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हुसैन सजवानी की चेतावनी: क्या AI सचमुच छीन लेगा भारत की नौकरियां?

हुसैन सजवानी की चेतावनी

दुबई के दिग्गज अरबपति हुसैन सजवानी की चेतावनी ने आज पूरी दुनिया के जॉब मार्केट में एक नई बहस छेड़ दी है। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भविष्य के वर्कफोर्स का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है, जिससे भारत जैसी आउटसोर्सिंग आधारित अर्थव्यवस्थाओं में बड़े पैमाने पर रुकावट आ सकती है।

फोर्ब्स मिडिल ईस्ट के अनुसार, सजवानी इस क्षेत्र के 100 सबसे प्रभावशाली रियल एस्टेट लीडर्स में प्रथम स्थान पर हैं। वे दुबई स्थित DAMAC प्रॉपर्टीज़ के संस्थापक और चेयरमैन हैं, जिसकी नींव उन्होंने 2002 में रखी थी।

1990 के दशक में, जब दुबई एक वैश्विक व्यापार केंद्र बन रहा था, तब सजवानी ने रणनीतिक रूप से जमीन और संपत्तियों में निवेश कर अपने साम्राज्य को खड़ा किया था। आज उनकी यह दूरदर्शिता तकनीक के क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है।

तेजी से बढ़ती संपत्ति और अमेरिका में 20 बिलियन डॉलर का भारी निवेश

फोर्ब्स के आंकड़ों के अनुसार, सजवानी की नेट वर्थ में पिछले एक साल में असाधारण उछाल आया है। मार्च 2024 में उनकी संपत्ति 5.1 बिलियन डॉलर (लगभग ₹42,628.5 करोड़) थी, जो मार्च 2025 तक बढ़कर 10.2 बिलियन डॉलर (लगभग ₹85,257 करोड़) हो गई है।

अपनी इसी आर्थिक शक्ति के साथ, उन्होंने अमेरिका में एरिज़ोना से लेकर ओहियो तक नए डेटा सेंटर बनाने के लिए 20 बिलियन डॉलर निवेश करने की घोषणा की है।

फ्लोरिडा के मार-ए-लागो रिसॉर्ट में डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बताया कि यह निवेश AI जैसी तकनीकों के लिए जरूरी डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग को पूरा करेगा। ट्रंप ने भी इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि यह निवेश अमेरिका को AI और टेक्नोलॉजी की रेस में सबसे आगे रखने में मदद करेगा।

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वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026: आउटसोर्सिंग हब भारत के लिए खतरे की घंटी

दुबई में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 के मंच से हुसैन सजवानी की चेतावनी ने विशेष रूप से भारत को सावधान किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि AI जॉब मार्केट में एक ऐसी क्रांति लाएगा, जिसका सबसे घातक असर उन देशों पर पड़ेगा जो आउटसोर्सिंग पर निर्भर हैं।

सजवानी के अनुसार, AI का प्रभाव इंटरनेट क्रांति से 10 या 100 गुना अधिक शक्तिशाली होगा। उन्होंने दावोस में जोर देकर कहा कि जो देश समय रहते इस बदलाव के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएंगे, वे बहुत पीछे छूट जाएंगे।

चूंकि भारत दुनिया का आउटसोर्सिंग हब है और यहाँ की इकॉनमी का एक बड़ा हिस्सा IT सर्विसेज, BPOs और कॉल सेंटर्स पर टिका है, इसलिए यह चेतावनी बेहद गंभीर हो जाती है।

80% नौकरियों पर संकट: कौन से सेक्टर सबसे ज्यादा असुरक्षित?

इस चर्चा को और अधिक गंभीर बनाते हुए सजवानी ने अनुमान लगाया कि AI अकाउंटेंट और नर्स जैसे पेशों की लगभग 80% नौकरियों की जगह ले सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि AI इन कामों को इंसानों की तुलना में अधिक तेजी से और कम लागत में करने में सक्षम है।

हुसैन सजवानी की चेतावनी केवल एक विचार नहीं है, बल्कि यह उन आंकड़ों पर आधारित है जो बताते हैं कि कैसे ऑटोमेशन धीरे-धीरे पारंपरिक इंसानी भूमिकाओं को खत्म कर रहा है।

स्काई न्यूज़ अरेबिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए इसकी तुलना ओटोमन साम्राज्य द्वारा टाइपराइटर को अपनाने से इनकार करने जैसी भूल से की। उनके अनुसार, तकनीक को नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता है।

TCS के CEO के. कृतिवासन का पक्ष: क्या सच में खत्म हो जाएगा आउटसोर्सिंग मॉडल?

