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FIIs की निकासी और कच्चा तेल महंगा: बाज़ार में महासंकट

कच्चा तेल महंगा

कच्चा तेल महंगा होने के बीच, 8 दिसंबर 2025 को सेंसेक्स का 610 अंकों की बड़ी गिरावट के साथ 85,102 पर बंद होना और निफ्टी का 226 अंक टूटकर 25,960 के नीचे लुढ़कना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी। यह लंबे समय से पक रही आर्थिक लापरवाही का फटना था।

बाजार की कुल मार्केट कैप में हुए 7 लाख करोड़ रुपये की चपत लगना निवेशकों के लिए सिर्फ नंबरों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उनके सपनों का ध्वस्त होना है। बिजनेस स्टैंडर्ड और मनीकंट्रोल की रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट है कि घरेलू उत्साह को वैश्विक हकीकतों ने कुचल दिया।

RBI की हालिया 25 bps कटौती के बावजूद, जहां GDP ग्रोथ 8.2% पर चमक रही थी, वहीं FIIs की सतत बिकवाली ने सबको धूल चटा दी। यह बाज़ार नहीं, बल्कि एक सिस्टम का रोना है, जहां घरेलू खुदरा निवेशक FIIs के जूते साफ करने की कोशिश में फंस जाते हैं।

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भरोसे का बहिर्वाह: FIIs ने भारत को क्यों नकारा?

बाजार की इस गिरावट का 50% दोषी FIIs का सतत बहिर्वाह है, और आंकड़े झूठ नहीं बोलते हैं। जुलाई से अब तक 1.6 लाख करोड़ रुपये की बड़ी निकासी हुई है, जिसमें दिसंबर महीने में ही 11,000 करोड़ का भारी ड्रेन देखा गया।

लाइवमिंट और न्यूज18 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि FIIs ने 7 लगातार सेशन में बिक्री जारी रखी, जिसका एकमात्र कारण यह है कि उन्हें अमेरिकी बॉन्ड्स ज्यादा सुरक्षित लग रहे हैं। यह भारत के लिए एक थप्पड़ की तरह है: हमारी अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी की भूख ने इतना लताड़ा है कि जब वे भागते हैं, तो बाज़ार घुटनों पर आ जाता है।

क्या हमने कभी सोचा कि ‘मेक इन इंडिया’ के शोर में विदेशी निवेशकों को इतना महत्व दिया कि अपनी अर्थव्यवस्था की नींव ही हिल गई? यह बहिर्वाह सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि भरोसे का बहिर्वाह है, जो RBI के हस्तक्षेप के बावजूद रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

रुपये की ऐतिहासिक कमजोरी: 90 का आंकड़ा पार, आयात हुआ आसमान पर

रुपये की कमजोरी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है, 9 दिसंबर को 16 पैसे की और गिरावट के साथ यह 90.14 के पार पहुंच गया। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, यह पिछले 12 महीनों में 6.19% की कुल गिरावट का प्रमाण है। रुपये का 90 का आंकड़ा पार होते ही इम्पोर्ट बिल्स आसमान छूने लगे हैं, खासकर क्रूड ऑयल के लिए, क्योंकि भारत की 85% जरूरत आयात पर निर्भर करती है।

कच्चा तेल महंगा होने से देश के व्यापार घाटे पर सीधा असर पड़ता है। नागा और कैम्ब्रिज करेंसीज की फोरकास्ट बताती है कि अगर US ट्रेड डील नहीं हुई, तो रुपया 2026 तक 90-102 तक पहुंच सकता है।

सरकार का ‘रुपये को उसके हाल पर छोड़ने’ का ऐलान कोई साहसिक कदम नहीं, बल्कि घोर लापरवाही है; यह ‘क्रॉलिंग पेग’ की तरह घुटनों टेकने वाली अर्थव्यवस्था का प्रतीक है। क्या यह वही ‘मजबूत रुपया’ है जिसका दावा किया जाता था, या फिर FIIs की दया पर टिका एक कमजोर सिक्का?

तेल की कीमतें: अर्थव्यवस्था के ड्रामे की चाबी और CAD का बढ़ता खतरा

कच्चा तेल महंगा होना इस पूरे ड्रामे की मुख्य चाबी है। PPAC के अनुसार, 5 दिसंबर को इंडियन बास्केट $64.04 प्रति बैरल पर पहुंच गया, जो रुपये की कमजोरी के कारण भारत के लिए और भी ज्यादा महंगा पड़ रहा है।

इकोनॉमिक टाइम्स और गुडरिटर्न्स रिपोर्ट्स चेतावनी देती हैं कि अगर कीमतें $100 तक चढ़ती हैं, तो चालू खाता घाटा (CAD) बढ़कर GDP का 1.7% तक हो सकता है, जो मुद्रास्फीति को भड़काएगा। भारत, जो रूस से 36% तेल आयात करता है, वह US टैरिफ्स की चपेट में फंस गया है।

CLSA की चेतावनी है कि रूस से आयात बंद होने पर तेल की कीमत $100/बैरल हो सकती है। यह सिर्फ ईंधन का संकट नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था का संकट है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट सब महंगे होंगे। सरकार का मौन क्या दर्शाता है? कि सस्ता रूसी तेल खरीदना ‘राष्ट्रीय हित’ में है, लेकिन US के दबाव में झुकना ‘रणनीति’ है?

