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जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस ने उड़ाई धज्जियां

जुबिन नौटियाल दिल्ली
जुबिन नौटियाल दिल्ली

जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट की सुर्खियों में तब आ गए जब जस्टिस मिनी पुष्करणा की बेंच ने उनके ‘पर्सनालिटी राइट्स’ (Personality Rights) को सुरक्षित करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए तीखे सवाल खड़े किए। सिंगर जुबिन नौटियाल ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनकी आवाज, नाम और फोटो का बिना अनुमति इस्तेमाल करने वाले एआई ऐप्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगाई जाए।

हालांकि, अदालत ने राहत देने से पहले एक बहुत ही बुनियादी तकनीकी सवाल पूछा कि जुबिन नौटियाल आखिर दिल्ली हाई कोर्ट ही क्यों आए हैं?

जस्टिस पुष्करणा ने इस बात पर हैरानी जताई कि मुंबई या उत्तराखंड की स्थानीय अदालतों के बजाय हर सेलिब्रिटी अपनी याचिका लेकर दिल्ली की ओर क्यों दौड़ता है। यह सवाल केवल जुबिन के लिए नहीं था, बल्कि यह बॉलीवुड और सेलिब्रिटी संस्कृति के उस रुझान पर एक बड़ा कटाक्ष था जो दिल्ली हाई कोर्ट को अपनी ‘पहली पसंद’ बना चुका है।

“क्या उत्तराखंड में गूगल नहीं है?”: जस्टिस मिनी पुष्करणा का वो कमेंट जो वायरल हो गया

इस सुनवाई का सबसे चर्चित हिस्सा वह था जब कोर्ट ने जुबिन नौटियाल के वकील से उनके निवास स्थान के बारे में पूछा। जब वकील ने बताया कि सिंगर मूल रूप से उत्तराखंड के रहने वाले हैं, तो जस्टिस मिनी पुष्करणा ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या उत्तराखंड में गूगल (Google) काम नहीं करता?

अदालत का इशारा इस ओर था कि यदि कोई डिजिटल उल्लंघन पूरे देश या दुनिया में हो रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि मामला अनिवार्य रूप से दिल्ली हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में ही आएगा।

जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट में यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि चूंकि उल्लंघन करने वाली टेक कंपनियां दिल्ली से संचालित होती हैं, इसलिए वे यहाँ आए हैं। लेकिन कोर्ट इस दलील से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आया और इसे ‘फोरम शॉपिंग’ के नजरिए से देखा।

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पर्सनालिटी राइट्स क्या हैं और सेलिब्रिटीज इन्हें लेकर इतने अलर्ट क्यों हैं?

आज के डिजिटल दौर में पर्सनालिटी राइट्स का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण हो गया है, खासकर एआई (AI) और डीपफेक तकनीक के आने के बाद। जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी उस विरासत को बचाना चाहते हैं जिसे उन्होंने वर्षों की मेहनत से बनाया है। पर्सनालिटी राइट्स के तहत किसी भी प्रसिद्ध व्यक्ति का अपने नाम, आवाज, चेहरे और हस्ताक्षर पर कानूनी अधिकार होता है।

यदि कोई कंपनी विज्ञापनों में बिना अनुमति सिंगर की आवाज का इस्तेमाल करती है या उनके चेहरे का उपयोग कर कोई उत्पाद बेचती है, तो यह उनके अधिकारों का उल्लंघन है। इससे पहले अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ जैसे दिग्गज भी दिल्ली हाई कोर्ट से इसी तरह के ‘जनरिक प्रोटेक्शन’ आदेश ले चुके हैं, जिसे देखकर अब जुबिन भी इसी कानूनी कवच की तलाश में हैं।

लोकल कोर्ट बनाम दिल्ली हाई कोर्ट: सेलिब्रिटीज को दिल्ली ही क्यों पसंद है?

