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राज ठाकरे के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हाईकोर्ट जाएं’

राज ठाकरे के खिलाफ याचिका

राज ठाकरे के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका हिंदी भाषियों के खिलाफ कथित भड़काऊ भाषण को लेकर दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बॉम्बे हाई कोर्ट जाने की छूट दी है।

  • मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला सुनाया।
  • यह रिट याचिका उत्तर भारतीय विकास सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनील शुक्ला द्वारा दायर की गई थी।
  • पीठ ने याचिकाकर्ता को इस मामले के लिए हाईकोर्ट जाने को कहा।

याचिका में राज ठाकरे के भाषण से हिंदी भाषी कर्मचारियों के खिलाफ हिंसा भड़कने का आरोप लगाया गया था। इस मामले में कोर्ट ने कोई भी हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

मुख्य बिंदु :

  1. सुप्रीम कोर्ट ने राज ठाकरे के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए हाईकोर्ट जाने की सलाह दी।
  2. मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन की पीठ ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
  3. याचिकाकर्ता सुनील शुक्ला ने मनसे की मान्यता रद्द करने और राज ठाकरे पर प्रतिबंध की मांग की।
  4. याचिका में आरोप लगाया गया कि भड़काऊ भाषण के कारण हिंदी भाषियों पर हमले हुए थे।
  5. शुक्ला ने जान से मारने की धमकियों और कार्यालय पर हमले की घटनाओं का उल्लेख किया।
  6. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की जाएगी।
  7. अब याचिकाकर्ता बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी।

याचिकाकर्ता सुनील शुक्ला की शिकायतें और मांगें

याचिकाकर्ता सुनील शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट से कई मांगें की थीं। उन्होंने कहा कि वह मुंबई में रहते हैं और उत्तर भारतीय निवासियों के हितों के लिए काम करते हैं। उन्होंने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा की मांग की।

  • उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की मान्यता रद्द करने की मांग की थी।
  • घृणास्पद भाषण की स्वतंत्र जाँच के लिए विशेष जाँच दल का गठन करने की मांग की गई थी।
  • जाँच पूरी होने तक राज ठाकरे को भड़काऊ भाषण देने से रोकने की मांग भी की गई थी।

याचिका में कहा गया है कि राज ठाकरे का भाषण एबीपी माज़ा पर प्रसारित हुआ था। इसी के कारण मुंबई के पवई और वर्सोवा स्थित डी-मार्ट में हिंदी भाषियों पर हमला हुआ था।

अधिकारियों की निष्क्रियता और उत्पीड़न के आरोप

याचिका में सुनील शुक्ला ने अपने ऊपर हुए उत्पीड़न के पिछले मामलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। ट्विटर पर उनकी हत्या के लिए उकसाया गया और 100 से ज़्यादा गुमनाम फ़ोन कॉल्स भी आए थे। याचिका में कहा गया है कि मनसे अध्यक्ष का आचरण आईपीसी की कई धाराओं के तहत आता है। इसमें 153ए, 295ए, 504, 506 और 120बी शामिल हैं।

  • याचिका में कहा गया कि 6 अक्टूबर, 2024 को लगभग 30 मनसे कार्यकर्ताओं ने उनके कार्यालय में तोड़फोड़ की कोशिश की।
  • महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, डीजीपी, पुलिस आयुक्त और चुनाव आयोग को ज्ञापन देने के बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई।
  • यह आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ता की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

हाईकोर्ट जाने की सलाह और याचिका वापस लेने का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, “क्या बॉम्बे हाईकोर्ट छुट्टी पर है?” इसके बाद, याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। अब याचिकाकर्ता द्वारा बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख करने की उम्मीद है। राज ठाकरे के खिलाफ याचिका पर अब सुनवाई हाईकोर्ट में हो सकती है।

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष के आधार पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
  • अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता बॉम्बे हाईकोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र है।
  • यह फैसला राज ठाकरे के खिलाफ याचिका के संबंध में दिया गया है।

याचिका की मुख्य मांगें और तर्क

राज ठाकरे के खिलाफ याचिका में कुछ खास निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि पुलिस को तुरंत सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। साथ ही, एफआईआर दर्ज कर आपराधिक जाँच शुरू करनी चाहिए।

  • चुनाव आयोग को मनसे की मान्यता रद्द करने पर विचार करने का निर्देश दिया जाए।
  • धमकियों और हिंसा की घटनाओं की जाँच एक स्वतंत्र एजेंसी या एसआईटी से कराई जाए।
  • जाँच पूरी होने तक राज ठाकरे को किसी भी तरह का भड़काऊ भाषण देने से रोका जाए।

यह याचिका सुनील शुक्ला ने दायर की थी, जो उत्तर भारतीय विकास सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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