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जातिगत पूर्वाग्रह से जूझती भारतीय न्यायपालिका !

भारतीय न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह

भारतीय न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह एक गंभीर चिंता का विषय है। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 1959 में एक सवाल उठाया था। उन्होंने पूछा कि न्यायाधीश किस जाति के हैं। लोहिया मानते थे कि ऊँची जाति के न्यायाधीशों के फैसले प्रभावित होते हैं। वे जमीन के कागजात को ही आधार मानते हैं। गरीबों की जीवन स्थितियों पर ध्यान नहीं देते। यह जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका के इतिहास में दिखता है।

लोहिया का सवाल और पेरियार का संघर्ष

सामाजिक पूर्वाग्रह के खिलाफ आवाजें

1959 में लोहिया ने हैदराबाद में भाषण दिया। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश भी इंसान हैं। उनके मन में जातिगत धारणाएँ होती हैं। एक ऊँची जाति का जज जमीन के कागजों को प्राथमिकता देता है। गरीबों के मानवीय हकों को नजरअंदाज करता है। लोहिया के इस भाषण पर किसी ने अवमानना का केस नहीं किया।

पेरियार पर अवमानना का मामला

इसके विपरीत पेरियार (ई.वी. रामासामी) पर 1957 में केस चला। मद्रास हाईकोर्ट ने उन्हें अवमानना का नोटिस दिया। पेरियार ने एक ब्राह्मण न्यायाधीश की आलोचना की थी। उन्होंने पूछा कि क्या गैर-ब्राह्मण अधिकारी के खिलाफ टिप्पणी न्यायसंगत थी। पेरियार ने अदालत में बयान दिया। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश जातिगत पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हैं। उन्होंने एक फैसले का उदाहरण दिया। इसमें एक ब्राह्मण जज ने “अनैतिक” बेटी को संपत्ति से वंचित किया था। यह दलील जातिगत पूर्वाग्रह दिखाती है।

1920 का दशक: मद्रास में जाति आधारित मांगें

सामुदायिक पक्षपात के प्रारंभिक संकेत

1921 में मद्रास हाईकोर्ट में एक महत्वपूर्ण मामला आया। वकील रघवा रेड्डी ने याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि उनका मुकदमा ब्राह्मण जज के सामने है। ट्रस्ट पर ब्राह्मणों का वर्चस्व है। इसलिए न्याय नहीं मिल सकता। उन्होंने गैर-ब्राह्मण जज की मांग की। अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया। रेड्डी को छह महीने के लिए प्रैक्टिस से प्रतिबंधित किया गया। अदालत ने कहा कि सांप्रदायिक दुश्मनी न्यायालयों में घुस गई है।

न्यायिक नियुक्तियों में जातिगत कोटा

1920 के दशक में मद्रास सरकार ने सांप्रदायिक आदेश पारित किया। सरकारी नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण लागू हुआ। ब्राह्मणों, गैर-ब्राह्मणों, हरिजनों के लिए कोटा तय किया गया। जस्टिस पार्टी ने मांग उठाई। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जिला मुंसिफों की नियुक्ति करता है। अधिकतर नियुक्तियाँ ब्राह्मणों की होती हैं। इसलिए यह शक्ति हाईकोर्ट से छीन ली जाए। या सभी समुदायों को प्रतिनिधित्व मिले। इस तरह जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका में गहरा जमा।

चंद्र रेड्डी प्रकरण और न्यायिक प्रतिक्रिया

न्यायाधीशीय पक्षपात का खुलासा

1964 में आंध्र हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी. चंद्र रेड्डी का स्थानांतरण हुआ। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गजेंद्रगडकर ने जांच की। कई याचिकाओं में आरोप लगे थे। चंद्र रेड्डी अपनी जाति के लोगों का पक्ष लेते थे। गजेंद्रगडकर ने हैदराबाद में वकीलों से बात की। सभी ने जातिगत पूर्वाग्रह की पुष्टि की। इसके बाद रेड्डी को मद्रास हाईकोर्ट भेज दिया गया। उन्हें कार्यवाहक राज्यपाल भी बनाया गया। यह घटना दिखाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका में मौजूद था।

