चीन-भारत सीमा विवाद 2025: मोदी की चीन पर चुप्पी और कांग्रेस पर प्रहार
चीन-भारत सीमा विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में असम में लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नए टर्मिनल का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला, लेकिन यह हमला उनकी खुद की विफलताओं को छिपाने की एक घटिया कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं लगता।
मोदी ने दावा किया कि कांग्रेस ने दशकों तक पूर्वोत्तर की अनदेखी की और असम की पहचान मिटाने की साजिश रची। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर गोपीनाथ बोरदोलोई न खड़े होते तो असम पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन जाता। यह ऐतिहासिक तथ्यों का चुनिंदा इस्तेमाल है, जो मोदी की राजनीतिक सुविधा के लिए किया गया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मोदी खुद सत्ता में हैं, तो चीन द्वारा भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा करने पर उनकी जुबान क्यों बंद है? यह दोहरा मापदंड नहीं तो क्या है, जहां विपक्ष की पुरानी गलतियों को बार-बार उछाला जाता है, लेकिन अपनी सरकार की असफलताओं पर पर्दा डाला जाता है?
इसे भी पढ़े :–“चीन-भारत सीधी उड़ानें ” 9 नवंबर से शंघाई-दिल्ली उड़ानें फिर शुरू
सीमा सुरक्षा की नाकामी और राजनीतिक बहानेबाजी
मोदी के भाषण में कांग्रेस पर पूर्वोत्तर को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया गया, लेकिन यह आरोप खुद मोदी सरकार की सीमा सुरक्षा की नाकामी को छिपाने का बहाना लगता है। चीन-भारत सीमा विवाद 2025 के इस दौर में उन्होंने कहा कि बीजेपी कांग्रेस की गलतियों को सुधार रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से चीन के साथ सीमा विवाद और अधिक बढ़े हैं।
2014 में देमचोक में टकराव हुआ, और 2020 में गलवान घाटी, डेपसांग, पांगोंग त्सो जैसे क्षेत्रों में बड़े कब्जे दर्ज किए गए। मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दावों के मुताबिक, 2020 के बाद चीन ने 1,000 से 4,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर नियंत्रण बढ़ाया है, जिसमें 60 वर्ग किलोमीटर का तत्काल कब्जा शामिल है।
सैटेलाइट इमेजरी से डेपसांग में 900 वर्ग किलोमीटर और गलवान में 20 वर्ग किलोमीटर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मोदी कांग्रेस पर झूठे तोहमत लगाते हैं, लेकिन अपनी सरकार में खोई हुई भूमि पर चुप्पी साधे बैठे हैं, जो कायरता के अलावा और कुछ नहीं है।
गलवान की शहादत और राष्ट्रीय शर्म का विषय
चीन-भारत सीमा विवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं, लेकिन मोदी शासन में यह विवाद अब एक राष्ट्रीय शर्म का रूप ले चुका है। साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में हमारे 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे, जबकि चीन ने अपनी तरफ से हुए किसी भी बड़े नुकसान को कभी स्वीकार नहीं किया।
इस हृदयविदारक घटना के बाद भारत को कुछ क्षेत्रों से पीछे हटना पड़ा, और वहां ‘बफर जोन’ बनाए गए। ये बफर जोन वास्तव में भारतीय क्षेत्र को चीन के पक्ष में छोड़ने जैसा कृत्य है। पांगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारों से पूर्ण डिसएंगेजमेंट तो हुआ, लेकिन गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और डेपसांग जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में आज भारतीय सेना की पहुंच बेहद सीमित हो गई है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि पीएलए ने कम से कम 1,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया है, और मोदी सरकार इसे ‘प्री-स्टैंडऑफ स्थिति में बहाली’ कहकर टाल रही है। यह सरासर देश के साथ धोखा है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक लाभ के लिए कुर्बान किया जा रहा है।
असम की ‘साजिश’ और घुसपैठ पर सरकारी मौन
प्रधानमंत्री मोदी असम में कांग्रेस की जिस ‘साजिश’ का जिक्र करते हैं, वे अपनी सरकार के दौरान चीन द्वारा लगातार की जा रही घुसपैठ पर पूरी तरह मौन हैं। चीन-भारत सीमा विवाद 2025 की वर्तमान स्थिति पर विपक्षी नेता राहुल गांधी ने दावा किया है कि 1,000 वर्ग किलोमीटर भूमि बिना किसी लड़ाई के चीन को सौंप दी गई।
सीमावर्ती इलाकों के निवासी भी सरकार पर अपनी भूमि छोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स में डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया के बाद भारतीय सैनिकों को अब पहले की तरह गश्त (patrolling) करने की अनुमति नहीं दी जा रही है, जो स्पष्ट रूप से क्षेत्रीय हानि का प्रमाण है।