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वैश्विक दबाव: US फेड की सतर्कता और जापानी बॉन्ड यील्ड्स का उछाल

वैश्विक कारक इस गिरावट को और तीखा बनाते हैं। US फेडरल रिजर्व की 9-10 दिसंबर की बैठक से पहले की सतर्कता ने बाजार को डरा दिया है। रॉयटर्स पोल के अनुसार, 82% इकोनॉमिस्ट्स 25 bps कट की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन पॉवेल की चेतावनी ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी।

कीपलिंगर और फोर्ब्स रिपोर्ट्स बताती हैं कि फेड का डिवाइडेड वोट (10-2) और अनिश्चित डेटा ने वॉलेटिलिटी बढ़ाई, जो भारत जैसे उभरते बाजारों (EMs) को चोट पहुंचाता है। उधर, जापानी बॉन्ड यील्ड्स का उछाल – 30-ईयर 3.43% और 10-ईयर 1.96% पर पहुंचना – येन कैरी ट्रेड को अनवाइंड कर रहा है, जैसा कि सीकिंग अल्फा और इन्वेस्टरप्लेस में वर्णित है।

यह ग्लोबल लिक्विडिटी को सुखा रहा है, जहां येन उधार लेकर US/भारतीय एसेट्स में निवेश का खेल उलट रहा है, जिसका सीधा नतीजा मिडकैप-स्मॉलकैप में 2%+ की गिरावट के रूप में सामने आया है। कच्चा तेल महंगा होने से विदेशी निवेशकों की चिंताएं भी बढ़ जाती हैं।

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ट्रेड डील की अनिश्चितता: निर्यात पर 50% टैरिफ्स की मार

भारत-अमेरिका ट्रेड डील की अनिश्चितता ने भी बाज़ार पर भारी दबाव डाला है। ब्लूमबर्ग के अनुसार, ट्रेड डील में देरी के चलते $2 बिलियन के अपैरल ऑर्डर्स रुके हुए हैं, और 50% टैरिफ्स ने निर्यात को बुरी तरह कुचल दिया है। यह दिखाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था किस हद तक वैश्विक व्यापारिक समझौतों पर निर्भर है।

सेक्टरल तबाही और IT का अस्थायी सहारा

सेक्टरल तबाही का मंजर भी साफ है। PSU बैंक और डिफेंस सबसे ज्यादा चोट खाए हुए दिख रहे हैं, जबकि IT ने थोड़ी सांस दी है।

मनीकंट्रोल के अनुसार, रियल्टी सेक्टर में 3.5% की भारी गिरावट दर्ज हुई, जबकि मीडिया/PSU बैंक/टेलीकॉम 2.5%+ नीचे लुढ़क गए और मिडकैप 1.7% नीचे पहुंच गए। PSU बैंक, जो सरकारी सपनों का प्रतीक बने थे, FII बिकवाली में सबसे आगे थे और SBI, PNB जैसी कंपनियां घायल हुई लगती हैं।

डिफेंस सेक्टर, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नाम पर फूलता रहा, उसकी भी ग्लोबल अनिश्चितता ने सारी हवा निकाल दी। IT का राहत देना कोई चमत्कार नहीं, बल्कि US सेंटीमेंट का आईना है, जहां टेक महिंद्रा, विप्रो जैसे नाम चमके जरूर।

लेकिन यह राहत अस्थायी है; अगर फेड ने ब्याज दर में कटौती नहीं की, तो IT भी लुढ़केगा। यह सेक्टरल असंतुलन दर्शाता है कि बाज़ार कितना विदेशी सांसों पर टिका है।

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निवेशकों को सलाह: नीतिगत अंधेरे का संकट

अंततः, यह गिरावट ‘मोदीनॉमिक्स का कमाल’ है, एक ऐसा मॉडल जो चमकदार GDP नंबर्स दिखाता है लेकिन FII बहिर्वाह, रुपये की लाचारी और ट्रेड अनिश्चितता को नजरअंदाज करता है।

सोशल मीडिया पर ‘Modi economy crawling peg rupee’ पर कोई सीधा ट्रेंड न मिलना दर्शाता है कि विपक्षी आवाजें दबी हैं, लेकिन हकीकत साफ है: अर्थव्यवस्था घुटनों पर है।

RBI का हस्तक्षेप शॉर्ट-टर्म बैंडेज है, लेकिन बिना ट्रेड डील और FII रिवर्सल के सुधार सीमित रहेगा। निवेशकों को सलाह है कि वे प्रॉफिट बुक करें, पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई करें, और सरकार से प्रभावी नीतियों की मांग करें, क्योंकि यह बाजार का संकट नहीं, बल्कि नीतिगत अंधेरे का संकट है। वक्त है जागने का, वरना अगली गिरावट और गहरी होगी।

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