सुप्रीम कोर्ट का विविधता पर जोर

2014 में मद्रास हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने विरोध किया। कॉलेजियम ने बारह नामों की सिफारिश की थी। सभी एक ही समुदाय के थे। एसोसिएशन ने विविधता की कमी बताई। सुप्रीम कोर्ट ने सिफारिशें वापस ले लीं। अदालत ने कहा कि नियुक्तियों में विविधता जरूरी है। लेकिन योग्यता भी महत्वपूर्ण है। न्यायाधीश अपनी सामाजिक धारणाओं से प्रभावित होते हैं। इसलिए जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका के लिए चुनौती है।

कृष्णा अय्यर का सामाजिक न्याय अभियान

समावेशी न्यायपालिका की वकालत

जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर ने लगातार अभियान चलाया। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखे। उच्च न्यायपालिका में दलितों की नियुक्ति मांगी। 1992 के पत्र में उन्होंने कहा कि एससी/एसटी के साथ उचित व्यवहार नहीं होता। न्यायपालिका में उनका प्रतिनिधित्व कम है। योग्यता के नाम पर पूर्वाग्रह छिपाया जाता है।

‘नायडी’ टिप्पणी और अवमानना विवाद

जस्टिस अय्यर ने एक सभा में भाषण दिया। उन्होंने कहा कि ‘नायडी’ आदिवासी भी जज बन सकते हैं। वे किसी से कम नहीं हैं। इस पर एक वकील ने अवमानना की याचिका दायर की। अय्यर ने जवाब दिया कि दलितों को अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने डॉ. अंबेडकर का उदाहरण दिया। केरल के महाधिवक्ता ने याचिका आगे नहीं बढ़ाई। यह घटना दिखाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका में गहरा बैठा है।

आज भी क्यों बरकरार है जातिगत भावनाएँ?

सामाजिक असमानता का साया

2023 की संसदीय समिति रिपोर्ट चौंकाने वाली है। रिपोर्ट कहती है कि उच्च न्यायपालिका में विविधता की कमी है। एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। यह देश की सामाजिक विविधता को नहीं दर्शाता। हाल के वर्षों में प्रतिनिधित्व और घटा है। इसलिए जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका से जुड़ा मुद्दा बना हुआ है।

न्यायाधीशों के विवादित बयान

कुछ न्यायाधीशों ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लिया। उन्होंने जाति व्यवस्था का बचाव किया। एक न्यायाधीश ने कहा कि जाति व्यवस्था सदियों पुरानी नहीं है। बाद में उन्हें आदेश संशोधित करना पड़ा। उन्होंने लिखा कि जातिगत असमानता को खत्म करना चाहिए। ऐसे विवाद दिखाते हैं कि न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह गहरा है।

वर्तमान विवाद और भविष्य का रास्ता

न्यायिक सुधार की जरूरत

हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट में एक विवाद हुआ। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने एक वकील को नोटिस दिया। वकील ने सीजेआई को शिकायत भेजी थी। उसमें जातिगत पूर्वाग्रह के आरोप थे। न्यायाधीश ने खुली अदालत में वकील से सवाल किए। कई सेवानिवृत्त जजों ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले सीजेआई को भेजे जाने चाहिए। अंत में मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया। यह घटना दिखाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका की चुनौती है।

समाधान: विविधता और जागरूकता

इतिहास बताता है कि समाधान विविधता में है। न्यायिक नियुक्तियों में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। जस्टिस कृष्णा अय्यर और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर जोर दिया। न्यायाधीशों को संवेदनशीलता प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। सामाजिक पूर्वाग्रहों पर खुली चर्चा होनी चाहिए। अवमानना के डर के बिना आलोचना की जगह बनानी होगी। तभी जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका से दूर हो सकता है।

निष्कर्ष: क्या न्यायाधीश जातिगत पूर्वाग्रह से मुक्त हैं?

ऐतिहासिक और समकालीन उदाहरण बताते हैं कि नहीं। लोहिया से लेकर पेरियार तक ने इसकी ओर इशारा किया। चंद्र रेड्डी और हाल के विवाद पुष्टि करते हैं। न्यायाधीश भी समाज का हिस्सा हैं। उनकी सोच पर जातिगत संस्कार प्रभाव डालते हैं। विविधता ही इस पूर्वाग्रह का मुख्य उपाय है। जब तक न्यायपालिका सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी। तब तक जातिगत पूर्वाग्रह न्यायपालिका में बना रहेगा।

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