एक तरफ जहाँ हुसैन सजवानी की चेतावनी डराने वाली है, वहीं टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के चीफ एग्जीक्यूटिव के. कृतिवासन का नजरिया कुछ अलग है। फाइनेंशियल टाइम्स से बात करते हुए उन्होंने कहा कि AI ग्लोबल आउटसोर्सिंग मॉडल को खत्म करने के बजाय काम के स्वरूप (Nature of Work) को बदल देगा।

हालांकि TCS ने हाल ही में अपने ग्लोबल वर्कफोर्स में 2 प्रतिशत यानी लगभग 12,000 नौकरियों की कटौती की है, लेकिन कृतिवासन का तर्क है कि जटिल सिस्टम को मैनेज करने के लिए एंटरप्राइज हमेशा बड़े टेक्नोलॉजी वेंडर्स पर निर्भर रहेंगे। उनके अनुसार, अगर AI की वजह से दक्षता बढ़ती है और रेवेन्यू में थोड़ी कमी आती है, तो ग्राहक उस बचत को नए और बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश करेंगे।

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भारत का आंतरिक परिदृश्य और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में छंटनी का दौर

इंडस्ट्री एनालिसिस 2025 के अनुसार, IT सेक्टर में बड़े पैमाने पर छंटनी की शुरुआत हो चुकी है। TCS में अक्टूबर से दिसंबर तिमाही के बीच कर्मचारियों की संख्या में 11,151 की कमी देखी गई, जिससे दिसंबर के अंत तक कुल वर्कफोर्स 582,163 रह गई।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि पारंपरिक कार्य इसी तरह ऑटोमेटेड होते रहे, तो अगले कुछ सालों में 5 लाख से अधिक नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।

कृतिवासन ने स्वीकार किया है कि AI के एकीकरण से कुछ पद शायद अब प्रासंगिक न रहें, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि TCS अब AI-लेड प्लेटफॉर्म्स और डेटा सेंटर्स के लिए हाइपरस्केलर्स के साथ साझेदारी कर रही है ताकि नई कंप्यूटिंग क्षमता की मांग को पूरा किया जा सके।

भारतीयों के लिए उम्मीद की किरण: स्किलिंग और क्रिएटिविटी का महत्व

इस चुनौतीपूर्ण समय में ‘इंडियन इकोनॉमिक सर्वे 2026’ कुछ सकारात्मक पहलू भी सामने लाता है। सर्वे के अनुसार, भले ही रूटीन काम ऑटोमेटेड हो जाएं, लेकिन मानवीय कौशल जैसे सॉफ्ट स्किल्स, क्रिएटिविटी और एडैप्टेबिलिटी की मांग हमेशा बनी रहेगी। ये ऐसे गुण हैं जिन्हें AI फिलहाल दोहरा नहीं सकता।

ग्लोबल टेक कमेंटेटर्स का भी मानना है कि AI सिर्फ नौकरियां छीन नहीं रहा, बल्कि AI डेवलपमेंट, डेटा साइंस और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में नए अवसर भी पैदा कर रहा है। UAE के उदाहरण को देखें तो लिंक्डइन पोल के अनुसार, वहां के प्रोफेशनल्स जेनरेटिव AI का इस्तेमाल करने में दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं, जो यह दर्शाता है कि तकनीक के साथ चलना ही प्रगति का एकमात्र रास्ता है।

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वर्कर्स और स्टूडेंट्स के लिए भविष्य का रास्ता: रीस्किलिंग ही एकमात्र विकल्प

अंततः, लाखों वर्कर्स और विशेषकर छात्रों के लिए संदेश साफ है कि AI को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। उन्हें खुद को रीस्किल करने और उन भूमिकाओं की ओर बढ़ने की जरूरत है जहाँ इंसानी क्षमताओं जैसे—मैनेजमेंट, नैतिकता (Ethics), आपसी संवाद और रचनात्मकता का उपयोग होता हो।

भविष्य ऐसे वर्कर्स का होगा जो AI के साथ मिलकर काम कर सकें, न कि उसके खिलाफ। हुसैन सजवानी और के. कृतिवासन दोनों के बयानों का निचोड़ यही है कि तकनीक के इस महाबदलाव में केवल वही सुरक्षित रहेंगे जो अपनी स्किल्स को वक्त के साथ अपडेट करते रहेंगे।

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