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HRDS एनजीओ विवाद: आदिवासियों के नाम पर महाघोटाले का पर्दाफाश

HRDS एनजीओ विवाद

HRDS एनजीओ विवाद आज केरल से लेकर दिल्ली तक चर्चा का विषय बना हुआ है। खुद को आदिवासी कल्याण और ग्रामीण विकास का मसीहा बताने वाला संगठन ‘हाई रेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी’ (HRDS) असल में विवादों का एक ऐसा गढ़ बन चुका है, जिसके तार तस्करी से लेकर जमीन कब्जाने तक जुड़े हैं।

एक तरफ यह संगठन सामाजिक उत्थान का दावा करता है, तो दूसरी तरफ स्वप्ना सुरेश जैसी गोल्ड स्मगलिंग की मुख्य आरोपी को नौकरी देकर इसने अपने संदिग्ध चरित्र पर मुहर लगा दी है।

पूरे देश को पता था कि वह राजनयिक बैग के जरिए सोना तस्करी करने के संगीन आरोपों में घिरी थी, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई ईमानदार एनजीओ ऐसी विवादास्पद शख्सियत को संरक्षण दे सकता है?

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स्वप्ना सुरेश को संरक्षण और सत्ता का सीधा टकराव

इस संगठन की कार्यप्रणाली तब और भी संदिग्ध हो गई जब केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने स्वयं विधानसभा में यह स्वीकार किया कि HRDS स्वप्ना सुरेश को न केवल वित्तीय मदद दे रहा है, बल्कि उसे सुरक्षात्मक संरक्षण भी प्रदान कर रहा है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से इसे RSS से जुड़ा संगठन बताया।

हालांकि, जब जांच की आंच तेज हुई, तो HRDS ने अचानक स्वप्ना सुरेश को नौकरी से निकालकर खुद को ही पीड़ित बताना शुरू कर दिया। यह दोहरा चरित्र स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि संगठन केवल अपनी सुविधा के अनुसार नैतिकता के मापदंड बदलता है।

आदिवासी उत्थान का ढोंग और उत्पीड़न की कड़वी सच्चाई

जो संगठन आदिवासियों के हक की बात करता है, उसकी हकीकत बेहद खौफनाक है। HRDS के सचिव अजी कृष्णन की गिरफ्तारी ने इस संस्था के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया है। उन पर आदिवासियों की जमीन पर अवैध कब्जा करने, उन्हें जातिसूचक गालियों से अपमानित करने और उनकी झोपड़ियां तक जलाने के गंभीर आरोप हैं।

जब किसी एनजीओ के शीर्ष पदाधिकारी पर SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज हो, तो वह उत्थान का नहीं बल्कि सीधे-सीधे अत्याचार का प्रतीक बन जाता है। HRDS एनजीओ विवाद केवल कागजी हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गरीब आदिवासियों के अस्तित्व पर हमले की कहानी है।

कुदुंबश्री मिशन और करोड़ों के फंड में बड़ी हेराफेरी

भ्रष्टाचार का खेल यहीं नहीं रुकता। इस एनजीओ ने सरकारी परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट की है। कुदुंबश्री मिशन के तहत प्राप्त हुए 5.63 करोड़ रुपये में से 2.16 करोड़ की हेराफेरी का मामला सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि केरल हाईकोर्ट ने भी इस घोटाले की जांच को सही ठहराते हुए इसे बरकरार रखा है।

युवाओं के स्किल डेवलपमेंट (कौशल विकास) के नाम पर आए पैसे को संगठन के लोगों ने आपस में बांट लिया, जबकि जिन गरीब युवाओं के भविष्य के लिए यह राशि थी, उन्हें फूटी कौड़ी तक नसीब नहीं हुई।

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हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में करप्शन और घटिया निर्माण का खेल

सरकारी ठेके हथियाने में माहिर यह संगठन सैकड़ों करोड़ के हाउसिंग प्रोजेक्ट्स चला रहा है, लेकिन इनकी गुणवत्ता पर उठते सवाल इसकी विश्वसनीयता को खत्म कर रहे हैं। विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की यह एक क्लासिक मिसाल है, जहां बड़ी-बड़ी योजनाएं केवल फाइलों में चमकती हैं और जमीन पर घटिया निर्माण का बोलबाला रहता है।

HRDS एनजीओ विवाद इस बात का प्रमाण है कि कैसे एनजीओ की आड़ में करप्शन का खुला खेल खेला जाता है, जहां जनता का पैसा निजी स्वार्थ की भेंट चढ़ जाता है।

सावरकर अवार्ड: शशि थरूर और राजनीतिक प्रोपेगैंडा का दांव

संगठन ने अपनी गिरती साख को बचाने के लिए ‘वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवार्ड’ का सहारा लिया। इस विवादास्पद एनजीओ ने कांग्रेसी नेता शशि थरूर को यह अवार्ड देने की घोषणा कर दी, वह भी उनकी सहमति के बिना। हालांकि, थरूर ने तुरंत इस पुरस्कार को ठुकरा दिया क्योंकि सावरकर का नाम कांग्रेस के वैचारिक दृष्टिकोण से मेल नहीं खाता।

HRDS का असली मकसद कोई सम्मान देना नहीं, बल्कि रक्षा मंत्री जैसे बड़े पदों पर बैठे लोगों को बुलाकर खुद की इमेज चमकाना और राजनीतिक प्रोपेगैंडा फैलाना था।

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RSS से जुड़ाव और सरकारी फंड पर मलाई का विरोधाभास

सबसे गंभीर और तीखा सवाल यह उठता है कि आखिर विवादित संस्थाओं के तार अक्सर RSS से ही क्यों जुड़े मिलते हैं? एक तरफ वैचारिक कट्टरता का दावा और दूसरी तरफ सरकारी फंड की लूट, यह पाखंड की पराकाष्ठा है।

RSS से लिंक्ड होने के बावजूद यह संगठन जांच एजेंसियों से भाग रहा है और अब अवार्ड बांटकर अपनी गंदी पृष्ठभूमि को साफ करने की कोशिश कर रहा है। केरल की जनता को ऐसे संगठनों से सतर्क रहने की आवश्यकता है जो आदिवासियों और गरीबों की आड़ में अपना उल्लू सीधा करते हैं।

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दिखावे का विकास बनाम जमीनी सच्चाई

अंत में यह स्पष्ट है कि सच्चा सामाजिक कार्य करने वाले संगठन खामोशी से अपना योगदान देते हैं, वे विवादों और घोटालों में नहीं डूबते। HRDS एनजीओ विवाद ने यह साबित कर दिया है कि यह संगठन विकास नहीं, बल्कि केवल स्वार्थ और प्रोपेगैंडा के लिए जीवित है।

जनता के पैसे और विश्वास के साथ खिलवाड़ करने वाले ऐसे संगठनों का बेनकाब होना लोकतंत्र के हित में अनिवार्य है। यह तीखी सच्चाई है कि जिस संगठन के हाथ भ्रष्टाचार और उत्पीड़न से रंगे हों, वह किसी का कल्याण नहीं कर सकता।

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