दिल्ली हाई कोर्ट पिछले कुछ वर्षों में ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स’ (IPR) और पर्सनालिटी राइट्स के मामलों के लिए एक हब बन गया है। जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट इसलिए पहुँचे क्योंकि यहाँ के फैसलों का प्रभाव पूरे देश में व्यापक होता है और दिल्ली में टेक कंपनियों के हेडक्वाटर्स होने के कारण कानूनी नोटिस तामील करना आसान होता है।

हालांकि, जस्टिस पुष्करणा ने स्पष्ट किया कि केवल दिल्ली में दफ्तर होने का मतलब यह नहीं है कि जिला अदालतों या अन्य राज्यों की हाई कोर्ट्स की गरिमा को कम किया जाए। कोर्ट ने कहा कि यदि यह सिलसिला चलता रहा, तो दिल्ली हाई कोर्ट पर मुकदमों का बोझ असहनीय हो जाएगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का खतरा: जुबिन के वकील की सबसे बड़ी दलील

सिंगर के वकील ने अदालत को बताया कि कई एआई प्लेटफॉर्म्स और वेबसाइट्स जुबिन नौटियाल की आवाज का क्लोन बना रहे हैं, जिससे उनकी व्यावसायिक क्षमता को नुकसान पहुँच रहा है। जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान यह बात प्रमुखता से रखी गई कि डिजिटल दुनिया में भौगोलिक सीमाएं मायने नहीं रखतीं, क्योंकि एक ही ऐप दिल्ली, मुंबई और देहरादून में समान रूप से उपलब्ध है।

वकील का कहना था कि चूंकि दिल्ली में ऐसे उल्लंघन के मामलों को संभालने की बेहतर न्यायिक समझ विकसित हुई है, इसलिए वे यहाँ न्याय की उम्मीद में आए हैं। कोर्ट ने माना कि मुद्दा गंभीर है, लेकिन ‘अधिकार क्षेत्र’ का सवाल अभी भी सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

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डिजिटल अधिकार क्षेत्र: कानून और हकीकत के बीच की उलझी हुई कड़ियाँ

तकनीकी रूप से, नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत मुकदमा वहां दायर किया जा सकता है जहां प्रतिवादी रहता है या जहां ‘कॉज ऑफ एक्शन’ (Cause of Action) पैदा होता है। जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट के मामले में कोर्ट ने पूछा कि क्या जुबिन को दिल्ली में कोई विशिष्ट नुकसान हुआ है जो उन्हें उत्तराखंड या मुंबई में नहीं हो सकता था?

जस्टिस ने टिप्पणी की कि सेलिब्रिटीज को अपनी स्थानीय अदालतों पर भी भरोसा करना चाहिए। यह टिप्पणी उस मानसिकता पर प्रहार करती है जो मानती है कि केवल बड़ी अदालतों में ही तकनीकी मामलों का समाधान संभव है। कोर्ट ने वकील से अगली सुनवाई तक यह स्पष्ट करने को कहा है कि दिल्ली ही वह स्थान क्यों है जहाँ यह मामला सुना जाना चाहिए।

मिलेनियल्स और जेन-जी का रिएक्शन: सोशल मीडिया पर बंटी राय

जैसे ही “क्या उत्तराखंड में गूगल नहीं है?” वाली हेडलाइन सोशल मीडिया पर आई, जेन-जी और टेक-सैवी युवाओं के बीच बहस छिड़ गई। कुछ लोग इसे जस्टिस की हाजिरजवाबी बता रहे हैं, तो कुछ जुबिन के समर्थन में खड़े हैं।

प्रशंसकों का कहना है कि एक कलाकार के लिए उसकी आवाज ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति है, और यदि इसका डिजिटल दुरुपयोग हो रहा है, तो उन्हें देश की किसी भी बड़ी अदालत में जाने का हक होना चाहिए। जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट विवाद अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक मुद्दा बन गया है, जहाँ न्याय की सुलभता और डिजिटल सीमाओं पर लोग अपनी राय रख रहे हैं।

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क्या जुबिन को मिलेगी दिल्ली हाई कोर्ट से राहत?

अंततः, जुबिन नौटियाल दिल्ली हाई कोर्ट का यह मामला एक लैंडमार्क जजमेंट में बदल सकता है। यदि कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह सेलिब्रिटीज के लिए दिल्ली आने का रास्ता और आसान कर देगा।

लेकिन यदि कोर्ट इसे स्थानीय अदालत में भेजने का आदेश देता है, तो यह भविष्य के लिए एक मिसाल बनेगा कि अधिकार क्षेत्र के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। अगली सुनवाई में जुबिन के वकील को और अधिक ठोस सबूतों के साथ यह साबित करना होगा कि दिल्ली ही इस मामले के लिए सही ‘फोरम’ है।

तब तक, यह मामला कानूनी गलियारों में एक दिलचस्प चर्चा का विषय बना रहेगा कि क्या इंटरनेट के युग में भौतिक दूरियां सचमुच बेमानी हो गई हैं?

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