सरकार का तर्क है कि ये बफर जोन टकराव को कम करने के लिए हैं, लेकिन असलियत में यह केवल चीन की आक्रामकता को वैश्विक और स्थानीय स्तर पर वैधता देने का एक तरीका है। नरेंद्र मोदी कांग्रेस पर उंगली उठाते हैं, लेकिन खुद की विफलता पर पर्दा डालते हैं, यह पाखंड की पराकाष्ठा है।
इसे भी पढ़े :–चीन की नामकरण रणनीति पर भारत का तीखा पलटवार
‘मजबूत नेता’ की छवि और जमीनी हकीकत
सीमा पर चीन की लगातार बढ़ती आक्रामकता मोदी के ‘मजबूत नेता’ होने के दावे की छवि को बेनकाब करती है। 2020 के बाद से दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की वार्ताएं हुईं, लेकिन डेपसांग और डेमचोक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।
आधुनिक सैटेलाइट इमेजेस से पता चलता है कि चीन ने उन क्षेत्रों में नए सैन्य ढांचे और इंफ्रास्ट्रक्चर बना लिए हैं, जबकि भारत को अपनी ही भूमि से पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। तमाम मीडिया रिपोर्ट्स में 4,000 वर्ग किलोमीटर तक के नुकसान का उल्लेख है, लेकिन मोदी सरकार इसे सिरे से अस्वीकार करती है।
असम की धरती पर खड़े होकर कांग्रेस को कोसते हुए मोदी यह भूल जाते हैं कि नेहरू के समय 38,000 वर्ग किलोमीटर अक्साई चिन खोया गया था, लेकिन मोदी के समय में भी हजारों वर्ग किलोमीटर की हानि हुई है। फर्क सिर्फ इतना है कि नेहरू ने उस दौर में लड़ाई लड़ी थी, जबकि मोदी ने एक कायर की तरह इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है।
विफल विदेश नीति और आर्थिक मोर्चे पर असफलता
यह पूरी घटनाक्रम मोदी की विदेश नीति की एक बड़ी असफलता को उजागर करता है। जहां एक तरफ वे कांग्रेस पर पूर्वोत्तर की अनदेखी का आरोप लगाते हैं, वहीं चीन-भारत सीमा विवाद 2025 की वास्तविकता में वे चीन के साथ संबंधों को संभालने में पूरी तरह असफल साबित हुए हैं।
2020 की हिंसक झड़प के बाद भारत सरकार ने दिखावे के तौर पर कुछ चीनी ऐप्स को बैन किया और कुछ आर्थिक कदम उठाए, लेकिन सीमा पर कोई ठोस सामरिक जीत हासिल नहीं हुई। विपक्ष और स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि वास्तव में कितनी भूमि खोई गई, लेकिन सरकार हर बार जवाब देने से कतराती है।
असम में ‘भाईचारा’ की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मोदी को चीन की आक्रामकता पर वही ‘भाईचारा’ क्यों नहीं याद आता? यह अब साफ हो चुका है कि राजनीतिक लाभ के लिए इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, जबकि वर्तमान की कड़वी सच्चाई को देश की जनता से छिपाया जा रहा है।
इसे भी पढ़े :–कैलाश मानसरोवर यात्रा : भारत-चीन संबंधों में नई आशा का संचार
राष्ट्रीय संप्रभुता और राजनीतिक स्टंट का मेल
अंत में, मोदी की यह असम यात्रा एक राजनीतिक स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं नजर आती, जहां केवल कांग्रेस को निशाना बनाकर वोट बटोरे जाते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मौन रहकर देश की जनता को धोखा दिया जा रहा है। चीन द्वारा कब्जाई गई भारतीय भूमि पर चुप्पी बनाए रखना न केवल कायरता है, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय हितों के साथ एक बड़ा विश्वासघात है।
यदि मोदी वाकई खुद को एक मजबूत और सक्षम नेता मानते हैं, तो उन्हें कांग्रेस की पुरानी गलतियों को बार-बार दोहराने के बजाय अपनी सरकार की वर्तमान असफलताओं का साहस के साथ सामना करना चाहिए।
अन्यथा, यह एक तीखी और नग्न सच्चाई है कि मोदी का ‘विकास’ का नारा सिर्फ एक चुनावी जुमला बनकर रह गया है, जबकि हमारी सीमाएं लगातार कमजोर हो रही हैं और देश की संप्रभुता चीन के कारण गंभीर खतरे में है।
इसे भी पढ़े :–चीन यात्रा सावधानी: भारत ने शंघाई घटना पर नागरिकों को दी खास सलाह
चीन-भारत सीमा विवाद 2025 का भविष्य
असम के मंच से दिया गया भाषण चुनावी समीकरणों को तो साध सकता है, लेकिन यह उन सैनिकों के बलिदान और उन नागरिकों के डर का जवाब नहीं है जो सीमा पर चीन की बढ़ती ताकत को अपनी आंखों से देख रहे हैं। चीन-भारत सीमा विवाद 2025 आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, जिस पर सरकार को पारदर्शिता दिखानी चाहिए।
नेहरू के अक्साई चिन और मोदी के काल में खोई जमीन के बीच तुलना करना बंद कर, वर्तमान में भारत की क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित करना ही सच्ची देशभक्ति होगी। इतिहास को ढाल बनाकर वर्तमान की नाकामियों को छिपाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।



Post Comment