन: ‘फैमिली’ जैसा गहरा रिश्ता
जांच में सामने आया है कि 2008 से 2012 के बीच स्टेली और एपस्टीन के बीच 1,200 से अधिक ईमेल्स का आदान-प्रदान हुआ। इन ईमेल्स में स्टेली ने एपस्टीन को अपना “प्रोफाउंड” दोस्त और “फैमिली” जैसा करीबी बताया।
यह रिश्ता केवल शब्दों तक सीमित नहीं था; स्टेली ने एपस्टीन के कुख्यात प्राइवेट आइलैंड का दौरा किया और 2015 में बार्कलेज जॉइन करने के बाद भी थर्ड पार्टी इंटरमीडिएरी के माध्यम से संपर्क बनाए रखा। यह संबंध उस दौर में भी सक्रिय था जब एपस्टीन की आपराधिक छवि दुनिया के सामने आ चुकी थी।
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स्नो व्हाइट और डिज्नी कोड्स का रहस्यमय जाल
ईमेल्स की कतार में एक बेहद विवादास्पद संदेश मिला जहां स्टेली ने लिखा था, “That was fun. Say hi to Snow White,” जिसके जवाब में एपस्टीन ने पूछा, “What character would you like next?” और स्टेली ने “Beauty and the Beast” का विकल्प चुना।
कई रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों का मानना है कि ये डिज्नी पात्र दरअसल कम उम्र की महिलाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कोड वर्ड्स थे।
हालांकि, स्टेली ने इन आरोपों को नकारते हुए इसे एक स्टाफ सदस्य के साथ आपसी सहमति से बना संबंध बताया है। भले ही उनके खिलाफ सक्रिय ‘सेक्स लॉबिंग’ का कोई ठोस कानूनी सबूत नहीं मिला, लेकिन उनके द्वारा तथ्यों को छिपाना और एपस्टीन की मदद करना उन्हें नैतिक रूप से संदिग्धों के कटघरे में खड़ा करता है।
हरदीप सिंह पुरी: निवेश के बहाने एपस्टीन से मुलाकातें
इस पूरे घटनाक्रम में एपस्टीन फाइल्स इंडिया कनेक्शन तब और गंभीर हो जाता है जब इसमें मोदी सरकार के मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम जुड़ता है। 2014 से 2017 के बीच, जब पुरी इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट में थे, उनके और एपस्टीन के बीच कई मुलाकातों के प्रमाण मिले हैं।
यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट द्वारा 2026 में जारी फाइल्स के अनुसार, न्यूयॉर्क के एपस्टीन टाउनहाउस पर फरवरी 2015, जनवरी 2016 और मई 2017 में कम से कम तीन (और कुछ दावों के अनुसार पांच) बैठकें हुईं।
इन ईमेल्स में पुरी “डिजिटल इंडिया” में निवेश के अवसर पेश करते दिखे और एपस्टीन से सिलिकॉन वैली के कनेक्शन, विशेषकर लिंक्डइन को-फाउंडर रीड हॉफमैन को भारत आमंत्रित करने के लिए मदद मांगते नजर आए।
‘एग्जॉटिक आइलैंड’ और नेटवर्किंग की नैतिकता
दिसंबर 2014 के एक ईमेल में हरदीप पुरी ने एपस्टीन को लिखा था, “Please let me know when you are back from your exotic island,” जिसमें उन्होंने किताबें देने के बहाने मुलाकात का समय मांगा था।
यद्यपि इन संवादों में किसी यौन अपराध या प्रत्यक्ष अवैधता का सबूत नहीं है और यह पूरी तरह से बिजनेस नेटवर्किंग और निवेश पिचिंग जैसा प्रतीत होता है, लेकिन सवाल नैतिकता का है।
एपस्टीन 2008 से ही एक प्रमाणित यौन अपराधी था, ऐसे में एक अनुभवी राजनयिक और भावी भारतीय मंत्री का उससे बार-बार संपर्क करना भाजपा के उन दावों पर सवाल उठाता है जो विपक्ष पर ‘नाम-ड्रॉपिंग’ और अनैतिकता के आरोप लगाते रहे हैं।
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बार्कलेज, अडानी और स्टेली का ‘शांति का द्वीप’
स्टेली का भारतीय कनेक्शन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। जुलाई 2016 में अपनी भारत यात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की और भारत को “उथल-पुथल भरी दुनिया में शांति का द्वीप” करार दिया। दिलचस्प बात यह है कि इसी कालखंड में बार्कलेज बैंक अडानी ग्रुप का प्रमुख बॉन्ड अंडरराइटर बन गया।
2016 से 2021 के बीच बार्कलेज ने अडानी ग्रुप के साथ 8 अरब डॉलर से अधिक के सौदे किए, जबकि उस समय बैंक की कोल फाइनेंसिंग (कोयला वित्तपोषण) नीतियां काफी सख्त थीं। एपस्टीन फाइल्स इंडिया कनेक्शन यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह महज व्यापार था या स्टेली के प्रभाव का परिणाम, जो 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अचानक अडानी से दूर हो गए।
दावोस 2018: सत्ता और प्रभाव का संदिग्ध संगम
2018 का दावोस वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम इस पूरी कड़ी का सबसे संदिग्ध हिस्सा माना जा सकता है। 20 साल में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री दावोस गया था, जहां मोदी, अडानी, अंबानी, पुरी और स्टेली एक साथ मौजूद थे। उस समय तक पुरी मंत्री बन चुके थे और पहले ही एपस्टीन से “भारत के भविष्य” पर चर्चा कर चुके थे।
दावोस जैसे वैश्विक मंचों पर जहां बिजनेस और राजनीति की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं, वहां एपस्टीन जैसे लोग जासूसी नहीं बल्कि ‘कनेक्शन’ बेचते थे। पुरी को किसी का “एजेंट” कहना शायद अतिशयोक्ति हो, लेकिन ये मुलाकातें पारदर्शिता पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करती हैं।
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राष्ट्रीय सुरक्षा और जांच एजेंसियों की चुप्पी
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भारत में इन संदेहास्पद संबंधों पर कोई गंभीर जांच क्यों नहीं हुई? जब एपस्टीन फाइल्स इंडिया कनेक्शन के तहत इतने बड़े नामों के ईमेल्स और मुलाकातों का विवरण सार्वजनिक हो चुका है, तो संसद में बहस क्यों नहीं होती?
एनएसए अजीत डोभाल के नेतृत्व वाली एजेंसियां जो विपक्षी नेताओं के विदेशी संपर्कों पर पैनी नजर रखती हैं, वे इन हाई-प्रोफाइल बैंकरों और मंत्रियों के रिश्तों पर खामोश क्यों हैं?
क्या अमेरिका के पास इन फाइल्स के जरिए दिल्ली के खिलाफ कोई ऐसा ‘लीवरेज’ है जो भारत सरकार को चुप रहने पर मजबूर करता है? 2026 की इन फाइल्स ने “न्यू इंडिया” की उस छवि पर दाग लगाया है जिसमें पारदर्शिता का दावा किया जाता था। समय आ गया है कि इन कनेक्शनों की गहराई से जांच हो, वरना भविष्य में यह ब्लैकमेलिंग का जरिया बन सकते हैं।
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