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 “IIT स्टूडेंट सुसाइड केस” पर उठते सवाल जातिगत भेदभाव 5 साल में53 मौतों

IIT स्टूडेंट सुसाइड केस

IIT स्टूडेंट सुसाइड केस देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों (IITs) में छात्रों की आत्महत्या और अप्राकृतिक मौतों के मामलों ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT Bombay) के द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे की दुखद मृत्यु के बाद से परिसरों में सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, अकादमिक दबाव और जातिगत भेदभाव को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। इस घटना ने एक बार फिर से संस्थानों की जवाबदेही और उनके अंदर मौजूद व्यवस्थागत खामियों को जांच के दायरे में खड़ा कर दिया है।

IIT बॉम्बे मामला: विवाद, आरोप और प्रशासनिक कार्रवाई

IIT बॉम्बे के एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बी.टेक द्वितीय वर्ष के 22 वर्षीय छात्र साहिल वाकोडे का शव 18 सितंबर की शाम हॉस्टल के कमरे में पाया गया। प्राथमिक रिपोर्टों के अनुसार, परीक्षा के दौरान कथित रूप से अनुचित साधनों के उपयोग (ChatGPT के इस्तेमाल) के बाद यह दुखद घटना घटी।

हालांकि, साहिल के परिवार ने गंभीर आरोप लगाते हुए इसे केवल एक शैक्षणिक कार्रवाई मानने से इनकार कर दिया है। परिवार का दावा है कि साहिल को संस्थान के भीतर व्यवस्थित मानसिक उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था।

प्रशासनिक कदम: विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक दबाव के बाद IIT बॉम्बे प्रशासन ने डीन (एडमिनिस्ट्रेटिव अफेयर्स) सूर्यनारायण डूला को उनके पद से हटा दिया है।

कानूनी कार्रवाई: मुंबई पुलिस ने मृतक के परिवार की शिकायत पर शेड्यूल्ड कास्ट्स एंड शेड्यूल्ड ट्राइब्स (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज कर जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है।

संस्थान और फैकल्टी का पक्ष: IIT बॉम्बे फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार पंत के अनुसार, संस्थान के SC/ST सेल की रिपोर्ट के मुताबिक साहिल ने हाल के महीनों में उत्पीड़न से जुड़ी कोई औपचारिक या अनौपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि परीक्षा में नियमों का पालन कराना फैकल्टी का कर्तव्य है और इसे निजी उत्पीड़न नहीं माना जाना चाहिए।

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संसद का डेटा: 5 वर्षों में 53 छात्रों की मौत, आधे से अधिक वंचित वर्गों से

सूचना का अधिकार और संसदीय रिपोर्टों के माध्यम से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों ने IIT परिसरों के भीतर की चिंताजनक स्थिति को उजागर किया है। वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच देश भर के IITs में कम से कम 53 छात्रों की मौत हुई है।

शैक्षणिक वर्षकुल मौतेंआत्महत्या (Suicides)अन्य अप्राकृतिक मौतें
2020-21550
2021-22660
2022-23660
2023-2417
2024-2519136
कुल5345 (84.9%)8 (15.1%)

सामाजिक श्रेणियों के आधार पर विश्लेषण:

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, कुल 53 मौतों में से 54.7% (29 मौतें) अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाले छात्रों की थीं:

जनरल कैटेगरी: 23 मौतें (43.4%)

OBC कैटेगरी: 12 मौतें (22.6%)

SC कैटेगरी: 10 मौतें (18.9%)

ST कैटेगरी: 7 मौतें (13.2%)

EWS कैटेगरी: 1 मौत (1.9%)

सबसे अधिक प्रभावित परिसरों में IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली और IIT हैदराबाद शामिल हैं, जहां पिछले पांच वर्षों में सर्वाधिक घटनाएं दर्ज की गईं।

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संकट की जड़ें: केवल काउंसलिंग काफी क्यों नहीं?

शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि IITs में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का संकट केवल कुछ काउंसलर्स नियुक्त कर देने से हल नहीं हो सकता। इसके पीछे कई गहरे और ढांचागत कारण हैं:

अकादमिक दबाव और रिलेटिव ग्रेडिंग: IITs में पढ़ाई का अत्यधिक बोझ और निरंतर मूल्यांकन प्रणाली छात्रों पर मानसिक दबाव बनाए रखती है।

सामाजिक अलगाव और जातिगत पूर्वाग्रह: ग्रामीण या पिछड़े पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को भाषा, संस्कृति और कभी-कभी अनपेक्षित सामाजिक भेदभाव के कारण अलगाव महसूस होता है।

भविष्य की चिंताएं: प्लेसमेंट का तनाव और परिजनों की अपेक्षाएं भी छात्रों के तनाव को बढ़ाती हैं।

संवाद की कमी: फैकल्टी और छात्रों के बीच औपचारिक दूरी के कारण कई बार छात्र अपनी समस्याएं खुलकर साझा नहीं कर पाते।

    BITS पिलानी के कुलपति और IIT दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. वी. रामगोपाल राव के अनुसार, संस्थानों को “क्राइसिस मैनेजमेंट” (घटना के बाद कदम उठाना) से हटकर “प्रिवेंटिव सपोर्ट सिस्टम” (घटना को रोकने वाली व्यवस्था) की ओर बढ़ना होगा, जिसमें वेल-बीइंग को दैनिक परिसर जीवन का हिस्सा बनाया जाए।

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    सुधार की आवश्यकता: सुरक्षा और संवेदनशीलता का संतुलन

    IIT बॉम्बे, IIT दिल्ली, IIT कानपुर और IIT मद्रास जैसे प्रमुख संस्थानों में हालिया जांचों और 18-पॉइंट स्टूडेंट चार्टर जैसी पहलों के बाद भी यह स्पष्ट है कि केवल कागजी नियमों से स्थिति नहीं सुधरेगी।

    संस्थानों को एक ऐसा समावेशी वातावरण तैयार करने की आवश्यकता है जहां छात्र बिना किसी भय के अपनी शैक्षणिक और व्यक्तिगत चुनौतियां साझा कर सकें। हाल ही में हॉस्टल परिसर में हुई एक दुखद घटना के बाद सामने आए IIT स्टूडेंट सुसाइड केस ने शिक्षा जगत, अभिभावकों और प्रशासन को स्तब्ध कर दिया है। पुलिस द्वारा फॉरेंसिक जांच और सहपाठियों के बयान दर्ज किए जाने के बीच इस IIT स्टूडेंट सुसाइड केस के कारणों का पता लगाने के लिए एक उच्चस्तरीय आंतरिक जांच समिति का गठन भी किया गया है

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